प्रबंधन संस्थानों में कोटा पूरा करने का निर्देश नहीं दिया सरकार ने

Written by महेंद्र नारायण सिंह यादव | Published on: September 27, 2016
केंद्र सरकार भले ही दावा करती है कि वह आईआईएम में आरक्षित पद भरना चाहती है, लेकिन सचाई यही है कि उसने ऐसा कोई आदेश जारी नहीं किया है। आईआईएम अहमदाबाद के डायरेक्टर ने बताया है कि सरकार ने इस बारे में कोई आदेश नहीं दिया है, केवल एक सुझाव दिया है।



दरअसल, केंद्र सरकार ने मंशा जाहिर की थी कि आईआईएम एससी, एसटी और ओबीसी के लिए नियुक्तियों में आरक्षण लागू करके अपने संवैधानिक दायित्व पूरा करें। सरकारी सूत्रों के मुताबिक, मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने इस तरह के इरादे जाहिर किए थे।

मानव संसाधन विकास मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, “आरक्षण का प्रावधान संविधान के अनुसार ही है और संविधान से ऊपर कुछ भी नहीं है। जिन संस्थानों को आरक्षण लागू करने से छूट दी गई है, उनकी सूची में आईआईएम का नाम नहीं है।”

उल्लेखनीय है कि आरक्षण को उच्चतम न्यायालय ने स्वतंत्रता के बाद कई मामलों की सुनवाई करते हुए संविधान सम्मत करार दिया था। इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार (एआईआर 1983 एससी 477) में ओबीसी के लिए आरक्षण को मंजूरी दी गई थी। बाद में अशोक कुमार ठाकुर बनाम भारत सरकार (एआईआर2008 (6) एससीसी) में पदोन्नतियों में भी आरक्षण को वैध ठहराया गया था।

उच्च शिक्षण संस्थानों में आरक्षण का मामला 2008 में तब चर्चा में आया था जब सरकार ने आईआईएम, आईआईटी समेत केंद्रीय धन से चलने वाले सभी संस्थानों और अन्य केंद्र से वित्तपोषित विश्वविद्यालयों से शैक्षणिक पदों पर एससी, एसटी और ओबीसी को आरक्षण देने को कहा था।

आईआईएम दाखिले में तो आरक्षण देने लगे लेकिन प्राध्यापकों के पदों पर आरक्षण लागू करने की उनकी मंशा कभी नहीं दिखी। आईआईएम अहमदाबाद, बंगलौर और कोलकाता ने तो सरकार के इस फैसले का विरोध भी किया। हालाँकि, आईआईटी और अन्य केंद्र सरकार से वित्तपोषित विश्वविद्यालयों ने इसका पालन शुरू कर दिया है।

मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने आईआईएम संस्थानों को 2013 के बाद से आरक्षण के बारे में तीन एडवाइज़री जारी की हैं।

आईआईएम अहमदाबाद के डायरेक्टर आशीष नंदा सरकार के नोटिस को केवल सुझाव बताते हुए कहते हैं कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने कोई आदेश नहीं दिया है और मात्र ये कहा है कि हमें समाज के हर तबके, खासकर कमजोर तबके के लोगों को शामिल करने का प्रयास करना चाहिए। नंदा कहते हैं कि उन्होंने सरकार से कह दिया है कि वो पहले से ही ऐसा करते रहे हैं और अब अपने प्रयासों की रफ्तार दोगुनी कर देंगे।

दोनों पक्षों के दावों से अलग, सच्चाई यही है कि आईआईएम ही नहीं, सभी उच्च शिक्षा संस्थानों और विश्वविद्यालयों में आरक्षण से बचने की लगातार कोशिश की जाती है। सरकार की ओर से कोई कड़ाई न बरते जाने के कारण यही स्थिति लगातार बनी हुई है।