अगर वे इतने ही असमर्थ हैं तो हमारे महानायक कैसे हो सकते हैं?

अगर हम अमिताभ बच्चन के रिकॉर्ड पर नज़र दौड़ाएं तो पता लगेगा कि उन्होंने अपनी ताकत का इस्तेमाल अपने लाभ के अलावा कभी किसी और मक़सद के लिए नहीं किया है

Amitabh Bacchan
अमिताभ बच्चन की चौहत्तरवीं सालगिरह राष्ट्रीय ख़बर थी. आख़िर वे महानायक हैं. लेकिन अमिताभ बच्चन के महानायक होने के मायने क्या हैं? क्या इसकी कसौटी उनकी अभूतपूर्व व्यावसायिक सफलता है? या, वे एक असाधारण अभिनेता हैं जिनका जोड़ कम से कम हिंदी सिनमा को अब तक नहीं मिला? इन प्रश्नों पर अलग-अलग राय हो सकती है.

इस महानायकत्व के सामाजिक आशय को कैसे समझें? अपने जन्मदिन पर उन्होंने एक सरकारी या राजकीय प्रवक्ता की तरह देशभक्तिपूर्ण वक्तव्य जारी किया, कि यह समय अपने सैन्य बल के साथ खड़े होने का है. इस बयान का कोई ख़ास अर्थ नहीं है क्योंकि शायद ही इस देश में आज कोई ऐसा है जो सेना पर सवाल कर रहा हो. कम से कम दहशतगर्दों के ख़िलाफ़ उसकी कार्रवाई पर. सारे राजनीतिक दल एक स्वर से इस कार्रवाई का समर्थन कर रहे हैं. तब इस समय अलग से सेना के साथ एकजुटता के बयान में कोई ताजगी न थी. इस बयान की भाषा में भी कोई प्रेरणास्पद शक्ति नहीं थी. फिर एक अभिनेता यह बयान देकर क्या साबित कर रहा है?

दहशगर्दी के ख़िलाफ़ किसी क़दम का विरोध शायद कोई आत्मघाती ही कर सकता है. आलोचना अगर हो रही है तो भारतीय जनता पार्टी की सरकार और उसके नेताओं की जो कई क़दम आगे जाकर असभ्य तरीक़े से पाकिस्तान के खिलाफ बयान तो दे ही रहे हैं, सेना के एक पेशेवर क़दम को उत्तर प्रदेश के चुनाव में भुनाने में भी लगे हैं. इसकी आलोचना करने वालों पर हमले हो रहे हैं, उन्हें पाकिस्तान जाने की नसीहत दी जा रही है.
 

अमिताभ बच्चन हिंदी सिनेमा के बुज़ुर्ग हैं. उनसे यह संसार संरक्षण की उम्मीद भी करता है. उनसे कनिष्ठ अभिनेता संकट में उनकी ओर देखें, यह स्वाभाविक ही है. दूसरे देशों के कलाकार भी अपनी हिफाजत के लिए उनकी ओर ही देखेंगे.
 

इस समय अगर अमिताभ बच्चन जैसी सार्वजनिक शख़्सियत लोगों के गलत की आलोचना करने के अधिकार का समर्थन करे तो उसका कुछ मतलब हो, लेकिन ऐसा उन्होंने नहीं किया.

अमिताभ बच्चन हिंदी सिनेमा के बुज़ुर्ग हैं. उनसे यह संसार संरक्षण की उम्मीद भी करता है. उनसे कनिष्ठ अभिनेता संकट में उनकी ओर देखें, यह स्वाभाविक ही है. इतने लंबे सिनेमाई जीवन के कारण और एक अखिल भारतीय व्यक्तित्व होने के चलते उनकी बात का असर व्यापक होगा. दूसरे देशों के कलाकार भी अपनी हिफाजत के लिए उनकी ओर ही देखेंगे. लेकिन अगर हम उनके रिकॉर्ड पर नज़र दौड़ाएं तो मालूम होता है कि उन्होंने अभिनेता के तौर पर अर्जित शक्ति का इस्तेमाल कभी भी अपने लाभ के अलावा किसी और मक़सद के लिए नहीं किया.

अभी हाल में जब पाकिस्तानी कलाकारों को भारत से चले जाने का अभियान चलाया गया तो सलमान खान तक से न रहा गया. पिछले दिनों अपने ऊटपटांग व्यवहार के लिए बदनाम ओम पुरी ने भी इस घृणा अभियान की आलोचना की. लेकिन अमिताभ बच्चन का बयान आज्ञाकारी, अनुशासित अनुचर जैसा था. उन्होंने कहा कि अगर ऐसा कोई फ़ैसला हुआ है तो वे उसका पालन करेंगे. यानी किसी पाकिस्तानी कलाकार के साथ काम नहीं करेंगे.

अमिताभ से इस समय क्या अपेक्षा थी? ‘क्या सीमा पार की सैनिक कार्रवाई’ पाकिस्तान की फ़ौज के ख़िलाफ़ थी? क्या वह पाकिस्तान पर हमले की शुरुआत थी? क्या पाकिस्तान ने भारत पर आक्रमण कर दिया है? ज़ाहिर है, इनमें से हर सवाल का जवाब ‘नहीं’ में है. सरकार की ही बात मानें तो यह एक सीमित कार्रवाई थी जो दहशतगर्दों के एक जमाव को नाकाम करने के लिए की गई. ऐसी स्थिति में पाकिस्तान के कलाकारों के बहिष्कार का क्या अर्थ है? यह सवाल कोई भी विवेकी उठाएगा. यह तय है कि अक्सर सवाल उठाने में ख़तरा है. लेकिन अगर ख़तरे से महानायक डरेगा तो फिर मैदान में कौन रहेगा?

इस घटना को छोड़ भी दें तो पहले भी अमिताभ बच्चन ने अपनी बिरादरी के असुरक्षित साथियों के लिए आवाज़ उठाना ज़रूरी नहीं समझा है. हाल में कन्नड़ फ़िल्म अभिनेत्री सपना को सिर्फ़ यह कहने पर कि पाकिस्तान नरक नहीं है अपमानित और प्रताड़ित किया गया, तो अमिताभ को यह अपने क़द से बहुत छोटा मामला जान पड़ा.
 

हाल में जब आमिर खान पर पूरी सरकार ने हमला बोल दिया तो अनेक कलाकार उनके समर्थन में सामने आए लेकिन अमिताभ को यह मुंह खोलने लायक मामला नहीं लगा.
 

आमिर खान पर एकाधिक बार हमले हुए हैं. मेधा पाटकर के आंदोलन का समर्थन करने के चलते जब गुजरात में उनकी फ़िल्म के प्रदर्शन को रोका दिया गया, तो भी अमिताभ ने चुप्पी बनाए रखी. हाल में जब आमिर खान पर पूरी सरकार ने हमला बोल दिया तो अनेक कलाकार उनके समर्थन में सामने आए लेकिन अमिताभ को यह मुंह खोलने लायक मामला नहीं लगा. इसी समय नयनतारा सहगल समेत और लेखकों पर सरकार और सत्ताधारी दल की ओर से भद्दे आक्रमण की सूरत में भी उन्होंने अपनी सुनहरी ख़ामोशी बनाए रखी. नयनतारा उनकी मां की मित्र भी होंगी और अमिताभ की बचपन की कुछ यादें उनसे जुड़ी होंगी, लेखक उनकी पिता की बिरादरी के थे, लेकिन अमिताभ को यह सब अपनी ऊंचाई से दिखाई न दिया.

कहा जाता है कि अमिताभ जैसे कलाकार से ऐसी संवेदनशील स्थिति में स्टैंड लेने की मांग ग़लत है क्योंकि एक-एक फ़िल्म पर करोड़ों रुपए लगे होते हैं और सैकड़ों की रोजी उससे जुड़ी होती है. यह बहाना लेकर अक्सर अपनी तटस्थता का बचाव किया जाता है. अगर महानायक इतना असमर्थ है तो उसकी इस पदवी का क्या अर्थ है?

ऐसा नहीं कि अमिताभ ने सत्ता से एक सच्चे कलाकार की तरह दूरी रखी है. ऐसे कलाकार भी हैं. वहीदा रहमान शालीनता से जीवन जी रही हैं. लेकिन अमिताभ बच्चन को राजनीतिक दलों से नजदीकी रखने में कोई उलझन नहीं रही है.

अमिताभ की कुरबत (नजदीकी), जो अब उतनी नई भी नहीं है, भारतीय जनता पार्टी से है. 2002 के गुजरात के जनसंहार के बाद उसे दर्शनीय स्थल के रूप में मनभावन बनाने में अमिताभ ने अपनी आवाज़ की दैवीय देन का भरपूर इस्तेमाल किया.

क्या हिंदी सिनेमा संसार ऐसा ही रहा है? हाल में हमने शर्मिला टैगोर, महेश भट्ट, शबाना आज़मी, आमिर खान या फ़रहान अख़्तर जैसे कलाकारों को समय-समय पर बोलते हुए और उसके कारण मुश्किल में पड़ते भी देखा है. लेकिन बड़ा तबक़ा ऐसा है जो सत्ता का चारण बनने में हिचकता नहीं.
 

जिस समय भारत का महानायक राज्य का प्रचारक मालूम पड़ रहा है, लगभग उसी समय पिंक फ़्लॉयड के पुराने और अलग हो चुके गायक एक जगह इकट्ठा हुए: फ़िलस्तीन और ग़ाज़ा पट्टी की आज़ादी की ओर ध्यान दिलाने को निकले जहाज के समर्थन में एक मज़बूत बयान देने के लिए.
 

कई फ़िल्मी हस्तियां राज्य सभा में गई हैं, फ़िल्म में होने के कारण. लेकिन वहां उनकी भूमिका सचिन तेंदुलकर जैसी ही रही है. पृथ्वीराज कपूर का वक़्त कुछ और था!

जिस समय भारत का महानायक राज्य का प्रचारक मालूम पड़ रहा है, लगभग उसी समय पिंक फ़्लॉयड के पुराने और अलग हो चुके गायक एक जगह इकट्ठा हुए: फ़िलस्तीन और ग़ाज़ा पट्टी की आज़ादी की ओर ध्यान दिलाने को निकले जहाज के समर्थन में एक मज़बूत बयान देने के लिए. ये गायक खुलकर डॉनल्ड ट्रम्प की मुख़ालफ़त भी कर रहे हैं. ऐसे अमरीकी कलाकार कम नहीं हैं जिन्होंने खुलेआम कहा है कि अगर ट्रम्प राष्ट्रपति हों तो वे अमरीका में रहने पर सोचेंगे. लेकिन वहां उन्हें जलावतन करने या देशद्रोही ठहराने के बारे में किसी ने कुछ कहा नहीं है.

यूरोप, अमरीका में जनतंत्र के लिए, दबे-कुचले लोगों के लिए अपनी कला की शक्ति का इस्तेमाल नया नहीं है. वहां कलाकार, भले ही, करोड़ों में खेलते हों, राजनीतिक जोखिम लेते रहे हैं. वियतनाम युद्ध हो या इराक़ पर हमला, कलाकारों ने राष्ट्र के मानस को युद्ध के ख़िलाफ़ तैयार करने में पेशकदमी ली है. हमारे यहां, दुर्भाग्य से कलाकार, ख़ासकर फ़िल्मी, आत्मसंरक्षण और आत्मोत्थान से आगे जा नहीं पाते.
अगर कला का समाज की आत्मा की लौ जगाए रखने से कोई वास्ता है, तो यह क्योंकर है कि हमारे बड़े कलाकार अपनी आत्मा को कुचल कर अपना ओहदा बचाए रखते हैं? इस लौ को उकसाने का काम रंगमंच के कलाकार करते रहे हैं, लेकिन, वे भी व्यवसायीकरण के साथ, कम होते जाते हैं. अगर कोई सबसे मुखर तबक़ा है तो अध्यापकों और लेखकों का. अमिताभ बच्चन इस फ़िल्मी दुनिया के एक सबसे ज्यादा बिकनेवाले उत्पाद हैं. उन्होंने अपने भीतर किसी सचेतन सत्ता का अनुभव नहीं किया तो क्या आश्चर्य?

Courtesy: satyagrah.scroll.in

 

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