पवित्र किताब की छाया में आकार लेता जनतंत्र

Written by New Socialist Initiative | Published on: July 1, 2016

Credit: Altaf Qadri, AFP.


भारतीय लोकतंत्र: दशा और दिशा को लेकर चन्द बातें 

Never Be Deceived That the Rich Will Permit You To Vote Away Their Wealth
- Lucy Parsons


महोदय
​आयोजकों का बहुत शुक्रिया कि उन्होंने मुझ जैसे कार्यकर्ता को एक अग्रणी वामपंथी चिन्तक-आलोचक की याद में बात रखने के लिए बुलाया।
 
मुझे यह अफसोस हमेशा बना रहेगा कि व्यक्तिगत तौर पर मुझे डा ग्रेवालजी से सीखने या उन्हें सुनने का मौका कभी नहीं मिला। प्रस्तुत गोष्ठी के सिलसिले में तैयारी के दौरान मैंने उनके जीवन के उन तमाम पहलुओं के बारे में जाना जिनके बारे में आप सभी लोग वाकीफ होंगे। जैसा कि उनके बारे में एक बात मशहूर है कि उन्होंने बहुत कम लेखन किया।
 
शायद वह एक ऐसे स्कॉलर थे जो बौद्धिक बहसों को आगे बढ़ाने में यकीन रखते थे, वामपंथ की दिशा में नए लोगों को उन्मुख करने में मुब्तिला रहते थे और अपने इस अलग किस्म के एक्टिविस्ट तेवर के चलते उन्हें वक्त नहीं मिलता था। हां, हालांकि जब उन्होंने कलम उठायी तो उसकी चर्चा हुई।
 
उदाहरण के तौर पर नामवर सिंह की किताब ‘कविता के नए प्रतिमान’ पर उनका हस्तक्षेप मौलिक था जब उन्होंने ‘नव्य समीक्षा’ के सिद्धान्तों के घेरे में लेकर उनकी आलोचना की और फिर किताब के अगले संस्करण में नामवरजी को अपनी बात रखनी पड़ी। अपने जीवनकाल में उन्होंने जिस कदर लोगों को प्रभावित किया इसी का प्रभाव इस बात में दिखता है कि उनके इन्तक़ाल के दस साल बाद भी आप सभी उनके कार्यों को याद रखने के लिए तथा उन्हें आगे बढ़ाने के लिए सक्रिय हैं। 
 
1.
और आज उन्हीं की याद को आगे बढ़ाते हुए हम भारतीय जनतंत्र के सामने खड़ी चुनौतियों से रूबरू होने की कोशिश कर रहे हैं।
 
मुझे लगता है कि हर समय का अपना मिज़ाज़ होता है। सौ साल पहले उपनिवेशवाद के खिलाफ संघर्ष चल रहे थे, राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों ने तत्कालीन समाजी मिज़ाज को परिभाषित करने की कोशिश की थी, अक्तूबर क्रांति और फासीवाद विरोधी आंदोलनों ने एक इन्कलाबी जोश को भरने की कोशिश की थी। आज 21 वीं सदी की दूसरी दहाई में अपने समय के मिज़ाज को हम क्या कह सकते हैं?
 
क्या यह कहना गैरवाजिब होगा कि समय का मिज़ाज लोकतंत्र अर्थात जम्हूरियत की अवधारणा के इर्दगिर्द परिभाषित होता है। बीसवीं सदी की शुरूआत में उस जमाने के शायर भी ‘जमूहर का आता है अब जमाना’ जैसी बात गुनगुनाते भी मिलते हैं। 
 
आखिर जनतंत्र को कैसे समझा जा सकता है ? 
 
जनतंत्र मुख्यतः राज्य एवं अन्य सत्ता संरचनाओं के गठन की एक प्रणाली होता है।’  औपचारिक तौर पर वह एक ऐसी व्यवस्था होती है, जहां हरपात्र सदस्यकानून बनाने से लेकर निर्णय लेने तक में बराबरी से हिस्सा लेता है। और जाहिर है कि किसी मसले पर सहमति बने तो ऐसे फैसले को अल्पमत बहुमत की बुनियाद पर लिया जाता है। इन दिनों जनतंत्र की समझदारी इतनी व्यापक हो चली है कि बेहद आत्मीय दायरों से - मसलन परिवार से - प्रगट सार्वजनिक दायरों तक वह पसर चुकी है।
 
सवाल उठता है कि इस अवधारणा को लेकर हम अलसुबह क्यों गुफतगू कर रहे हैं ? दरअसल जनतंत्र के लिए समर्पित लोग या उसके प्रति सरोकार रखनेवाले लोग इस अवधारणा की आदर्शीकृत छवि और जमीनी धरातल पर उजागर होते उसके विपर्यय से चिंतित हैं और इस मसले पर तबादले खयालात करने के लिए व्याकुल हैं। दरअसल वह जनतंत्र की अवधारणा के बढ़ते ‘खोखले होते जाने’ /hollowing out /से परेशान हैं और यह सोचने के लिए मजबूर है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है?
 
2. 
लोग सोच रहे हैं कि आखिर जनतंत्र हर ओर दक्षिणपंथी हवाओें के लिए रास्ता सुगम कैसे कर रहा है, अगर वह 'युनाईटेड किंगडम इंडिपेण्डस पार्टी' के नाम से ब्रिटन में मौजूद है तो मरीन ला पेन के तौर पर फ्रांस में अस्तित्व में है तो नोर्बर्ट होफेर और फ्रीडम पार्टी के नाम से आस्टिया में सक्रिय है तो अमेरिका में उसे डोनाल्ड ट्रम्प के नाम से पहचाना जा रहा है। वैसे इन दिनों सबसे अधिक सूर्खियों में ब्रिटेन है, जिसने पश्चिमी जनतंत्र के संकट को उजागर किया है।
 
ब्रिटेन को यूरोपीयन यूनियन का हिस्सा बने रहना चाहिए या नहीं इसे लेकर जो जनमतसंग्रह हुआ, जिसमें सभी यही कयास लगा रहे थे कि ब्रिटेन को ‘अलग हो जाना चाहिए’ ऐसा माननेवालों को शिकस्त मिलेगी, मगर उसमें उलटफेर दिखाई दिया है; वही लोग जीत गए हैं। और इस बात को नहीं भुला जा सकता कि जो कुछ हो हुआ है उसमें प्रक्रिया के तौर पर गैरजनतांत्रिक कुछ भी नहीं है। दक्षिणपंथ के झण्डाबरदारों ने ऐसे चुनावों में लोगों को अपने पक्ष में वोट डालने के लिए प्रेरित किया है, जो पारदर्शी थे, जिनके संचालन पर कोई सवाल नहीं उठे हैं। 
 
लोगों की चतुर्दिक निगाहें यह देख रही हैं कि अमेरिकी सेनायें जब इराक पर आक्रमण करती हैं तो वह भी ‘जनतंत्र बहाली’ के लिए होता है और जब कोई डोनाल्ड ट्रम्प मुसलमानों के खिलाफ/स्त्रिायों के खिलाफ/आप्रवासियों के खिलाफ जहर उगलते हुए दुनिया के सबसे बड़े चौधरी मुल्क के राष्टपति पद के लिए अपना दांवा ठोंकते हैं तो वह भी जनतांत्रिक प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए ही होता है या किसी ब्राजिल नामक मुल्क में जब चुनी हुई राष्ट्रपति को -जिनके खिलाफ व्यक्तिगत भ्रष्टाचार के आरोप तक नहीं लगे हैं - वैश्विक पूंजी, स्थानीय अभिजातों की सहायता से अपदस्थ करती है, जिसे संवैधानिक तख्तापलट भी कहा गया है, और उनके स्थान पर भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे लोगों को हुकूमत की बागडोर सौंपती है तो वह भी जनतंत्र के नाम पर ही किया जाता है या किसी फिलिपिन्स में राष्टपति पद पर एक ऐसा शख्स - जनतांत्रिक प्रक्रियाओं के तहत - चुना जाता है, जिसे यह ‘शोहरत’ हासिल है कि मेयर के तौर पर उसके यहां सैकड़ों लोगों को अपराध नियंत्रण के नाम पर पुलिस ने फर्जी मुठभेड़ों में मार डाला और जो प्रगट तौर पर नारीविरोधी है।
 
आप कह सकते हैं कि इन दिनों लोकतंत्र में ऐसे हिटलरकुमारों का गददीनशीन होना आम हो रहा है जिन पर यह आरोप लगते रहते हैं कि उन्होंने /विशिष्ट/जन के संहार में भाग लिया था।
 
आखिर जनतंत्र के इस रूपांतरण को - जो कुल मिला कर जन के खिलाफ ही पड़ता है - कैसे समझा जा सकता है? 
 
3.
गौरतलब है कि लोकतंत्र की भावी दशा एवं दिशा को लेकर खतरे के संकेत उसी वक्त़ प्रगट किए गए थे जब देश ने अपने आप को एक संविधान सौंपा था। संविधानसभा की आखरी बैठक में डा अम्बेडकर की भाषण की चन्द पंक्तियां याद आ रही हैं, जिसमें उन्होंने साफ कहा था: 
 
‘‘हम लोग अन्तर्विरोधों की एक नयी दुनिया में प्रवेश कर रहे हैं। राजनीति में हम समान होंगे और सामाजिक-आर्थिक जीवन में हम लोग असमानता का सामना करेंगे। राजनीति में हम एक व्यक्ति - एक वोट और एक व्यक्ति- एक मूल्य के सिद्धान्त को स्वीकार करेंगे। लेकिन हमारे सामाजिक-राजनीतिक जीवन में, हमारे मौजूदा सामाजिक आर्थिक ढांचे के चलते हम लोग एक लोग-एक मूल्य के सिद्धान्त को हमेशा खारिज करेंगे। कितने दिनों तक हम अन्तर्विरोधों का यह जीवन जी सकते हैं ? कितने दिनों तक हम सामाजिक और आर्थिक जीवन में बराबरी से इन्कार करते रहेंगे ’’
 
जनतंत्र के मौजूदा स्वरूप को लेकर बेचैनी के स्वर आज की तारीख में ऐसे लोगों से भी सुनने को मिल रहे हैं जो संवैधानिक पदों पर विराजमान हैं, ऐसे लोग जिन्होंने अपने ज़मीर की बात को कहने का बार बार जोखिम उठाया है।
 
पिछले साल ‘राममनोहर लोहिया स्मृति व्याख्यान’ में उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के इन लब्जों को पढ़ते हुए यह बात अवश्य लग सकती है, जब उन्होंने कहा था: 
 
एक  जनतांत्रिक समाज में, मतभिन्नता का स्वीकार एक तरह से बहुवचनी होने का आवश्यक अंग समझा जाता है। इस सन्दर्भ मे, असहमति का अधिकार एक तरह से असहमति का कर्तव्य बन जाता है क्योंकि असहमति को दबाने की रणनीति जनतांत्रिक अन्तर्वस्तु को कमजोर करती है।.. एक व्यापक अर्थों में देखें तो असहमति की आवाज़ों की अभिव्यक्ति उन गंभीर गलतियों से बचा सकती है या बचाती रही है - जिनकी जड़ों को हम सामूहिक ध्रुवीकरण में देख सकते हैं - यह अकारण नहीं कि भारत की आला अदालत ने असहमति के अधिकार को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार - जिसे संविधान की बुनियादी अधिकार की धारा 19/1/ के तहत गारंटी प्रदान की गयी है - के एक पहलू के तौर पर स्वीकार किया है। ...आज की वैश्वीक्रत होती दुनिया में और ऐसे तमाम मुल्कों में जहां जनतांत्रिक तानाबाना बना हुआ है, असहमति को स्वर देने में नागरिक समाज की भूमिका पर बार बार चर्चा होती है और साथ ही साथ उसके दमन या उसे हाशिये पर डालने को लेकर बात होती है।’’
 
उन्होंने यह भी कहा कि 
 
असहमति और विरोध के लिए और कोईभी बात उतनी जानलेवा नहीं दिखती जितना यह विचार कि सभी को बाहरी एजेण्डा तक न्यूनीक्रत किया जा सकता है ..यह विचार कि जो मेरे नज़रिये से इत्तेफाक़ नहीं रखता वह किसी दूसरे के विघटनकारी एजेण्डा का वाहक  है, अपने आप में घोर गैरजनतांत्रिक विचार है। वह नागरिकों के प्रति समान सम्मान से इन्कार करता है क्योंकि वह उनके विचारों के प्रति गंभीर होने की जिम्मेदारी से आप को मुक्त कर देता है। एक बार जब हम असहमति के स्त्रोत को विवादित बना देते हैं फिर उनके दावेां की अन्तर्वस्तु पर गौर करने की आवश्यकता नहीं रहती ..इसका असहमति पर गहरा प्रभाव पड़ता है।
 
4.
निश्चित तौर पर हम सबकी चिन्ताओं का केन्द्र, उनका फोकस हमारे इर्दगिर्द प्रगट होते जनतंत्र के ताज़ा संस्करण से संबंधित है, जिसके बारे में देश के कर्णधारों द्वारा यही कहा गया है कि वह ‘पवित्र किताब की छाया में आकार ले रहा है।’ याद करें कि जनाब मोदी ने जब 2014 में सत्ता की बागडोर संभाली थी तो संसद भवन में प्रवेश करते हुए उन्होंने उसकी पहली सीढ़ियों का वंदन किया था और यह ऐलान किया था कि उनके लिए संविधान ही अब सबसे पवित्र किताब है - गोया वह अप्रत्यक्ष तौर पर यह कहना चाह रहे हों कि उनके अतीत को लोग अब भूल जाएं। हम याद कर सकते हैं कि ऐसे कई लोग जो मोदी के विश्वदृष्टिकोण से इत्तेफाक नहीं रखते थे और उन्होंने उनके खिलाफ वोट भी दिया था, उन्हें भी यह उम्मीद थी कि वाकई एक नयी शुरूआत हो रही है। विडम्बना ही है कि लोग अक्सर भूल जाते हैं कि पवित्र की महज पूजा होती है और उसका अनुकरण नहीं किया जाता।
 
प्रश्न उठता है कि यह ‘नयी शुरूआत’ कैसी रही? इसे हम कैसे समझें? एक तरीका यह हो सकता है कि हम जनाब मोदी के किसी घोषित आलोचक के हालिया किसी लेख को पलटंे और जानें कि बीते दो साल में जनतंत्रा का हुलिया कैसे बदला?  दूसरा तरीका यह हो सकता है कि हम अख़बार की कतरनों पर निगाह डालें और खुद समझें कि क्या शक्ल बन रही है ! मैं अख़बारों की कतरनों से निसृत होते इसी पसमंज़र को आप के साथ साझा करना चाहूंगा।
 
5.
फेंकुजी अब दिल्ली में हैं ?’
Ahmedabad: Narsinhbhai Solanki, a supporter of Prime Minister Narendra Modi, has moved a local court demanding ban on a book published recently in Gujarati on the PM's alleged failure to fulfil promises made during the 2014 general elections. The litigant, who has objected to this publication, has also made Modi a party-respondent in the civil suit.
J R Shah, a resident of Paldi, has written a book titled, 'Fekuji Have Dilli Ma' (Fekuji is now in Delhi) and got it published by his own venture, J R Enterprise. The book allegedly talks about the promises that Modi had made during the campaign for the 2014 parliamentary elections.
 
सभी जानते हैं कि मोदी सरकार ने कुछ वक्त़ पहले अपनी हुकूमत के दो साल पूरे किए और उसे लेकर पूरे भारत में जश्न मनाया। कई सितारों, सेलेब्रिटीज को आमंत्रित किया गया था। छह घंटा तक चले इस कार्यक्रम को राष्ट्रीय दूरदर्शन ने सजीव प्रसारण किया था। तयशुदा बात है कि उसमें कई हजार करोड़ रूपए खर्च किए गए होंगे। मुझे यह मालूम नहीं कि आखिर दो साल की ऐसी क्या उपलब्धियां थी जिन्हें लेकर ढिंढोरा पीटा जाना जरूरी था?
 
बहरहाल, यह वही वक्त़ था जब स्वराज्य अभियान की याचिका पर हस्तक्षेप करते हुए सर्वोच्च न्यायालय को कहना पड़ा था कि देश के लगभग तीस फीसदी भाग में सूखा पड़ा है और सरकार कुछ नहीं कर रही है। इतनाही नहीं उसने इस बात को आधिकारिक तौर पर स्वीकारा तक नहीं था कि सूखे की व्यापकता इतनी अधिक है, उसे लेकर ठोस कदम उठाने की बात तो दूर रही।
 
कोई भी सोचता कि क्या तो अच्छा होता कि कुछ वक्त पहले आला अदालत द्वारा अपनी कर्मण्यता को लेकर झाड खा चुकी सरकार ऐलान करती कि चूंकि मुल्क में सूखा पड़ा है, लिहाजा हम अपने समारोहों को स्थगित कर रहे हैं। उसका एक सकारात्मक असर होता। लोग सोचते ‘देर आए, दुरूस्त आए’।
 
मगर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। उतने ही गाजेबाजे के साथ दो साल की उपलब्धियां गिनायी गयीं, अलग अलग राज्यों में केन्द्रीय मंत्रियों को भेज कर राज्य स्तर पर भी इस बखान को दोहराया गया। और जहां तक भारत के इतने बड़े हिस्से में सूखे की बात है, तो उसे लेकर कदमताल जारी रहा। पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट द्वारा फुड कमीशनर के दफतर के लिए प्रमुख सलाहकार के तौर पर नियुक्त किए गए बिराज पटनाईक का साक्षात्कार इस मामले में आंखें खोलनेवाला है जिसमें वह बताते हैं कि आला अदालत द्वारा इस मामले में स्पष्ट तथा सख्त निर्देश के बावजूद सूखाग्रस्त इलाकों में जमीनी स्तर पर कुछ भी नहीं हुआ है। 
 
गौरतलब है कि 2013 में बने नेशनल फुड सिक्युरिटी एक्ट अर्थात राष्ट्रीय अन्न सुरक्षा अधिनियम तक पर अमल तक शुरू नहीं किया गया है। सत्ता की बागडोर संभालने के बाद भाजपा/राजग की सरकार ने तीन दफा इस अधिनियम को लागू करने की डेडलाइन आगे बढ़ा दी। ऐसा महज संसद की स्वीकृति से ही संभव है, मगर इसे कार्यपालिका की कार्रवाई के तहत अंजाम दिया गया।
 
जाहिर है कि इसने सूखाग्रस्त इलाकांे में भूख की समस्या को बढ़ाया है। अगर अधिनियम जब से बना तबसे लागू किया गया होता तो ग्रामीण आबादी के लगभग 75 फीसदी के पास तक अनाज पहुंचाने की प्रणालियां कायम हो चुकी होती। बिराज पटनायक के मुताबिक राष्टीय अन्न सुरक्षा अधिनियम को लागू करने का कुल बजट 15,000 करोड़ रूपए है जबकि केन्द्र सरकार ने उसके लिए अभी तक महज 400 करोड़ रूपये ही आवंटित किए हैं। पिछले साल इसकी पायलट स्कीम अर्थात शुरूआती प्रायोगिक योजना पर उसने 438 करोड़ रूपए खर्च किए थे, जो इसी बात को रेखांकित करता है कि किस तरह वह इस योजना को हल्का करने की फिराक़ में है।
 
6
जो हाल राष्ट्रीय अन्न सुरक्षा अधिनियम का था, कमोबेश वही हाल ‘मनरेगा’ का भी था। याद करें कि कांग्रेस की अगुआईवाली संप्रग सरकार के दिनों में कायम महात्मा गांधी राष्टीय ग्रामीण रोजगार योजना /मनरेगा/ ने ग्रामीण आबादी की क्रयशक्ति बढ़ाने में अहम योगदान दिया था। इसके चलते गांवों से शहर की पलायन पर भी थोड़ा असर पड़ा था, यहां तक कि ग्रामीण इलाकों में मजदूरी की दरें भी बढ़ी थीं। सूबा पंजाब की तस्वीरों से सभी रूबरू होंगे जब पंजाब के किसान स्टेशन पर खड़े दिखते थे ताकि बिहार से आनेवाले मजदूरों की ‘अगवानी’ कर सकें। 

याद करें कि कांग्रेस की अगुआईवाली संप्रग सरकार के दिनों में कायम महात्मा गांधी राष्टीय ग्रामीण रोजगार योजना /मनरेगा/ ने ग्रामीण आबादी की क्रयशक्ति बढ़ाने में अहम योगदान दिया था।


2014 में मोदी के सत्तारोहण के बाद ही प्रस्तुत रोजगार योजना को अन्दर से खतम किया जा रहा है। पिछले साल जनाब मोदी ने यह ऐलान भी किया था कि यह योजना ‘कांग्रेस की विफलताओं का जीता जागता स्मारक है।’ इस साल जब योजना को दस साल पूरे हुए तब सरकार द्वारा इस मसले पर यू टर्न लेने की बात की गयी, मगर जमीनी स्तर पर कुछ भी नहीं बदला है।
 
बिराज पटनायक बताते हैं कि मनरेगा के बजट में कटौती जारी है। जहां एक तरफ सरकार की तरफ से कहा गया कि हमने इस साल इस योजना के लिए 43,000 करोड़ रूपए आवंटित किए, मगर वह इस सच्चाई को छिपाता है कि उसमें से 12,000 करोड़ रूपया पिछले साल की मनरेगा मजदूरी का बकाया ही था। और सूखे के इस वर्ष में त्रासदी यह है कि बीते सालों की तुलना में 220 मिलियन मनरेगा दिनों का आवंटन घटा दिया गया है।
 
जहां गरीबों के लिए, भूखमरी की कगार पर खड़े लोगों के लिए खजाने के दरवाजे खोलने में सरकार सकुचाती दिखती है, वहीं दूसरी तरफ इस सरकार को कोई ग़म नहीं कि वह बैड डेब्टस अर्थात खराब कर्जें के नाम पर इस देश के पूंजीपतियों द्वारा सरकारी बैंकों से लिया गया लाखों करोड़ रूपयों का कर्जा मुआफ कर दे, भले ही उससे सरकारी बैंकों का दीवाला पीटने की नौबत आए, भले ही वहां जमा पैसे का अधिकतर हिस्सा आम लोगों की गाढ़ी कमाई से आता हो।
 
7.
रहने को घर नहीं, सारा जहां हमारा !
याद करे बीते साल इसी दौर में प्रधानमंत्राी मोदी ने हर बेघर शहरी गरीब के लिए 2022 तक मकान सुनिश्चित करने का वायदा किया था , जिसके लिए प्रधानमंत्राी आवास योजना की शुरूआत की गयी थी। ऐलान यह किया गया था कि इस साल 30 लाख मकान बनाए जाएंगे ताकि 2022  तक यह लक्ष्य पूरा हो जाए। अगर हम अख़बारी कतरनों को पलटें तो बीते एक साल में महज 1623 मकान बनाए गए, जिनमें से 718 छत्तीसगढ़ में, 823 गुजरात में बनाए गए ह। अगर हम कागज़ों को पलटें तो पता चलता है कि उन पर भी 25 जून 2016 तक महज 7 लाख मकान बनाने की मंजूरी दी गयी।
जनसत्ता में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक ;
 
'ये सभी मकान अफोर्डेबल हाउसिंग की सब स्कीम की के तहत बनाए गए हैं। आवास योजना में चार अलग स्कीम्स हैं। इसमें 1.50 लाख रुपये प्रति यूनिट के हिसाब से बिल्डर, सरकार को सब्सिडी दी जाती है। तमिलनाडु में 82 मकान बनाए गए हैं। ..झुग्गियों का पुनर्विकास स्कीम का सबसे बुरा हाल रहा। इसमें एक भी मकान नहीं बना है। इसके तहत बिल्डर्स झुग्गियों के विकास का बेड़ा उठाएंगे और लोगों को बसाएंगे। इसके बाद जो जमीन बच जाएगी उस पर वे निर्माण कर बाजार रेट पर बेच सकेंगे। ..हाउसिंग सेक्टर से जुड़े कार्यकर्ताओं का कहना है कि प्रधानमंत्राी आवास योजना प्राइवेट सेक्घ्टर पर काफी आश्रित है। इससे पहले यूपीए सरकार की राजीव गांधी आवास योजना में प्रोजेक्ट कोस्ट की 50-75 फीसदी राशि सरकार वहन करती, बाकी का राज्य सरकार और नाममात्रा की राशि लाभार्र्थीीको देनी होती थी। लेकिन एनडीए सरकार ने इस योजना को रद्द कर दिया। '
 
7
निरक्षर अब हो पंचायत के दरवाजों से बाहर
 
हरियाणा विधानसभा ने बहुमत से यह प्रस्ताव पारित किया है कि पंचायत चुनाव लड़ने के लिए आप को न्यूनतम योग्यता की आवश्यकता है। अनुसूचित जातियों एवं महिलाओं के लिए छठवीं-सातवीं की योग्यता तथा सामान्य श्रेणी के लिए हाईस्कूल के प्रमाणपत्र को अब पंचायत प्रमुख के पद के लिए अनिवार्य बनाया गया है जबकि साधारण पंच के लिए अनुसूचित जातियों/महिलाओं के लिए पांचवी कक्षा की योग्यता तय की गयी हैं। अब अगर हम 2011 के जनगणना के आंकड़ों पर गौर करें तो पाएंगे कि इस फैसले से ग्रामीण आबादी का बहुलांश इन चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित हो गया है।
 
इसके तहत ग्रामीण आबादी का महज 16 फीसदी - जो बीस साल से अधिक है - उसकी इतनी शैक्षिक योग्यता है कि वह चुनाव लड़ सकेगा। जनगणना यह भी बताती है कि ग्रामीण आबादी का लगभग 70 फीसदी हिस्सा - जो बीस से अधिक है - वह आठ से अधिक पढ़ा है, जिसकी वजह से वह अनारक्षित सीटों से चुनाव नहीं लड़ सकेगा। इकोनोमिक टाईम्स की रिपोर्ट के मुताबिक इसका अर्थ यही होगा कि लगभग 70 से 84 फीसदी लोग चुनाव लड़ने से अयोग्य हो गए हैं।
 
एक क्षेपक के तौर पर बता दें कि इस मामले में सूबा हरियाणा को अग्रणी नहीं कहा जा सकता, इसके पहले राजस्थान सरकार ने ऐसे नियमों का ऐलान कर दिया था और इसके आधार पर वहां चुनाव भी सम्पन्न हो चुके हैं।
 
और इस तरह अब हरियाणा तथा राजस्थान देश केे ऐसे सूबे हो गए हैं जहां अगर आप विधायक या सांसद का चुनाव लड़ना चाहते हों और निश्चित ही हजारों लाखों पंचायतों ही नहीं देश की बेहतरी के निकायों को सुशोभित करने का इरादा रखते हों तो आप के लिए किसी भी किस्म की शैक्षिक योग्यता की अनिवार्यता नहीं है। 
 
दूसरे, यह समझदारी इस हक़ीकत की अनदेखी करती है कि आज़ादी के बाद साक्षरता के मामलों में हुई तमाम तरक्की के बावजूद आज भी भारत में निरक्षरता का प्रमाण ज्यादा है, यहां तक कि निरक्षरों के मामलों में भारत अव्वल नम्बर पर है।
 
और यह अनुपात अधिकाधिक बढ़ता जाता है, अगर आप किन्हीं वंचित उत्पीड़ित तबकों से ताल्लुक रखते हों। कहने का तात्पर्य इन नए कानून की सबसे अधिक मार अनुसूचित जातियों-जनजातियों- महिलाओं एवं अल्पसंख्यक तबकों पर दिखाई दे रही है।  साक्षरता के मामले में भारत में जो जेण्डर विभाजन है, वह भी रेखांकित करनेलायक है। 2011 के जनगणना आंकड़ों के मुताबिक प्रभावी साक्षरता दर - सात साल और उससे बड़े - पुरूषों के लिए 82 फीसदी है तो महिलाओं के लिए 65 फीसदी है। 
 
चाहे सूखापीड़ितों की उपेक्षा हो या बेघरों की अनदेखी आप तमाम ऐसी बातें गिना सकते हैं जो जनतंत्र के अभिजनतंत्र में तब्दील होते जाने की परिघटना को रेखांकित करते हैं।
निश्चित ही हमारी बेआरामी जनतंत्र के अभिजनतंत्र बनने की - हमारे सामने उदघाटित होती परिघटना तक सीमित नहीं है।
 
8.
गांव गांव हिन्दु राष्ट / दीर्घकालीन हिन्दुत्व का अटाली माडल
विराज पटनायक की रिपोर्ट पलट रहा था और बरबस मेरे उस मित्र से मुलाकात हुई जो कुछ वक्त पहले ही अटाली से लौटा था। मैं जानता हूं कि दिल्ली से बरबस पचास किलोमीटर दूर बसे इस गांव की अब कोई बात नहीं करता। अब चीजें वहां स्थायी हो गयी हैं।
 
2011 की जनगणना के मुताबिक इस गांव में लगभग 1200 मकान हैं और आबादी सात हजार के आसपास है। पिछले साल जब वहां मस्जिद के बहाने तनाब फैलाया गया तब गांव की सभी मुस्लिम आबादी - जिनकी तादाद 400 के करीब थी - पलायन कर गयी, जिनमें से 150 लोग जिनमें महिलाएं एवं बच्चे थे वह बल्लभगढ़ थाने में सप्ताह भर रूके रहे। बाद के घटनाक्रम से सभी वाकीफ हैं, उसे दोहराने के बजाय अगर लम्बी सी बात को मुख्तसर में कह दें तो आज की तारीख में /बकौल प्रोफेसर सतीश देशपांडे/ 
 
‘दीर्घकालीन हिन्दुत्व का यह ‘अटाली मॉडल’ है। ऐसे मॉडल में हत्या, बलात्कार या मुसलमानों के जबरन विस्थापन की राजनीतिक तौर पर महंगे कदमों की आवश्यकता नहीं है। इसके बजाय, इसमें सामान्यीक्रत उत्पीड़न की प्रणाली विकसित की गयी है जिसमंे मुसलमान खुद अपने दोयम दर्जे की स्थिति को बनाए रखने में स्थायी सहभागी बनेंगे।
 
इसमें मुख्य तत्व है ऐसी शर्तों का लागू किया जाना जो उनकी नागरिकत्व के विस्तार एवं गुणवत्ता को सीमित करता है। एक बार जब दोयम दर्जे की नागरिकता की बात को वैधता प्रदान की जाती है, तब शान्तिपूर्ण सहअस्तित्व, साझी संस्क्रति, हिन्दु धर्म की अन्तर्निहित सहिष्णुता आदि की पुरानी बातों को -गर्व के साथ - निःसंकोच दोहराते रहा जा सकता है। (20 जून 2015, द हिन्दू)
 
अटाली के बहाने बरबस मुझे एक दशक से अधिक वक्त पहले राजस्थान के भिलवाडा की फैक्ट फाइंडिग टीम का अनुभव याद आया जब पीयूसीएल की तरफ से मैं वहां पहुंचा था। साम्प्रदायिक तनाव कई गांवों में फैलाया गया था। एक गांव से सम्पन्न मुसलमानों को खदेड दिया गया था, हां कहने के लिए एक गरीब मुसलमान के परिवार को ‘नमूने‘  के तौर पर रखा गया था, जो वैसे भी गांव में मजदूरी करता था और भाग नहीं सकता था, जिसका इस्तेमाल किसी बाहरी व्यक्ति को यह बताने के लिए होता था कि गांव में सबकुछ सामान्य है और जो लोग छोड़ गए हैं, वह स्वेच्छा से गए हैं।
 
कोई यह कह सकता है कि एक सेक्युलर मुल्क में जबकि कानून के सामने सभी समान बताए जाते हैं, यह कैसे मुमकिन हो सकता है?
 
चाहे अटाली हो या भिलवाड़ा का वह गांव। दरअसल साम्प्रदायिकों के लिए न संविधान बाधा है या उसकी आए दिन खाये जानेवाली कसमें बाधा हैं। वह रफता रफता अपने मिशन में लगे हैं।

चाहे अटाली हो या भिलवाड़ा का वह गांव। दरअसल साम्प्रदायिकों के लिए न संविधान बाधा है या उसकी आए दिन खाये जानेवाली कसमें बाधा हैं। वह रफता रफता अपने मिशन में लगे हैं।
 
संविधान औपचारिक तौर पर बदलने की कोशिश भी करते रहते हैं, उसके बारे में बात भी करते हैं, मगर उन्होंने समानान्तर ट्रैक /रास्ता खोल रखा है और ‘गांव गांव में हिन्दु राष्ट’ बना रहे हैं। याद कर सकते हैं कि 21 वीं सदी की पहली दहाई की शुरूआत में सूबा गुजरात में इसके बारे में आधिकारिक बोर्ड भी लगे मिलते थे, मगर वह समझ गए हैं कि बोर्ड से बदनामी होती है, अन्तर्वस्तु में बदलाव कर दो।
 
और यह महज धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ ही नहीं घटित हो रहा है। आप इसी हरियाणा में कई गांवों को देख सकते हैं, जहां से दलितों को खदेड़ दिया गया और वह दरबदर भटक रहे हैं। आज से लगभग 12-13 साल पहले हरसौला का प्रसंग अभी भी याद है।
 
हुकूमत बदली, चौटाला की जगह हुडडा आए, मगर उनकी बेदखली पर कोई असर नहीं पड़ा। मैं खुद उस गांव नहीं गया, मगर हरियाणा के सामाजिक कार्यकर्ता किसी ‘देवीपुनिया’ नामक गांव के बारे में बताते हैं, जो उस वक्त़ बना था जब मुख्यमंत्राी देवीलाल थे और विपक्ष के नेता कोई पुनिया थे। प्रभुत्वशाली जातियों का इतना दबदबा था कि उन्हें नाराज करने के बजाय दलितों के लिए नयी बस्ती ही बसा दी गयी, जिसका नाम ‘देवीपुनिया’ रख दिया गया।
 
8.
इधर गोहत्या उधर ईशनिन्दा
ख़बर राजस्थान के चित्तोडगढ के पास छोटी सदरी से आयी थी। इस ख़बर के मुताबिक गाय के व्यापारी अल्पसंख्यक समुदाय के चार लोगों का- जो टक से उन्हें कहीं ले जा रहे थे, स्थानीय गोरक्षा दल के सदस्यों ने पीछा किया और कथित तौर पर पुलिस की मौजूदगी में उन्हें मारा पीटा। और बाद में पुलिस ने इन चार व्यापारियों पर ही जानवरों के खिलाफ क्रूरता बरतने के लिए मुकदमे दर्ज किए।

चित्तोडगढ की इस ख़बर ने अभी चन्द रोज पहले पंजाब हरियाणा उच्च अदालत के उस हालिया फैसले की याद ताज़ा कर दी थी जिसमें उसने कहा था कि गाय की रक्षा के नाम पर बने समूह एवं संगठन किस तरह कानून की खुलेआम अवहेलना करने में लगे हैं। अदालत का कहना था कि ‘‘गोरक्षा की दुहाई देते हुए बने हुए कथित प्रहरी समूह जिनका गठन राजनीतिक आंकाओं एवं राज्य के वरिष्ठ प्रतिनिधियों की शह पर हो रहा है, जिनमें पुलिस भी शामिल है, वह कानून को अपने हाथ में लेते दिख रहे हैं।’ 
 
मालूम हो अदालत उत्तर प्रदेश के मुस्तैन की कुरूक्षेत्रा में हुई अस्वाभाविक मौत के मसले पर उसके पिता ताहिर हुसैन द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी। 
 
इकोनोमिक टाईम्स में लिखे अपने आलेख में  हरियाणा के गुड़गांव के पास स्थित वजीराबाद इलाके से अल्पसंख्यक समुदाय के तीन व्यक्तियों की गिरफतारी की घटना पर फोकस करते हैं जिन्हें कथित तौर पर बीफ बेचने के नाम पर पकड़ा गया। उनके मुताबिक
 
हरियाणा सरकार द्वारा बनाए गए नएहरियाणा गोवंश संरक्षण एवं गोसंवर्द्धन अधिनियम, 2015 के तहत - जिसने पंजाब प्रोहिबिशन आफ काउ स्लॉटर एक्ट, 1955 का स्थान ग्रहण किया है, सबइन्स्पेक्टर के उपर रैंक का कोईभी पुलिस अधिकारी इस बात को प्रमाणित कर सकता है कि कि अभियुक्त के पास से बरामद मीटअफीमहै। वजीराबाद के मामले में स्थानीय गोरक्षा टीम के साथ चल रहे पशुओं के डॉक्टर ने देख कर प्रमाणित किया कि वह मीट बीफ ही है, जबकि अभियुक्तों का कहना है कि वह भैंसे का मीट है। मगर अब अभियुक्तों द्वारा समूचे सबूतों को नष्ट कर दिए जाने के कारण उनके पास अपनी बेगुनाही साबित करने का कोई रास्ता नहीं बचा है।
 
ध्यान रखें कि पशुओं के डॉक्टर ने मीट के सैम्पल को प्रयोगशाला में भेजना भी मुनासिब नहीं समझा, उसी ने ‘देख कर’ प्रमाणित कर दिया। 
 
चाहे चित्तोडगढ़ की छोटी सदरी की घटना हो या वजीराबाद का प्रसंग हो या मुस्तैन की हत्या का प्रसंग हो गोरक्षा के नाम पर कानून हाथ में लिए जाने की घटनाएं आए दिन सुनने को मिलती हैं।
 
पिछले साल के अन्त में हरियाणा के पलवल में मांस ले जा रहे एक टक पर स्वयंभू गोभक्तों की ऐसी ही संगठित भीड़ ने हमला कर दिया , अफवाह फैला दी गयी कि उसमें गोमांस ले जाया जा रहा है। पूरे कस्बे में दंगे जैसी स्थिति बनी। उधर पुलिस पहुंची और उसने चालक एवं मालिक पर कार्रवाई की। ऐसी कार्रवाइयों को अब उपर से किस तरह शह मिलती है, इसका सबूत दूसरे दिन ही दिखाई दिया जब सरकारी स्तर पर यह ऐलान हुआ कि गोभक्तों के नाम पर पहले से दर्ज मुकदमे वापस होंगे। 
 
कानून के राज को ठंेगा दिखा कर की जा रही ऐसी वारदातों ने  राष्ट्रव्यापी शक्ल धारण की है। 
 
अक्तूबर 2015 में सहारनपुर के बीस साला व्यक्ति को हिमाचल प्रदेश के नाहन जिले में साराहन गांव के पास लोगों ने पीट कर मार डाला था और उसके साथ चल रहे चार लोगों को पीट दिया था। इन पर आरोप लगाया गया कि यह गायोें की स्मगलिंग करते हैं। अभी पिछले ही माह 29 अप्रैल को जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्राी सुश्री मेहबूबा मुफती ने पंजाब के मुख्यमंत्राी प्रकाश सिंह बादल को लिखा कि राजय मटन बिक्रेता और आयातक को पंजाब में आए दिन प्रताडित किया जा रहा है। 
 
वैसे गाय के नाम पर जनतंत्रा के तमाम मूल्यों को ताक पर रख कर फैलायी जा रही यह संगठित हिंसा बरबस पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में ईशनिन्दा के नाम पर फैलायी जा रही संगठित हिंसा की याद ताज़ा करती है। जिस तरह पाकिस्तान में ईशनिन्दा का महज आरोप लगाना ही काफी होता है, बाकी जलाने फंूकने मारने का काम आहत भावनाओं की भरपाई के नाम पर आमादा उग्र इस्लामिस्ट समूह खुद करते हैं या करवाते हैं, वहीं हाल भारत में अब गाय को लेकर हुआ है। यहां भी महज हंगामा करना काफी है। 
 
वह सभी जो गोरक्षा या गोभक्ति के नाम पर अंजाम दी जा रही इस हिंसा को औचित्य प्रदान करते हैं या उसके प्रति अपनी आंखें मूंदे हुए हैं, उन्हें बस यही याद रखना चाहिए कि यह फिसलन भरा रास्ता भारत के ‘दूसरे पाकिस्तान’ बनने में परिणत होता दिखता है।
 
9.आपातकाल से बड़ी चुनौती
 
2014 में जनाब मोदी के सत्तारोहण के बाद गुजरात का पलीटाना सूर्खियांे में था, जहां जैन लोगों के कई मंदिर हैं। जैन समुदाय के लोगों ने अपने धर्मगुरूओं की अगुआई में भूख हड़ताल इस बात के लिए की कि पलीटाना को ‘पवित्र क्षेत्रा’ घोषित किया जाए तथा वहां से अंडा, मांस, मछली की बिक्री या सेवन को समाप्त किया जाए।
 
हालांकि पलीटाना में जैन लोगों की आबादी अधिक नहीं है तथा शेष समुदायों का बहुलांश मांसाहारी रहा  है, सरकार ने आननफानन में जैन लोगों की मांग मान ली और न केवल लोगों के आहार के अधिकार पर बल्कि ऐसे हजारों लोगों के जीवनयापन पर हमला बोल दिया जो किसी न किसी रूप में उस धंधे में लिप्त थे। और पलीटाना कोई अपवाद नहीं है। ऐसे तमाम नगर, शहर आज देश में मौजूद हैं जिन्हें समुदायविशेष की भावनाओं को मददेनज़र रखते हुए ‘पवित्रा क्षेत्र’ घोषित किया गया है।
 
एक बहुधर्मीय मुल्क में - जहां नास्तिकों, निरीश्वरवादियों की तादाद कम नहीं है - ऐसे फैसले किस तरह के भारत को गढ़ेगे इस बात का महज अन्दाज़ा लगाया जा सकता है।
 
अख़बारों की यह कतरनें आखिर क्या बताती हैं ? दरअसल आज हम इस सम्भावना से रूबरू हैं कि जनतंत्र के रास्ते किस तरह बहुसंख्यकवाद का शासन कायम हो सकता है। दो साल पहले सम्पन्न चुनाव इस बात की एक झलक दिखलाते हैं कि ‘हम’ और ‘वे’ की यह गोलबन्दी किस मुक़ाम तक पहुंच सकती हैै। निचोड़ के रूप में कहें कि अगर आप के विश्वदृष्टिकोण में ‘अन्य’ कहे गये समुदायों, समूहों के लिए कोई जगह नहीं भी हो, आप उन्हें सारतः दोयम दर्जे के नागरिक बनाना चाहते हों, तो भी कोई बात नहीं, आप ‘हम’ कहे जा सकनेवाले समुदाय को गोलबन्द करके सिंहासन पर बिल्कुल जनतांत्रिक रास्ते से आरूढ हो सकते हैं। 
 
आज से ठीक 66 साल पहले देश को संविधान सौंपते वक्त जिस किस्म के भारत के निर्माण का तसव्वुर किया गया था, जिसकी कल्पना की गयी थी, उससे बिल्कुल अलहदा पसमंज़र फिलवक्त़ हमारे सामने है।
आप सभी जानते ही हैं कि यह एक ऐसी संसद है जहां सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय का सबसे कम प्रतिनिधित्व दिखता है। और पहली दफा एक ऐसी पार्टी हुकूमत में आयी है, जिसके 272 सांसदांे में से महज दो सदस्य अल्पसंख्यक समुदायों से हैं, और जोर देने वाली बात यह है कि देश के सबसेे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय का एकभी सदस्य उसमें नहीं है। 
 
निश्चित ही यह महज खास समुदाय विशेषों की उपस्थिति या कम उपस्थिति या अनुपस्थिति से जुड़ा मामला नहीं है।
 
यह विभिन्न रूपों में प्रतिबिम्बित हो रहा है। 
 
पहले आप सत्य को उद्घाटित करने के लिए लिखते थे, आप तथ्यों को जुटाते थे और सत्यान्वेषण करते थे, इस बात की फिक्र किए बिना कि इसकी वजह से किस संगठन, किस समुदाय की ‘भावनाएं आहत होंगी।’ और अब ‘आहत भावनाओं का खेल’ इस मुकाम पर पहुंच गया है कि कई चर्चित किताबें लुगदी बनाने के लिए भेज दी गयी हैं और कई अन्य को लेकर उसी किस्म का खतरा मंडरा रहा है। 
 
मिसाल के तौर पर ‘द हूट’ नामक वेबसाइट /द्वारा किए गए अध्ययन में यह बात आंकड़ांे के जरिए स्पष्ट की गयी है कि किस तरह मौजूदा वर्ष अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए ख़राब वर्ष कहा जा सकता है। 
 
अध्ययन के मुताबिक साल के शुरूआती तीन महिनों में ही 19 लोगों पर राजद्रोह के 11 मामले दर्ज किए गए जबकि विगत दो वर्षों में इसी कालखंड में ऐसा एकभी केस दर्ज नहीं हुआ था। डिफेमेशन अर्थात बदनामी के नाम पर भी दर्ज मामलों में छलांग दर्ज की गयी जहां इन तीन महिनों में 27 केस दर्ज हुए तो विगत साल महज 2 केस दर्ज हुए थे। 
 
तुलनात्मक टेबिल
मामले वर्ष 2014 2015 2016
देशद्रोह 0 0 11 मामले, 19 लोग
बदनामी/डिफेमशन 4 2 27
मौतें 0 1 1
हमले 5 5 1 5
सेन्सरशिप 16 2 17
धमकियां 5 1 7
 
जैसा कि उपर के टेबिल से स्पष्ट है कि 2016 में सेन्सरशिप की घटनाओं में भी उछाल देखा गया जबकि वर्ष 2015 के पहली तिमाही में महज दो केस हुए थे जबकि 2016 की प्रथम तिमाही में 17 मामले दर्ज किए गए।
 
 इनमें सबसे विवादास्पद था कामेडियन किकू शारदा को एक आध्यात्मिक डेरे के मुखिया की नकल करने के लिए गिरफतार किया जाना और उर्दू लेखकों को नेशनल कौन्सिल फार प्रमोशन आफ उर्दू लैग्वेज की तरफ से दिया गया यह निर्देश कि अगर वह अपने प्रकाशन के लिए सरकारी सहायता चाहते हैं तो उन्हें यह अंडरटेकिंग लिख कर देना होगा कि उनकी रचना में राष्टविरोधी कुछ भी नहीं है। भारतीय भाषाओं में से किसी के लिए पहली दफा ऐसी शर्त रखी गयी थी।
 
अगर हम बेहद ठंडे दिमाग से देखने की कोशिश करें तो आप यहभी महसूस कर सकते हैं कि जनतंत्र के लिए जिस चैलेंज की हम बात कर रहे हैं, वह एक तरह से आपातकाल द्वारा उपस्थित चुनौती से भी कई गुना बड़ा है। आपातकाल, जब मोहतरमा इंदिरा गांधी ने जनान्दोलनों से आतंकित होकर ‘आन्तरिक सुरक्षा का हवाला देते हुए’ नागरिक आज़ादियों को, जनतांत्रिक अधिकारों को सीमित किया था, हजारों लोगों को जेल में ठंूसा था, तब कमसे कम यह दिख रहा था कि किस किस्म के अधिनायकवादी कदमों से हम रूबरू हैं, मगर आज ऐसे कोई प्रत्यक्ष अधिनायकवादी कदम नहीं हैं, मगर जनतंत्र के आवरण में बहुसंख्यकवाद की यह ऐसी दस्तक है जिसे लोकप्रिय समर्थन हासिल है।
 
10 दक्षिण एशिया में बहुसंख्यकवाद
विडम्बना यही है कि जनतंत्रा के सम्मुख खड़ी बहुसंख्यकवाद की चुनौती महज भारत तक सीमित नहीं है। यूं तो दक्षिणपंथ का उभार वैश्विक है, मगर दक्षिण एशिया के इस हिस्से में बहुसंख्यकवाद का बोलबाला बढ़ रहा है।
 
यह एक किस्म का विचित्र संयोग कहा जा सकता है कि जहां हम भारत की सरजमीं पर साम्प्रदायिक ताकतों की बढ़त के बारे में लोकतंत्रा के बहुसंख्यकवाद में रूपांतरण पर गौर कर रहे हैं, दक्षिण एशिया के इस हिस्से में स्थितियों कमोबेश एक जैसी दिखती हैं जब बहुसंख्यकवादी ताकतें - जो किसी खास धर्म या नस्ल से जुड़ी हुई - उभार पर दिखती हैं। मायनामार/बर्मा, बांगलादेश, श्रीलंका, मालदीव, पाकिस्तान, आप किसी मुल्क का नाम लें और देखें कि किस तरह जनतांत्रिक ताकतें धीरे धीरे हाशिये पर की जा रही हैं और बहुसंख्यकवाद की आवाज़ सर उठा कर बोल रही है।
 
बहुत कम लोगों ने कभी इस बात की कल्पना की होगी कि अपने आप को बौद्ध - जिसे अहिंसा का पुजारी समझा जाता है - का अनुयायी बतानेवाले लोग किसी अलसुबह अपने मुल्क में अल्पसंख्यकों की तबाही एवम उनके कतलेआम को अंजाम देने में मुब्तिला मिलेंगे। मायनामार की घटनाएं इसी कड़वी हकीकत की ताईद करती हैं, जिसे हम रोहिंग्या मुसलमानों की त्रासदी के रूप में भी देख रहे हैं।
 
बमुश्किल से ढाई साल पहले ब्रिटेन के अग्रणी अख़बार ‘गार्डियन’ ने मायनामार के विवादास्पद बौद्ध भिक्खु विराथु पर स्टोरी की थी, जिसे ‘बर्मा का बिन लादेन’ कहा जाता है। गार्डियन के बाद न्यूयॉर्क टाईम्स ने भी उस पर एक लम्बा आलेख उसी विराथु पर प्रकाशित किया था जिसे ‘फेस आफ बुद्धिस्ट टेरर’ अर्थात ‘बौद्ध आतंक का चेहरा’ घोषित किया था। 
 
या आप श्रीलंका देख सकते हैं ‘बोण्डु बाला सेना’ - जिसे बौद्ध भिक्खुओं ने तत्कालीन राष्टपति राजपक्षे के अप्रत्यक्ष समर्थन से शुरू किया, सूर्खियों में रही, जब उसने मुसलमानों पर संगठित हमलों को अंजाम दिया और तत्कालीन सरकार मूकदर्शक बनी रही। दरअसल तमिल उग्रवाद के दमन के बाद सिंहला अतिवादी ताकतों ने - जिसमें बौद्ध भिक्खुओं की अच्छी खासी तादाद है - राजपक्षे सरकार के मूक समर्थन से ताकत पाते हुए ‘नए दुश्मनों’ को ढंूढने का सिलसिला भी तेज किया था।
 
अगर वहां मुसलमान सिंहला उग्रवादियों के निशाने में सबसे उपर थे तो ईसाई और हिन्दू कोई खास पीछे नहीं थे। दो साल पहले डम्बुल्ला नामक स्थान पर बौद्ध भिक्खुओं की अगुआई में सिंहला उग्रवादियों ने इलाके में स्थित मस्जिदों, मंदिरों और चर्च पर यह कहते हुए हमला किया कि यह बौद्धों के लिए ‘पवित्रा स्थान’ है और ‘अन्य’ लोगों को यहां पर प्रार्थना करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। 
 
या आप बांगलादेश को देखें या पड़ोसी पाकिस्तान को देखें जहां आप पाते हैं कि किस तरह इस्लामिस्ट ताकतें ‘अन्य’ लोगों की जिन्दगी के साथ खिलवाड़ कर रही हैं। यह सही है कि सेक्युलर आन्दोलन की लम्बी परम्परा के चलते बांगलादेश में औपचारिक तौर पर स्थितियां काबू में दिखती हैं, मगर वहां जिस तरह तर्कशीलता के प्रचार में मुब्तिला ब्लॉगर्स को, अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को एक के बाद एक कटटरपंथी इस्लामिस्टों द्वारा निशाना बनाया जा रहा है और सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी है, वह खतरे की घंटी बजाता प्रतीत होता है।
 
अब पाकिस्तान तो इस मामले में चरम सीमा पर पहुंचा दिखता है जहां विभिन्न अतिवादी समूहों द्वारा ‘अन्य’ के खिलाफ - फिर चाहे शिया होें, अहमदिया हों, हजारा हों या हिन्दू हों - अंजाम दी जा रही हिंसक कार्रवाइयों ने उसे अन्तःस्फोट की कगार पर ला खड़ा किया है।
 
इस पूरे परिद्रश्य में रेखांकित करनेवाली बात यह है कि
 
- उत्पीड़क समुुदाय का स्वरूप बदलता है ज्यों ही हम मुल्क की सीमाओं को लांघते हैं। दरअसल, हम भूमिकाओं की अदलाबदली देखते हैं। सरहद के इस पार उत्पीड़क दिखनेवाला धार्मिक, नस्लीय समुदाय सरहद के उस पार पीड़ित समुदाय में रूपांतरित होता दिखता है।
- एक किस्म का अतिवाद दूसरे को मजबूती प्रदान करता है और यह भी देखने में रहा है कि उनके बीच भी तरह तरह के गठजोड़ बन रहे हैं।
 
किस तरह इन अतिवादियों में एक दूसरे के करीब आने तथा तीसरे को निशाना बनाने की कोशिशें चल रही हैं, इसे जानना हो तो पहले संघ के वरिष्ठ नेता / जो इन दिनों भाजपा में ‘भेजे गए हैं’ / राम माधव को उदगारों को देख सकते हैं जो उन्होंने विवादास्पद संमझी जानेवाली ‘बोण्डु बाला सेना’ की तारीफ में अपने फेसबुक पेज पर लिखे थे
 
बोण्डु बाला सेना - श्रीलंका का नया बौद्ध आन्दोलन
 
बोण्ड बाला सेना /बीबीएस - एक बौद्ध संगठन जिसे कुछ लोग दक्षिणपंथी और अति दक्षिणपंथी के तौर पर सम्बोधित कर सकते हैं - वह आज श्रीलंका में नयी परिघटना है। हम उन्हें जैसा चाहें ब्राण्ड कर सकते हैं, मगर हकीकत यही है कि यह नया संगठन प्रभाव और लोकप्रिय समर्थन के मामले में देश के बौद्ध प्रभुत्ववाले इलाकों में तेजी से बढ़ रहा है। ..
अब तक इस संगठन ने जो मुददे उठाए हैं उन पर सक्रियता से और सहानुभूति से सोचने की जरूरत है।
 
दक्षिण एशिया के इस हिस्से में इस्लाम नामक ‘साझा दुश्मन’ के खिलाफ गतिविधियों को समन्वित करने की कोशिशों को तब जोर मिला था जब बर्मा के कुख्यात विराथू ने पिछले साल श्रीलंका को भेंट दी थी। बोण्डु बाला सेना के सम्मेलन को सम्बोधित करने के लिए वह पहुंचा था। विराथू को वीसा न देने की ईसाई, मुस्लिम तथा अन्य जनतांत्रिक संगठनों की मांग की राजपक्षे सरकार ने खुल्लमखुल्ला अनदेखी की थी। विराथू और बोण्डु बाला सेना की बैठक के बाद इलाके को ‘शान्ति का इलाका’ बनाने के लिए संघ को साथ आने की अपील इन दोनों संगठनों ने की थी।
 
 ‘न्यूयॉर्क टाईम्स’ ने ‘मुसलमानों के खिलाफ आकार ले रहे इस खतरनाक गठजोड़’ पर टिप्पणी करते हुए लिखा था |
 
‘‘ ‘.. अब अन्तरराष्टीय स्तर पर साथ आने का वक्त़ गया हैयह कहना था श्रीलंका के रैडिकल बौद्ध संगठनबोण्डु बाला सेनाके नेता गालागोदाथथे गनानासारा का, जिसका ऐलान उन्होंने पिछले माह कोलम्बो में आयोजित कन्वेन्शन में किया। इस कन्वेन्शन में मुख्य अतिथि थे अशिन विराथू, बौद्ध अतिवादी जिसके चित्रा कोटाईमपत्रिका ने अपने 1 जुलाई के अंक में कवर पर यूं दिया था ‘‘बौद्ध आतंक का चेहरा’’...... पिछले सप्ताह श्री गनानासारा ने दावा किया कि वह ‘‘उच्च स्तर’’ पर दक्षिणपंथी हिन्दू संगठन राष्टीय स्वयंसेवक संघ के साथ वार्ता कर रहे हैं ताकि दक्षिण एशिया में ‘‘हिन्दू बौद्ध शान्ति क्षेत्रा’’ बनाया जा सके। राष्टीय स्वयंसेवक संघ के प्रवक्ता राम माधव ने हालांकि तत्काल इस बात से इन्कार किया, मगर श्री माधव, जो अब भारत की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के महासचिव हैं, उन्होंने बोण्डु बाला सेना और जनाब विराथू के समूह 969 पर अपने फेसबुक तथा टिवटर पर सहानुभूतिपूर्ण प्रतिक्रिया दी है।
 
एक क्षेपक के तौर पर हम दक्षिण एशिया के इन विभिन्न शासकों के आर्थिक एजेण्डा को भी जांच सकते हैं, जहां सत्ता के गलियारों में या समाज में बहुसंख्यकवादी विचार हावी होते दिख रहे हैं और आप देखेंगे कि वह सारतः नवउदारवादी है।
 
11हमको गुडगवर्नेंस मांगता!’
सियासत के बिना जनतंत्र और अधिकारों के बिना नागरिकत्व
 
जनाब मोदी ने जबसे हुकूमत सम्भाली, तबसे तमाम अन्य नारों के साथ ‘गुड गवर्नंस’ की बात की चर्चा अक्सर होती आयी है। याद कर सकते हैं कि अपनी शुरूआती तकरीरों में जनाब मोदी ने ‘मिनिमम गवर्नमेण्ट, मैक्सिमम गवर्नन्स’ की बात की थी। उस वक्त भी दबी जुबां से आलोचकों ने इस नारे को ‘नवउदारवाद’ के विचारकों की भोंडी नकल उतारना कहा था। बहरहाल, अब जबकि दो साल का कालखण्ड बीत चुका है तब यह पूछना समीचीन होगा कि ‘अच्छे दिन’ ‘ न खाउंगा..’ आदि नारों की तरह गवर्नसं का नारा भी जुमला ही है या वह कुछ ठोस हकीकत बयां करता है।
 
‘एवरीबडी लव्ज गुड गवर्नंस’ शीर्षक अपने लेख में /द हिन्दू/ जानेमाने विश्लेषक जी सम्पथ ने खुद जनाब मोदी को उदध्रत करके पूछा था कि गुड गवर्नंस जिसे वजीरे आजम ‘प्रो पीपल प्रोएक्टिव’ कहते रहे हैं, क्या उनकी सरकार द्वारा उठाए गए कई कदमों को वाकई गुड गवर्नंस का नमूना कहा जा सकता है ? गौरतलब है कि प्रस्तुत लेख तब लिखा गया था जब भूमि अधिग्रहण के प्रस्तावित बिल पर चर्चा जारी ही थी - जिसमें पहले के कई किसानपक्षीय प्रस्तावों को खारिज करके - जिसे सर्वसम्मति से संसद ने /2013/ में पारित किया था - एक नया बिल लाया जा रहा था। जी सम्पथ ने पूछा था: 
 
..is pro-actively cutting public expenditure on health and education, as has been done in this year’s budget, good governance? Or, for that matter, is the dilution of the rights of industrial workers, which is what the proposed labour reforms seek to do, good governance? 
 
इस बात को देखते हुए प्रधानमंत्राी की अपनी वेबसाइट पर भी गुड गवर्नेंस का लम्बा चौड़ा गुणगान किया गया है, यह जानना समीचीन होगा कि आखिर यह ‘बला’ क्या है जिसे हमारी तमाम समस्याओं की रामबाण औषधि के रूप में पेश किया जा रहा है। गुड गवर्नंस के घटक हिस्सों के तौर पर कुछ बातें अवश्य रेखांकित की जा सकती हैं 
सशक्तिकरण/एम्पॉवरमेण्ट, सिटिजन पार्टिसिपेशन/नागरिक सहभागिता, अकौटेबिलिटी/जवाबदेही, ट्रांसपरन्सी/पारदर्शिता
 
आखिर इसे कैसे हासिल किया जा सकता है ?
 
एक तरीका ईगवर्नंस का है, जिसके तहत नए मसविदा बिलों को भी सरकार की वेबसाइट पर डाला जा रहा है और जिसमें जनता की राय मांगी जाती है। इंटरनेट के आगमन/फैलाव का नतीजा यह है कि आप चाहें तो सीधे प्रधानमंत्राी को चिठठी लिख सकते हैं/टिवट कर सकते हैं। पिछले दिनों फेसबुक पर क्रषिमंत्राी ने किसानों को सलाह दे डाली जो उनके हिसाब से उन्हें आत्महत्या के रास्ते से दूर करने के लिए थी।
वैसे जिस तरह इंटरनेट पर आपकी सक्रियता आभासी बनी रह सकती है जिसमें आप को भले ही लगे कि आप के किसी पोस्ट को इतने लोगों ने शेअर किया, मगर उसका जमीनी स्तर पर प्रभाव नगण्य दिख सकता है, वही यह स्थिति है।
 
आप ने वजीरे आजम को या किसी मंत्राीमहोदय को कोई राय दी मगर उस राय पर क्या अमल हुआ, यह जानने के लिए आप के पास कोई रास्ता नहीं है। जिस तरह ‘मन की बात’ के माध्यम से पीएम जनता से ‘बात’ करते हैं, जिसमें रेडिओ सुननेवाले को सम्वाद का आभास होता है, उसी तरह की यह उलट स्थिति है। बीच बीच में ईगवर्नंस पर भरोसा जगाती कुछ ख़बरें भी प्रकाशित होती हैं, जैसे मुश्किल में फंसी किसी महिला द्वारा रेलमंत्राी को टिवट किए जाने पर उनके द्वारा की गई कार्रवाई का समाचार। 
 
120 करोड़ लोगों के लिए बनायी जा रही नीतियों को लेकर अगर हम अपनी वैकल्पिक राय रखते हैं तो जनतंत्रा के सुचारू संचालन के लिए यह आवश्यक है कि लोग इस राय को सड़क पर उतर कर, आंदोलनों के माध्यम से अवगत करा दें, सरकार पर इसके लिए दबाव डालें। अलग अलग आर्थिक तबकों/वर्गों में बंटे समाज में - जहां पूंजीशाहों की लगातार बल्ले बल्ले हो रही है - वहां इस बात की उम्मीद क्या की जा सकती है कि ऐसे तबकों के हितों को ध्यान में रख कर बनायी जा रही नीतियों को लेकर सत्ता में बैठे लोग राय बदल देंगे चूंकि कुछ हजार लोगों ने ईमेल/टिवट के जरिए अपना एतराज जताया है।
निश्चित ही नहीं !
 
जवाबदेही की बात कम महत्वपूर्ण नहीं हैं मगर गुड गवर्नंस के मातहत यह देखना समीचीन होगा कि किसके प्रति जवाबदेही की बात यहां अभिप्रेत है ? यह देखा जा सकता है कि इस सरकार ने सत्ता मे आते ही मनरेगा, स्वास्थ्य, शिक्षा आदि मदों में कटौती की, यह वही मनरेगा थी जिसे खुद ंसंयुक्त राष्टसंघ ने गरीबी निवारण के मामले में सबसे उत्तम योजना के तौर पर घोषित किया था और जिसे मोदी खुद ‘असफल’ घोषित कर चुके थे। क्या ऐसे कदम किसी भी मायने में मौजूदा सरकार की जनता के प्रति जवाबदेही को उजागर करते हैं या बजट कटौती करके संसाधनों का एक हिस्सा पूंजीपतियों के हाथों सौंपनेवाली सरकार की कार्पोरेट क्षेत्रा के प्रति जवाबदेही को।
 
पारदर्शिता के वास्तविक अमल को देखें तो कथनी करनी का फरक यहां भी नज़र आता है। इस सरकार ने सूचना अधिकार कानून को हल्का करने की पुरजोर कोशिश की है, यहां तक कि लम्बे समय तक केन्द्रीय सूचना आयुक्त पद पर किसी की नियुक्ति तक नहीं की है। कहने का तात्पर्य यह है कि गुड गवर्नंस का मॉडल किसी भी किस्म के अधिकार आधारित सशक्तिकरण की मुखालिफत करता है और उसका तसव्वुर व्यक्तिगत उपभोक्तावादी न कि सामूहिक अर्थाें में करता है।
 
इसमें राज्य की आप की नागरिकता तभी विशेष मायने रखती है अगर आप बाज़ार में उपस्थित हो सके। राज्य के संचालन में आप की सहभागिता तभी मायने रखती है जब राज्य द्वारा संचालित/प्रस्तावित परियोजनाओं के संचालन में आप अनुशासित व्यक्ति की तरह शामिल हो, उन्हें राजनीतिक तौर पर चुनौती देने का जोखिम न उठाये। गुड गवर्नंस की खासियत यही दिखती है कि जहां नीतियों को प्रबंधन से प्रतिस्थापित किया जाता है और नीतिनिर्धारण को जनतंत्रा के दबावों से दूर रखा जा सके।
 
कुल मिला कर गुड गवर्नंस बाजार आधारित विकास को उत्प्रेरित करने का रास्ता सुगम करता है और हम ऐसी सरकार से रूबरू होते हैं जो नागरिकों के सामाजिक आर्थिक अधिकारों की गारंटीदार नहीं बल्कि बाज़ार की उत्प्रेरक/फैसिलिटेटर/एनेबलर में तब्दील होती है।
 
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भारत पर केन्द्रित थोड़ी बहुत चर्चा के बाद तथा विश्व की राजनीति की चन्द झलकियां देखने के बाद क्या जनतंत्रा के समक्ष खड़ी चुनौतियों को लेकर हम कुछ सामान्यीकरणों की तरफ बढ़ सकते हैं। मेरी समझ से तीन ऐसी बड़ी चुनौतियां जनतंत्र के रास्ते में खड़ी है जिन्हें ‘वैश्विक पूंजी, सदा झुकने के लिए तैयार (complaiant nation states ) राष्ट्र राज्य और अधिनायकवादी समुदाय’ (totalitarian communities )  के तौर पर चिन्हित किया जा सकता है। (विस्तार के लिए देखें) अगर हम इन चुनौतियों को ठीक से समझें तो एक नयी जमीन तोड़ने की जरूरत समझ में आती है। यह अलग बात है कि जनतंत्र की दिक्कतों को दूर करने के लिए ऐसे ऐसे विकल्प भी हमारे सामने पेश होते हैं कि कई लोग दिग्भ्रमित होते दिखते हैं।
 
पिछले दिनों एक विचार चक्र के दौरान युवाओं के एक समूह के साथ बात करने का मौका मिला था, मैंने वहां मौजूद सहभागियों से यही जानना चाहा कि उनके हिसाब से जनतंत्रा के सामने किन किन किस्म की चुनौतियों से हम आज रूबरू हैं ? आम तौर पर जैसा होता है पहले किसी ने जुबां नहीं खोली, मगर थोड़ीही देर बाद अधिकतर लोगों ने अपनी बात रखी।
 
एक बेहद छोटे मगर मुखर अल्पमत का कहना था कि भारत जैसे पिछड़े मुल्क में, जो इतने जाति, समुदायों, सम्प्रदायों में बंटा है, वहां जनतंत्रा कभी पनप नहीं सकता। उनके लिए इसे ठीक करने का एक ही नुस्खा था कि मुल्क की बागडोर - कमसे कम दस साल के लिए - एक डिक्टेटर के हाथों में सौंप दो, सबकुछ ठीक हो जाएगा। मैने पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान - जो हमारे साथ ही आज़ाद हुआ था - से लेकर अन्य कई मुल्कों का जिक्र किया, जिन्हें भारत की तरह तीसरी दुनिया के देशों में ही शुमार किया जा सकता है, जो लगभग उसी दौरान आज़ाद हुए, मगर जहां लोकतंत्रा कभी जड़ जमा नहीं सका, और उनके साथ भारत की तुलना करने को कहा !
 
मगर वह मानने को तैयार नहीं थे। वह इसी बात की रट लगा रहे थे कि एक ‘अदद डिक्टेटर’ क्यों समस्याओं को ठीक कर सकता है। 
 
वैसे जानकार बता सकते हैं कि एक डिक्टेटर की यह ख्वाहिश समूचे भारतीय समाज के प्रबुद्ध हिस्से में विचित्रा ढंग से फैली दिखती है, जिसका एक पैमाना हम हिटलर - जो अपनी कर्मभूमि में आज भी एक तरह से ‘बहिष्कृत’ है - की आत्मकथा ‘माइन काम्फ अर्थात मेरा संघर्ष’ की भारत के बुकस्टॉलों या पटरी पर लगी दुकानों के बीच ‘लोकप्रियता’ से देख सकते हैं।  एक स्वीडिश राजदूत ने भारत यात्रा के बारे में अपने अनुभवों को साझा करते हुए कहीं लिखा था कि ‘उसे यह देख कर हैरानी होती है कि भारत में किताबों की प्रतिष्ठित दुकानों में भी हिटलर की आत्मकथा देखने को मिलती है, और पुस्तकविक्रेताओं के हिसाब से उनके खरीदार कम नहीं हो रहे हैं। एक तानाशाह के लिए मुन्तज़िर कहे जा सकनेवाले लोगों में से एक तबका उन अभिजातों का दिखता है, जिन्हें यह बात सख्त़ नापसन्द है कि गरीब गुरबा या दमित-उत्पीड़ित तबके के लोग भी इन दिनों सियासत में दखल बना रहे हैं। 
 
बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ा फिर वे जो ‘अदद डिक्टेटर’ के हिमायती थे, उन्हें छोड़ कर कइयों ने ‘संस्थागत जनतंत्रा’ बनाम ‘ प्रत्यक्ष जनतंत्रा’ की बात छेड़ी। उनका कहना था कि संसदीय व्यवस्था के रूप में हमारे यहां जो संस्थागत जनतंत्रा हमारे यहां साठ साल से आकार लिया है, वही समस्याओं की जड़ में है ; जिसमें सहभागी को पांच साल में या नियत समय में एक बार वोट डालने का और अपने शासक चुनने का अधिकार मिलता है, राज्य के रोजमर्रा के संचालन में, नीतिनिर्धारण में उसकी अप्रत्यक्ष भागीदारी ही बन पाती है।
 
उनका कहना था कि राज्यसत्ता के संचालन में लोगों की इस औपचारिक सी भागीदारी को समाप्त कर उसे अगर ठोस शक्ल देनी हो तो ‘प्रत्यक्ष जनतंत्रा’ बेहतर तरीका हो सकता है। इसके अन्तर्गत हर मोहल्ला अपना खुद का घोषणापत्रा तय करेगा, शासन एवं विकास के हर पहलू पर पूरा नियंत्राण कायम करेगा, जहां लोग अपने ‘भले’ के हिसाब से निर्णय लेंगे,  और समुदाय के जीवन में बसे सांस्कृतिक मूल्यों एवं नैतिक मानदण्डों की हिमायत करेगा और उन्हें व्यवहार में लाएगा।
 
मैंने उनसे यह समझने की कोशिश की सम्पत्ति, सत्ता एवं जाति, धर्म, नस्ल आदि के आधार पर बंटे एक विशाल समाज में, जहां अभी भी व्यक्ति के अधिकार की अहमियत पूरी तरह से स्थापित नहीं हो सकी है, जहां वह अगर अपने हिसाब से रहना चाहे, प्यार करना चाहे या जिन्दगी बसर करना चाहे तो उसे तमाम वर्जनाओं से गुजरना पड़ता है, जहां अपनी सन्तानें अगर अपनी मर्जी से शादी करना चाहें तो  पंचायतों के फैसलों के नाम पर उनके मां बाप उन्हें खुद खतम करते हों, या जहां ‘हम’ और ‘वे’ की भावना इतने स्तरों पर, इतनी दरारों पर उजागर होती हो और जहां उत्पीड़ित समुदायों को प्रताडित करने के लिए पुलिस बल पर आतंक मचाने या दंगा कराने की बात बहुत अजूबा न मालूम पड़ती हो, वहां पर उनका नुस्खा कैसे काम करेगा ? मेरी समझ से यह एक सख्त/strong जनतंत्रा की अवधारणा थी जिसमें ‘राज्यसत्ता का विकेन्द्रीकरण किया गया हो और बेहद सक्रिय नागरिक स्थानीय स्वशासन संस्थाओं के माध्यम से उसका संचालन करते हों।’
 
कइयों ने उन तमाम बातों का जिक्र उन्होंने किया, जो उनके दैनंदिन जीवनानुभव पर आधारित थी। यह तमाम ऐसी परिघटनाएं, बातें थी जिनसे उनका रोज का साबिका पड़ता है या मीडिया के माध्यम से आए दिन उनके इर्दगिर्द बहस मुबाहिसा होता रहता है। उनके मुताबिक अगर जनतंत्रा इन समस्याओं का समाधान कर सके तो वह सुचारू रूप से चल सकता है।
 
समस्याओं को लेकर उनके बहुमत का यही मानना था कि अगर प्रणालियां ठीक से चलने लगें, कानून ठीक से काम करे तो इन चुनौतियों से निजात पायी जा सकती है। लुब्बेलुआब यही था कि जनतंत्रा की प्रणाली - फिर चाहे न्यायपालिका हो, कार्यपालिका हो, विधायिका हो - ठीक से काम करने लगें तो सबकुछ बेहतर हो जाएगा। कहीं भी इस बात की ओर संकेत नहीं था कि एक पिछड़े समाज में जनतंत्रा के आरोपण में और एक विकसित समाज में जनतंत्रा के आगमन में क्या कोई अन्तर हो सकता है या नहीं। और क्या ऐसी प्रणालियां सामाजिक बनावट की छाप से स्वतंत्रा रह सकती हैं ? शायद प्रत्यक्ष जनतंत्रा का सम्मोहन ‘आप’ की फौरी सफलता में भी दिखता है।
 
13.
At a certain point in their historical lives, social classes become detached from their traditional parties. In other words, the traditional parties in that particular organisational form, with the particular men who constitute, represent, and lead them, are no longer recognised by their class (or fraction of a class) as its expression.[5]
  -Antonio Gramsci, Selections from the Prison Notebooks of Antonio Gramsci (London: Lawrence & Wishart, 1971), p. 210.
 
‘आप’ के बारे में उदारवादी तबके को भी यह बात आकर्षित करती रही है कि वह जनतंत्रा के रूपों और प्रक्रियाओं की समीक्षा करना चाहता है। गौरतलब है कि संसद-विधानसभा की जनतंत्रा की प्रातिनिधिक प्रणाली के बरअक्स एक सघन सहभागितापूर्ण ग्रासरूट जनतंत्रा का विचार कइयों को आकर्षित करता रहा है।
 
चाहे ग्राम स्वराज्य के नाम पर हो या ‘मोहल्ला कमेटियां’ हो उनके जरिए राज्य के विकेन्द्रीकरण की बात  - जो एक तरह से मजबूत अर्थात स्टॉग डेमोक्रेसी में परिणत होती है - के तहत सक्रिय नागरिक स्थानीय स्वशासन के माध्यम से सत्ता संचालन करेंगे, यह बात कही जाती है। ‘आप’ ने जब अपनी पहली सरकार के गठन के पहले प्रचार में मोहलला कमेटियों की बात कही तो मध्यमवर्ग के एक हिस्से को यह भी लगा कि यह एक तरह से व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव लाना है। आम जन के सशक्तिकरण का यही रास्ता उन्हें समझ में आया।
 
विडम्बना यही है कि सहभागितापूर्ण जनतंत्रा बनाने के इस ‘आकर्षक’ दिखनेवाले विचार पर अधिक चर्चा यहां के प्रबुद्ध तबके में भी नहीं हो सकी है। इस सम्बन्ध में डा रवि सिन्हा के काफिला डाट आर्ग पर लिखे आलेख /लेसन्स फार द सेनर सेगमेण्टस आफ द मार्जिन्स/ कुछ महत्वपूर्ण बात की चर्चा की गयी है। /
 
‘‘निश्चित ही लोगों के सशक्तिकरण के मकसद से कोई इन्कार नहीं करेगा, मगर जब हम स्टॉग अर्थात सशक्त/मजबूत जनतंत्रा की बात करते हैं तो व्यापक परिद्रश्य को कहीं भूल जाते हैं। अधिक से अधिक स्टॉग जनतंत्रा संवैधानिक-प्रातिनिधिक-लिबरल जनतंत्रा में पूरक भूमिका अदा कर सकता है। ऐसी संरचना के बिना और जनतांत्रिक परम्परा के अभाव में वह काम नहीं कर सकता। बुरी स्थिति यह भी आती है कि स्टॉग अर्थात मजबूत जनतंत्रा का विचार जनतंत्रा के साथ ही कहर बरपा कर दे। ऐसे उदाहरण अनगिनत हैं। हमारी खाप पंचायतें या दुनिया भर में फैले आदिवासी पंचायतें इसका मूर्तिमान उदाहरण हैं।.
 
वह आगे इस बात की भी चर्चा करते हैं कि जनतंत्रा का अर्थ महज राज्य और सत्ता की अन्य संरचनाओं का गठन नहीं बल्कि वह व्यक्तिगत नागरिकों के लिए अधिकारों, आज़ादियों और पसंदगियों के एक दायरे का भी निर्माण करता है। 
 
इस बात को मददेनज़र रखते हुए कि सभी सत्ता संरचनाएं स्वतंत्राता के लिए अन्ततः बाधक होती है। मानवीय प्रगति का लक्ष्य होता है उन्हें अधिकाधिक पारदर्शी और तरल बनाते जाना ताकि अन्तत‘ उनका विलोपीकरण हो। लम्बे दौर में राज्य के विलोपीकरण को इसी तरह समझा जा सकता है। यह वास्तविक तौर पर घटित होता है या नहीं, इसी बात को रेखांकित करता है कि जनतंत्रा और राज्य संरचना के वांछनीय रूप कैसे हों। राज्य को चाहिए कि वह अधिकाधिक सिकुडता जाये और जीवन के तमाम दायरों को अपनी पकड़ से बाहर मुक्त कर दे।.. पूंजीवाद के तहत भी राज्य को पारदर्शी होना चाहिए जो तभी सम्भव हो सकता है जब वह नियमों से चले, संवैधानिक हो।
 
जो लोग यह सोचते हैं कि मजबूत जनतंत्रा से राज्य को पारदर्शी बनाया जा सकता है, वह गलति कर रहे हैं। मजबूत जनतंत्रा दरअसल राजनीतिक प्रक्रिया को सघन कर देता है। नीतियों की रूपरेखा बनाने और उस पर अमल को वह अधिक अपारदर्शी बनाता है। अधिक महत्वपूर्ण यह है कि मजबूत जनतंत्रा के लिए यह मुमकिन नहीं होता कि वह आधुनिक युग के जनतांत्रिक मूल्यों का समान रूप से स्वीकार करे। अगर इसके बारे में किसी को सन्देह हो तो हम खाप पंचायतों के अनुभव को देख सकते हैं।
 
‘आप’ का आगमन हमंे यहां की जनमी परिघटना लग सकती है, मगर इसी किस्म के प्रयोगों को हम दुनिया के अलग अलग भागों में देख सकते है, जिसे ‘आक्सफोर्ड लेफट रिव्यू’ के अपने लेख  ‘एण्टी पालिटिक्स एण्ड नीओलिबरेलिजम’ (Anti-politics and the Illusions of Neoliberalism) में टैड टिटजे और एलिजाबेथ हम्फरीज ‘एण्टी पोलिटिकिल अर्थात राजनीतिविरोधी दौर’ के तौर पर सम्बोधित करते हैं।
उनके मुताबिक
 
बीसवीं सदी के बाद जब पश्चिमी समाजों ने जनप्रातिनिधिक संस्थाओं के उदय और सुद्रढीकरण को अनुभव किया, जब करोड़ों लोगों ने स्वीकारा कि अपने सामाजिक हितों को आगे बढ़ाने के लिए मुख्य तरीका राजनीति ही है, हम देख रहे हैं कि यह प्रणालियां अब चरमरा गयी हैं, बेकार हो चुकी हैं।
 
वह इस बात का भी उल्लेख करते हैं कि किस तरह हाल के समयों में इस ‘एण्टी पॉलिटिक्स ने राजनीतिक प्रक्रियाओं के प्रति विशेष प्रतिकूल रूख अभिव्यक्त करते हुए व्यापक सामाजिक आन्दोलनों को जन्म दिया है। उनके मुताबिक यूं तो सदी की शुरूआत में खड़े हुए वैश्विक न्याय आन्दोलन के शुरूआती वर्षों में यह पहलू एक हद तक मौजूद था, मगर कुछ साल ‘तहरीर स्केयर’ आदि प्रयोगों के साथ यह पहलू बेहद जोरदार ढंग से उपस्थित हुआ है। वह आगे बताते हैं कि स्पेन के देशज लोगों के जोरदार साबित हुए आन्दोलन का एक प्रमुख नारा ही था ‘नो नॉस रिप्रेजेन्टान’ अर्थात ‘वे हमारी नुमाइन्दगी नहीं करते है’ जिसमें सभी स्थापित पार्टियों को जनता से दूर बताया गया था। क्या इस नारे में हमें अण्णा आन्दोलन के उस नारे की प्रतिध्वनि नहीं सुनायी देती, जिसमें सभी पार्टियों को चोर कहा गया था और अप्रासंगिक घोषित किया गया था।
 
अण्णा आन्दोलन - जिसकी कोख से ‘आप’ का जन्म हुआ, उसकी अपनी यात्रा पर गौर करें। भ्रष्टाचार मिटाने के लिए जिस जनलोकपाल नामक जादूई लगनेवाली छड़ी का प्रस्ताव उन दिनों रखा गया और उसे ही केन्द्रीय मांग पेश किया गया, जिसे भले ही मध्यवर्ग ने हाथों हाथ लिया, मगर उसमें न भ्रष्टाचार की समग्र समझदारी पेश हो रही थी और न ही इस बात पर विचार हो रहा था कि जनलोकपाल की मांग किस तरह संविधान के बुनियादी उसूलों के खिलाफ पड़ती दिखती है।
 
अब कल्पना ही कर सकते हैं कि भ्रष्टाचार जैसे केन्द्रीय मांग को लेकर भी वस्तुनिष्ठ ढंग से सोचने में इन्कार करनेवाला आन्दोलन और अपने चिन्तन की दिक्कतों से विगत साठ साल से अधिक समय से संवैधानिक प्रक्रियाओं को मिली वैधता को प्रश्नांकित करनेवाला आन्दोलन अन्य समस्याओं के बारे में किस तरह की राय पेश कर सकता है। 
 
14.
अगर हम जनतंत्र के समक्ष खड़ी चुनौतियों से जूझना चाहते हैं और औपचारिक जनतंत्रा से वास्तविक जनतंत्रा कायम करना चाहते हैं, व्यक्ति के अधिकार को सुनिश्चित करना चाहते हैं, तो उस दिशा में पहला कदम उन तमाम सम्मोहनों से मुक्ति का होगा, जिनको लेकर प्रगतिशील, जनपक्षीय ताकतों के अन्दर भी दिग्भ्रम मौजूद हैं। इस मामले में एक जबरदस्त सम्मोहन भारत की पारम्पारिक संरचनाओं को लेकर है, जो व्यक्ति के अधिकार के निषेध पर टिकी हैं और समुदाय के अधिकार को वरीयता प्रदान करती हैं। अगर उत्तर भारत के कुछ इलाकों में खाप पंचायतों के रूप में वह उजागर होती हैं तो बाकी जगहों पर जातिगत पंचायतों के रूप में वह प्रगट होती हैं। ऐसे तमाम समुदायों को जनमानस में भी जो वैधता मिली है, उसे प्रश्नांकित करने की जरूरत है। भारत जैसे तीसरी दुनिया के देशों में जनतंत्रा को मुकम्मल बनाने के लिए यह आंतरिक लड़ाई आवश्यक ही नहीं अनिवार्य है।
 
हम इस बात को नहीं भूल सकते कि भारत में जनतंत्र का जिस तरह आरोपण औपनिवेश कालखण्ड में हुआ, उसके चलते ऐसी तमाम संरचनाओं से रैडिकल विच्छेद मुमकिन नहीं हो सका। इसलिए भारतीय व्यक्ति भले ही उपरी तौर पर जनतंत्रा की बात करे, व्यक्ति के अधिकार के सम्मान मगर अन्दरूनी तौर पर वह अपने अपने समुदायों की पहचानों के साथ ही अपने आप को नत्थी पाता है। यह अकारण नहीं कि यहां किसी वर्चस्वशाली जाति को आरक्षण प्रदान करने के लिए चलनेवाले आन्दोलन अधिक जल्दी समर्थन जुटा पाते हैं, मगर जीवनयापन के साधनों की दिक्कतें या रोजगार की अनुपलब्धता या सार्वजनिक सेवाओं में लगातार की जा रही कटौती जैसे बहुमत के मसलों पर चले आन्दोलनों के लिए समर्थन जुटा पाना टेढी खीर बनता है।
 
जनतंत्र को सुनिश्चित करने के लिए धर्मनिरपेक्षता एक आवश्यक मूल्य है। धर्मनिरपेक्षता का अर्थ ‘राज्य एव धर्म का अलगाव’ अर्थात धर्म की न केवल राज्य के संचालन में बल्कि समाज के संचालन से दूरी। लुब्बेलुआब यही कि आप की धार्मिक पहचान आप के अधिकारों के हनन या उन्हें वरीयता प्रदान करने का जरिया नहीं बन सकती, न ही वह आप के साथ किसी भेदभाव या विशेषाधिकार का सबब बनती है। आज़ादी के बाद से भारत में धर्मनिरपेक्षता को लेकर किसी न किसी स्तर पर संघर्ष जारी है, फिर चाहे वह नीतियां बनाने के रूप में हो या जमीनी स्तर पर साम्प्रदायिक ताकतों के - ऐसी ताकतों को जो धर्म की राजनीति में दखलंदाजी को वरीयता प्रदान करती हैं - खिलाफ संघर्ष चलाने के रूप में हो। यह भी स्पष्ट है कि उसकी तमाम सीमाएं रही हैं, जिसके चलते आज राजनीति के शीर्ष पर हम ऐसी ताकतों को पाते हैं जो भारत को हिन्दु राष्ट बनाना चाहती हैं। मुझे लगता है कि हमें उन सीमाओं को समझने की, रेखांकित करने की जरूरत है ताकि हम ऐसी जनतंत्रा का निषेध करनेवाली ताकतों पर हावी हो सकें। 
 
मेरा मानना है कि इस देश की प्रगतिशील ताकतों ने धर्मनिरपेक्षता की समूची लड़ाई को राज्य तक केन्द्रित किया है, नीतियां बनाने पर जोर दिया मगर समाज के धर्मनिरपेक्षताकरण को लेकर वह गाफिल रहे। और वह समूचा दायरा चाहे हिन्दू साम्प्रदायिक या मुस्लिम साम्प्रदायिक या अन्य यथास्थितिवादी या प्रतिक्रियावादी समूहों की सक्रियताओं का अखाड़ा बना रहा, जिन्होंने रोज रोज की अपनी कार्रवाइयों से या वैकल्पिक संस्थाओं के निर्माण के जरिए - चाहे स्कूल हो या कालेज हों - शेष समाज के गैरधर्मनिरपेक्षताकरण अर्थात डिसेक्युलरायजेशन के एजेण्डा पर अमल जारी रखा। क्या हम अपनी इस गलति से सीख नहीं सकते हैं ताकि इस दिशा में नयी जमीन तोड़ सकें।
 
चाहे पारम्पारिक समुदाय हों या पूंजी हो यह दोनों ही व्यक्तिगत अधिकारों के निषेध पर टिके हैं। पारम्पारिक समुदायों के जनतंत्रा निषेध के खिलाफ हमारी लड़ाई जहां एक आन्तरिक लड़ाई कही जा सकती है, वहीं पूंजी के शासन के खिलाफ लड़ाई एक बाहरी लड़ाई कही जा सकती है। 
 
यूं तो सहजबोध में यही बात हावी रहती है कि पूंजीवाद एवं जनतंत्र एक दूसरे के पूरक रहे हैं। यहां तक कि जनतंत्र की व्यापक स्वीकार्यता और अमल के दौर को पूंजीवाद के इतिहास के समकक्ष देखा जा सकता है। इसके बावजूद हम देख सकते हैं कि /
 
पूंजी एवं जनतंत्र के आपसी रिश्ते के केन्द्र में एक ऐसा तनाव देखा जा सकता है जो बुनियादी तौर पर हल होने लायक प्रतीत होता है।..अगर किसी बुनियादी स्तर पर जनतंत्रा पूंजीवाद के साथ सामंजस्य बिठाता नहीं दिखता है तो फिर ऐसा क्यों है कि उन दोनों का सहअस्तितव लम्बे समय तक बना रहा है। इसका संक्षिप्त उत्तर यही है कि वह जनतंत्रा की कीमत पर ही होता रहा है। उनका सहअस्तित्व रहा है, मगर वह हमेशा ही असमान शर्तों पर रहे हैं। ..पूंजीवाद के प्रारंभिक दौर में तो नागरिकत्व के अधिकार ही सम्पत्तिशालंी लोगों तक सीमित थे। गुलामों एवं स्त्रिायों को नागरिकत्व और जनतांत्रिक अधिकारों के लायक नहीं समझा जाता था। स्थितियां अब बदल गयी हैं, मगर पूरी तरह नहीं। पूंजीवाद के महल के तमाम हिस्सों में जनतंत्रा का प्रवेश सुगम है, मगर उसे उसके केन्द्रीय कक्ष से दूर ही रखा गया है।
 
लाजिम है कि अगर जनतंत्र को मुकम्मल बनाने के लिए पूंजी के शासन को चुनौती देना अनिवार्य है और साथ ही साथ यह जरूरी है कि हम वैकल्पिक समाज का तसव्वुर/कल्पना भी करते रहे। पूंजी के शासन को समाप्त कर जिस समतामूलक समाज की स्थापना करना चाहते हैं, उसके बारे में विचार विमर्श/तबादले खयालात जारी रखें। मेरी समझ से यह वैकल्पिक समाज एक समाजवादी समाज ही होगा। इसका स्वरूप कैसा होगा, वह समाजवाद के पुराने प्रयोगों से किस तरह अलग होगा, यह भी स्पष्ट करने की जरूरत निश्चित ही बनी रहेगी। अन्त में, मानवता के व्यापक हिस्से के भविष्य को अगर अधिकाधिक सुनिश्चित करते जाना है, मानवीय आज़ादी पर लगी तमाम बन्दिशों को समाप्त करते जाना है तथा मानवीय आज़ादी के दायरों का अधिकाधिक विस्तार करते जाना है तो इसके बिना कोई विकल्प नहीं है। 
 
 
 
(डा ओमप्रकाश ग्रेवाल स्मृति व्याख्यान में प्रस्तुत मसविदा, 26 जून 2016, कुरूक्षेत्र)