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मोदीजी क्या आप अपने मामा के घर से पैसा लाकर यूपी वालों को दे रहे हैं?

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नई दिल्ली। सोमवार को रमाबाई अंबेडकर मैदान लखनऊ में बीजेपी की परिवर्तन रैली को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि मेरी सरकार बनने के बाद यूपी को प्रति साल एक लाख करोड़ के हिसाब से ढाई सालों में यूपी को ढाई लाख करोड़ रुपया दिया गया, लेकिन यूपी की सपा सरकार ने उन रुपयों को जनता के काम में नहीं लगाया। अब इस भाषण की वजह से ही पीएम मोदी फंसते नजर आ रहे हैं। लोग उनके इस बयान पर सवाल उठा रहे हैं।

Modi mama
 
आपको बता दें कि 2014 के लोकसभा आमचुनाव से पहले कई रैलियों में पीएम मोदी केंद्र सरकार के द्वारा राज्यों को पैसा देने की बात कहने पर कहते थे कि 'क्या दिल्ली वाले यह पैसा अपने मामा के यहां से लेकर आए हैं? मोदीजी जनता से पूछते थे कि क्या जनता का इन पैसों पर कोई अधिकार नहीं है?'
 
नीचे देखिए वीडियो जिसमें पीएम मोदी कांग्रेस पर पैसे देने को लेकर हमला बोलते थे..

 
पीएम मोदी तो भाषणों में यहां तक कहते थे कि यह जनता का पैसा है और क्या दिल्ली वाले उन्हें भीख दे रहे हैं? पीएम मोदी जनता को भड़काते हुए कहते थे क्या आप भीख का कटोरा लेकर खड़े हैं ये दिल्ली वाले आकर भीख की बातें करते हैं आपको मंजूर है क्या ये आपका अपमान है कि नहीं है? पीएम मोदी कहते थे कि ये दिल्ली वाले कौन सी भाषा बोल रहे हैं। 

लोकसभा चुनावों के प्रचार के समय पीएम मोदी कहते थे कि हिंदुस्तान की तिजोरी पर जनता का हक है ये पैसा किसी दल का या किसी सरकार का नहीं है यह जनता जनार्दन का पैसा है। एक एक पाई पर जनता का हक है। वो कहते थे कि हिंदुस्तान की तिजोरी में जनता जनार्दन का पैसा जमा है।  
 
आपको बता दें कि हर राज्य के लिए एक निश्चित बजट होता है और केंद्र सरकार एवं राज्य सरकार अपने-अपने हिस्से के हिसाब से राज्य के कार्यों में पैसा खर्च करते हैं। जब किसी भी राज्य की जनता टैक्स देती है तो जाहिर सी बात है कि वह टैक्स राज्य सरकार के साथ-साथ केंद्र सरकार को जाता है। 
 
अब सवाल यह उठता है कि पीएम मोदी ने अपनी सरकार की तरफ से जो पैसे यूपी को दिए उन्हें अपने मामा के घर से तो लाए नहीं होंगे वह जनता के टैक्स के ही पैसे हैं और चूंकि यूपी चुनाव नजदीक आ गया है तो पीएम मोदी भी अब वैसे ही पैसे देने की बात कर रहे हैं जैसे वो लोकसभा चुनावों के दौरान बोलकर कांग्रेस का मजाक उड़ाते थे।

Courtesy: National Dastak

इतिहासकार इरफान हबीब ने RSS से पूछा आजादी में योगदान, करा दी गई FIR

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नई दिल्ली। देशभक्ति का ढिंढोरा पीटने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानि आरएसएस की दुखती रग पर जब इतिहासकार प्रोफेसर इरफान हबीब ने हाथ रखा तो उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दी गई। लेकिन इसके बावजूद भी इरफान हबीब आजादी की लड़ाई में आरएसएस की भूमिका पर उठाए सवालों पर कायम हैं। उनका कहना है कि मैं लोकतंत्र में जीने वाला इंसान हूं,  इसलिए जो सही था मैंने वही कहा। अगर मैं गलत हूं तो संघ सबूतों के साथ हकीकत को पेश कर दे। अब तो मामला कोर्ट में है। वो बताए कि आजादी की लड़ाई में कब, कहां और कितने स्वयंसेवक शहीद हुए? रहा सवाल मुकदमे का तो कुछ लोग ओछी पब्लिसिटी के लिए इस तरह की हरकत करते रहते हैं।

Irfan Habib

हाल ही में प्रकाशित हुए अपने एक लेख में इतिहासकार इरफान हबीब ने कहा था कि आजादी की लड़ाई में आरएसएस की कोई भूमिका नहीं रही। इस लेख के बाद लखनऊ के एक व्यक्ति ने अलीगढ़ की कोर्ट में एक याचिका लगाई है। याची का कहना है कि मैं संघ का सदस्य हूं। इरफान हबीब के इस लेख को पढ़कर मुझे पीड़ा हुई है। मुझे मानसिक आघात पहुंचा है। इस बारे में जब इरफान हबीब से बात की गई तो उनका कहना था कि इस देश में सबको बोलने का हक है।

मैंने जो कहा है वो कागजों में दर्ज है। मेरे पास मेरे बयान से संबंधित सबूत हैं और मैं उस पर कायम हूं। अगर किसी को ये लगता है कि मेरा बयान गलत है तो उसे साबित करे। ऐसे लोग सबूत पेश करें कि इस तारीख में इस जगह संघ से जुड़े फलां स्वयंसेवक ने लड़ाई लड़ी थी और इस लडाई में उन पर कार्रवाई हुई थी या फिर वो शहीद हुए थे।

हबीब ने न्यूज 18 इंडिया डॉटकॉम से बातचीत में कहा कि कई बार ये मामला कोर्ट में गया है। आज भी किसी शख्स ने कोर्ट में अर्जी दाखिल की है। जिसको शिकायत है वो कोर्ट में सबूत देकर मेरी बात को खारिज कर सकता है। वर्ना तो जब कोर्ट मांगेगा तो मैं अपने बयान से संबंधित सबूत पेश कर दूंगा। बाकी में इस बारे में ज्यादा कुछ नहीं कहना चाहूंगा। मैं जानता हूं कि ये पब्लिसिटी पाने के लिए की गई ओछी हरकत है।

Courtesy: National Dastak
 

दलित और महिला संगठनों ने राजस्थान हाईकोर्ट से मनु की प्रतिमा हटाने के लिए भरी हुंकार

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जयपुर। राजस्थान देश का एकमात्र राज्य है जिसके उच्च न्यायालय में मनुस्मृति के रचयिता मनु की मूर्ति लगी हुई है। मनुस्मृति स्त्री व शूद्रों के बारे में बेहद अपमानजनक और अन्यायकारी व्यवस्थाओं का लिखित विधान है। डॉ. अम्बेडकर के मुताबिक मनुस्मृति वर्ण तथा जाति की ऊंच-नीच भरी व्यवस्था को शास्त्रीय आधार प्रदान करती है। इसलिए बाबासाहेब ने 25 दिसम्बर 1927 को सार्वजनिक रूप से मनुस्मृति का दहन किया था। मगर यह अत्यंत दुखद बात है की स्त्री व दलित विरोधी और मानव की समानता के शत्रु मनु की प्रतिमा न्यायालय में लगी हुई है, जबकि उसी न्यायालय के बाहर अम्बेडकर की प्रतिमा लगाई गई है जो एक चौराहे पर उपेक्षित सी खड़ी है।

Manuwadi

इसी मनु की प्रतिमा को लेकर राज्य में 28 साल बाद एक बार फिर से बवाल शुरु हो गया है। राज्य के महिला और दलित संगठनों ने मनु की प्रतिमा को हाईकोर्ट से हटाने के लिए राज्यभर में आंदोलन का ऐलान कर दिया है। इस बीच राजस्थान सरकार ने हाईकोर्ट में मनु की प्रतिमा के बाहर भारी फोर्स तैनात कर दी है। सुरक्षा में दो सौ से ज्यादा पुलिसकर्मी तैनात किए गए हैं।

राज्य के 20 से ज्यादा दलित और महिला संगठनों ने ऐलान किया है कि राजस्थान हाईकोर्ट के अंदर लगे इस मनु की प्रतिमा को हटाने के लिए राज्यभर में आंदोलन शुरू किया जाएगा। इनका कहना है कि जिस मनु ने महिला और जाति व्यवस्था के बारे में आपत्तिजनक बातें कही हैं उसकी प्रतिमा की छाया में हाईकोर्ट निष्पक्ष फैसले कैसे दे सकता है।
 
आपको बता दें कि मनु की इस प्रतिमा को हटाने को लेकर पिछले 28 सालों से राजस्थान हाईकोर्ट में मामला चल रहा है लेकिन अभी तक कोई भी सुनवाई ठीक से नहीं हो पा रही है। इसलिए सभी महिला और दलित संगठनों ने राजस्थान के चीफ जस्टिस से मिलने का भी समय मांगा है। सामाजिक कार्यकर्ता कविता श्रीवास्तव का कहना है इस मामले को 28 साल से जानबूझकर कोर्ट में टाला जा रहा है। हम मांग करते हैं कि जो फैसला लेना है कोर्ट उसे जल्दी ले ताकि या तो मनु की प्रतिमा हटे या फिर हम सुप्रीम कोर्ट जाएं।
 

दरअसल, 1989 में न्यायिक सेवा संगठन के अध्यक्ष पदम कुमार जैन ने राजस्थान हाईकोर्ट के कार्यवाहक चीफ जस्टिस एमएम कासलीवाल की इजाजत से मनु की इस बड़ी प्रतिमा को लगवाया था। तब राज्यभर में हंगामा मचा और राजस्थान हाईकोर्ट के संपूर्ण प्रशासनिक पीठ ने इसे हटाने के लिए रजिस्ट्रार के माध्यम से न्यायिक सेवा संगठन को कहा। लेकिन तभी हिंदू महासभा की तरफ से आचार्य धर्मेंद्र ने मनु की प्रतिमा हटाने के खिलाफ हाईकोर्ट में स्टे की याचिका लगा दी कि एक बार स्थापित मूर्ति हटाई नहीं जा सकती। तब से लेकर आज तक केवल दो बार मामले की सुनवाई हुई है। जब भी सुनवाई होती है कोर्ट परिसर में टकराव का वातावरण बन जाता है और मामला बंद कर दिया जाता है।
 
वहीं हिंदू संगठन मनु की प्रतिमा को हटाने का विरोध कर रहे हैं। याचिकाकर्ता आचार्य धर्मेंद्र का कहना है कि प्रतिमा किसी भी तरह से हटाना अनुचित है। मनु को भगवान का दर्जा धर्मग्रंथों में दिया गया है। इस मामले में कोर्ट ने गृह विभाग के सचिव के जरिये नोटिस भेजकर भारत सरकार को भी पक्षकार बनाने को कहा था लेकिन मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए सरकार खुद को इस विवाद से दूर रखे हुए है। महिला और दलित संगठनों के इस मनुवाद हटाओ आंदोलन के बाद सरकार ने प्रतिमा और राजस्थान हाईकोर्ट की सुरक्षा बढ़ा दी है।

Courtesy: National Dastak
 

उधम सिंह के परपोते को चपरासी की नौकरी पाने के लिए करना पड़ रहा है संघर्ष

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ऐसे समय में जब राष्ट्रीय बहस में राष्ट्रवाद और देशभक्ति पर जोर है, तब महान क्रांतिकारी उधम सिंह के प्रपौत्र पंजाब सरकार से चपरासी की नौकरी पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री अमरिन्दर सिंह ने करीब 10 साल पहले उन्हें यह नौकरी देने का वादा किया था।

उधम सिंह
photo courtesy: PTI

हालांकि कांग्रेस सरकार की ओर से किया गया यह वादा पूरा नहीं सका क्योंकि राज्य में कांग्रेस पार्टी करीब 10 साल से सत्ता से बाहर है। उधम सिंह की बड़ी बहन आस कौर के प्रपौत्र जग्गा सिंह द्वारा शिरोमणि अकाली दल और भाजपा सरकार से बार..बार अपील किए जाने का अभी कोई परिणाम नहीं निकला है।

 

भाषा की खबर के अनुसार,  भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में खूनी दिवस के दौरान उधम सिंह वहां उपस्थित थे। बाद में करीब 21 साल बाद उन्होंने लंदन में माइकल ओ ड्वायर की हत्या कर इस नरसंहार का बदला लिया था। जलियांवाला बाग में कत्लेआम के समय माइकल ओ ड्वायर ही पंजाब का गवर्नर था। बाद में उधम सिंह को हत्या के आरोप में लंदन में फांसी दे दी गयी थी।

जग्गा सिंह इस समय अपने परिवार के छह सदस्यों के साथ बेहद गरीबी में जीवन गुजार रहे हैं। इसके अलावा उन्हें 60 वर्षीय पिता जीत सिंह की देखभाल भी करनी पड़ती है। वह एक दिहाड़ी मजदूर हैं।

तीस वर्षीय जग्गा सिंह दसवीं तक पढ़े हैं और 2,500 रपये मासिक की तनख्वाह पर संगूर की एक कपड़ा दुकान में काम करते हैं। उन्हें उम्मीद है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री राजनाथ सिंह उनके पत्रों पर ध्यान देंगे।

सिंह अब इस कड़ाके की और धुंध भरी सर्दी में अपने विरोध को यहां जंतर मंतर तक ले आए हैं। उन्हें उम्मीद है कि अब राष्ट्रीय राजधानी में सत्ता के गलियारों में उनकी आवाज जरूर सुनी जाएगी। हालांकि अभी तक केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा अथवा पंजाब में सत्तारूढ़ शिअद-भाजपा से उन्हें कोई ठोस आश्वासन नहीं मिला है ।
 

बीजेपी के कृषि मंत्री ने दी किसान को धमकी

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पुलिस ने आज कथित तौर पर कैनाकोना तालुका में एक किसान को धमकी देने के मामले में गोवा के कृषि मंत्री रमेश तावड़कर के खिलाफ एक मामला दर्ज किया।

कृषि मंत्री

अपनी शिकायत में कोतिगाओ गांव के एक किसान पुणो वेलिप ने कहा 12:30 पर वह अपने स्कूटर से जा रहा था जब मंत्री ने उसे रोका और उसे धमकाते हुए हमला करने की कोशिश की।

 

उसने आरोप लगाया कि मंत्री ने उसे गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी। इस मामले को भारतीय दंड संहिता की 341, 352 और 506 धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया है। जिसमें गलत तरह से व्यवहार करना, धमकाना व आपराधिक बल के साथ हमला करने की दंड संहिता के तहत अलग-अलग धाराए बनती हैं।

इस बाबत जब कृषि मंत्री रमेश तावड़कर से पुछा गया तो उन्होंने इस तरह की किसी भी धमकी से इंकार किया और दावा किया कि अगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर उनको निशाना बनाया जा रहा है।

उन्होंने बताया मैंने किसी को भी धमकी नहीं दी है। जब पुलिस इस बारे में मुझसे संपर्क करेगी तब मैं अपना बयान देने के लिए तैयार हूं।

आपको बता दे कि इससे पहले भी तावड़कर  हिंसा के कई आरोपों का सामना कर चुके है।

Courtesy: Janta Ka Reporter