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Bengaluru molestation: Police finds credible evidence, registers FIR

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Three days after the New Year eve revelry turned into a nightmare for several women who were allegedly molested at a large gathering in city’s downtown area, police claimed to have found “credible” evidence of molestation and have registered an FIR.

Bengaluru molestation

As the incidents drew widespread outrage with no action from the police, Bengaluru’s new Commissioner of Police, Praveen Sood through a series of tweets tonight, said his team was working on the case silently.

“As promised we have found credible evidence in a case of wrongful confinement, molestation and attempt to rob,” Sood had said in a tweet.

“We have taken action by registering an FIR. Investigation is in progress. Police is working…. though silently,” he had said in another tweet.

 

Stating that enquiry is underway by an officer of DCP rank, he has said that they have gone through the feeds from 45 cameras on MG road, and unedited video is available with police.

 

Eyewitness accounts had suggested that women were molested and groped and lewd remarks were also passed by miscreants late night on 31 December in the posh area even as it was claimed that 1,500 police personnel had been deployed to control the crowds.

Police had earlier said that no one had come forward to file a complaint about the incident.

If any lady lodges a complaint of molestation that took place on 31 December night, the police will not waste even a minute in registering a case and launch a probe, Sood had tweeted on 2 January, adding even without a complainant if police finds credible evidence of molestation, a case will be registered suo motu without waiting.

Sood took over as the City Police Commissioner from N S Megharikh, on 1 January.

Sood said “It’s a case of molestation clubbed with some attempt to robbery etc;Police teams working,confident about arresting the accused.”

“We have nothing to hide and no one to protect; assure we will make the city safer by taking action against the accused” Sood told ANI
 

चुनावोें से पहले ही ABP ने दिलाई बीजेपी को जीत!

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उत्तर प्रदेश में चुनावी आहट शुरू होते ही ओपिनियन पोल का सिलसिला शुरू हो गया है। जैसा कि संभावित था चुनावों में बीजेपी को जीत दिलाने का सिलसिला भी शुरूआत से ही मजबूती के साथ उठाया जा रहा है। बिहार चुनाव में बुरी तरह फेल होने के बाद एबीपी ने यूपी में भी भाजपा को जीत दिलाने की कोशिशें जारी कर दी हैं। देशभर में चल रही बीजेपी विरोधी गतिविधियों के बाद भी यह सर्वे कई सवाल खड़ा कर रहा है। इस सर्वे को ओपिनियन सर्वे नहीं बल्कि ओपिनियन मेकिंग सर्वे बताया जा रहा है।  

ABP News

पढ़िए एबीपी का ओपिनियन पोल….
 
यूपी में समाजवादी पार्टी में चल रहे महाभारत के बीच एबीपी न्यूज ने सबसे बड़ा ओपिनियन पोल किया है. सर्वे मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और मुलायम सिंह यादव को सचेत कर रहा है कि एकजुट हो जाओ नहीं तो सत्ता हाथ से चली जाएगी. मुलायम के लिए विशेष संदेश है कि बेटा अखिलेश जनता में भी आप पर भारी है यह बात अब आपको समझनी होगी.
 
समाजवादी पार्टी में पिछले दिनों से जो कुछ भी हो रहा है उसकी वजह से पार्टी की जमकर किरकिरी हो रही है लेकिन अखिलेश यादव का सितारा बुलंदियों पर है. विधानसभा चुनाव से पहले पहले नोटबंदी हुई. फिर समाजवादी पार्टी और मुलायम परिवार में झगड़ा हुआ. इन सब से यूपी में चुनाव की तस्वीर उलझ गई है. कौन जीतेगा, कौन हारेगा? कोई आपस में लड़ रहा है, कोई दूसरे की लड़ाई में अपना फायदा देख रहा है. वर्तमान राजनीति का मिजाज समझने के लिए ही एबीपी न्यूज-लोकनीति-सीएसडीएस ने सबसे बड़ा ओपिनियन पोल किया.
 
पोल के मुताबिक, सीएम की पहली पसंद कौन?
सीएम के पद के लिए अखिलेश यादव सबसे ज्यादा 28 फीसदी लोगों की पसंद बने वहीं मायावती 21 फीसदी लोगों की पसंद बनी तो बीजेपी के आदित्यनाथ को महज 4 फीसदी तो मुलायम को 3 फीसदी लोगों ने पसंद किया. सर्वे के मुताबिक पारिवारिक विवाद के बावजूद अखिलेश लोगों के बीच अपना चेहरा चमकाने में सफल रहे हैं. सर्वे का लब्बोलुबाब यही दिख रहा है कि फिलहाल यूपी में अखिलेश लोगों की पहली पसंद बनकर उभरे हैं.

Courtesy: National Dastak
 

भाजपा ने देशभक्ति के नाम पर कैसे बनाया लोगों को बेवकूफ- बता रहे हैं भाजपा सांसद

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नई दिल्ली। खुद को जवाबदेही से बचाने के लिए भाजपा किस तरह देशभक्ति के नाम पर लोगों को बेवकूफ बनाती आ रही है इसका खुलासा दिल्ली के बीजेपी अध्यक्ष ने अनजाने में कर दिया। दरअसल, बीजेपी नेता मनोज तिवारी का एक वीडियो सामने आया है। इसमें वह नोटबंदी के बाद लाइन में लगे लोगों का मजाक उड़ाते दिखाई दे रहे हैं। 

Manoj Tiwari

वीडियो में मनोज तिवारी कह रहे हैं कि नोटंबदी के बाद वह एक बार अपने संसदीय क्षेत्र में लाइन में जाकर लगे तो मीडिया वाले वहां पहुंच गए और उनसे सवाल पूछने लगे। इसपर उन्होंने लोगों को ‘खुश’ करने के लिए एक गाना गा दिया। जिसके बोल थे, ‘देशभक्त हैं कतार में, लगी है भारी भीड़।’ मनोज तिवारी ने आगे कहा कि उनका गाना सुनकर वहां खड़े लोगों ने कहा कि वे 30 दिसंबर तक लाइन में भी खड़े रहेंगे। इसपर वहां मौजूद दूसरे शख्स ने कहा कि लोग उनका गाना सुनकर 30 दिसंबर के बाद भी लाइन में लगे रहने को तैयार हो गए थे।
 
मनोज तिवारी नॉर्थ ईस्ट दिल्ली से सांसद हैं। इसके अलावा वह दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष भी हैं। उन्हें यह पद कुछ वक्त पहले ही सौंपा गया है। वीडियो में उनके साथ कुछ और लोग भी बैठे दिख रहे हैं। जिनमें से एक बीजेपी सांसद महेश गिरी जैसे लग रहे हैं।
 
मनोज तिवारी को 30 दिसंबर को दिल्ली इकाई का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था। तिवारी ने सतीश उपाध्याय की जगह ली थी। पूर्व अध्यक्षों का कार्यालय बहुत पहले ही समाप्त हो चुका था और बीते कई महीनों से नई नियुक्तियां लंबित थीं। गौरतलब है कि जुलाई 2014 में सतीश को दिल्ली बीजेपी का अध्यक्ष चुना गया था। लेकिन 2015 में हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी बुरी तरह फेल रही। तब से ही सतीश की कुर्सी पर तलवार लटक रही थी। वहीं तिवारी को चुनने की वजह यह हो सकती है कि बिहार और उत्तर प्रदेश के दिल्ली में रह रहे प्रवासियों में उनकी अच्छी फैन फॉलोइिंग है। उसी के दमपर उन्होंने पहली ही बार में लोकसभा सांसद का चुनाव जीत लिया था।

 

Courtesy: National Dastak

खुला अच्छे दिन का पिटारा, मोदीजी के राज में 42 फीसदी बढ़ी किसानों की आत्महत्या दर

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नई दिल्ली। साल 2014 में किसानों और मजदूरों की बात कर सत्ता में आए पीएम मोदी की सरकार बनने के बाद किसानों की आत्महत्या में बढ़ोत्तरी आई है। पीएम मोदी अपनी रैलियों में हमेशा विकास के दावे करते हैं अपनी हर रैली में वो किसानों की बात कर वाहवाही भी लूटते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत चौकानी वाली है।

Modi farmers
 
30 दिसंबर को जारी की गई ‘एक्सिडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड इन इंडिया 2015’ नामक रिपोर्ट के अनुसार साल 2014 के मुकाबले 2015 में किसानों और कृषि मजदूरों की कुल आत्महत्या में दो फीसदी की बढ़ोतरी हुई। साल 2014 में कुल 12360 किसानों और कृषि मजदूरों ने आत्महत्या की थी। जबकि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार साल 2015 में 12602 किसानों और कृषि मजदूरों ने आत्महत्या की। 
 
रिपोर्ट के अनुसार किसानों, कृषि मजदूरों की आत्महत्या के पीछे कंगाली, कर्ज और खेती से जुड़ी दिक्कतें प्रमुख वजहें रहीं। इन तीन कारणों से करीब 38.7 फीसदी किसानों ने आत्महत्या की। आंकड़ों के अनुसार आत्महत्या करने वाले 73 फीसदी किसानों के पास दो एकड़ या उससे कम जमीन थी।
 
आपको जानकर आश्चर्य होगा कि इन मौतों में करीब 87.5 फीसदी मौतें केवल देश के सात राज्यों में हुई हैं। आत्महत्या के मामले में सबसे ज्यादा खराब स्थिति बीजेपी शासित राज्यों की ही है। इसमें बीजेपी शासित महाराष्ट्र पहले पायदान पर है। महाराष्ट्र में साल 2015 में 4291 किसानों ने आत्महत्या कर ली। महाराष्ट्र के बाद किसानों की आत्महत्या के सर्वाधिक मामले कर्नाटक (1569), तेलंगाना (1400), मध्य प्रदेश (1290), छत्तीसगढ़ (954), आंध्र प्रदेश (916) और तमिलनाडु (606) में सामने आए।
 
साल 2015 में कृषि सेक्टर से जुड़ी 12602 आत्महत्याओं में 8007 किसान थे और 4595 कृषि मजदूर। साल 2014 में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या 5650 और कृषि मजदूरों की 6710 थी। इन आंकड़ों के अनुसार किसानों की आत्महत्या के मामले में एक साल में 42 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। 
 
रिपोर्ट में उन सभी को किसान माना गया है जिनके पास अपना खेत हो या लीज पर खेत लेकर खेती करते हैं। रिपोर्ट में उन लोगों को कृषि मजदूर माना गया है जिनकी जीविका का आधार दूसरे खेतों पर मजदूर के रूप में काम करना है। रिपोर्ट में किसानों और कृषि मजदूरों की आत्महत्या के पीछे कारणों का भी विश्लेषण किया गया है।

Courtesy: National Dastak

Forgotten National Disaster: Jharkhand Mine Tragedy was Waiting to Happen

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The Hindu extensively covered Jharkhand's man-made mine tragedy, nearly forgotten within first 24 hours by most of the Indian media. The Hindu was one of the few newspapers to carry 6 or 7 strong stories. Shiv Sahay Singh did an excellent job from the spot. Here is a strong story in today's paper says that Jharkhand mine tragedy was waiting to happen

Local activist's complaint points to violation of safety norms.


Image: The Hindu

The disaster at Rajmahal open cast mine in Jharkhand, which has claimed 18 mines so far, was waiting to happen as safety concerns raised by activists and locals were rubbished by authorities. Documents accessed by The Hindu reveal that a complaint by a local activist, pointing to violation of safety norms and forwarded to the Director General of Mines Safety (DGMS) by the Prime Minister’s Office, was termed “incorrect/false” in December 2015.

“After detailed inquiry on your complaint, the allegations made by you against the management of Rajmahal OCP (open cast mine) were found incorrect/false, which comes under the purview of Mines Act, 1952,” a letter written by the Director of Mines Safety (SD), Jharkhand had told Ashutosh Chakraborty, the activist who had filed the complaint with the PMO.

Interestingly, the response was sent on December 1, 2015. A year later, on December 29, 2016, hundreds of thousands of tonnes of overburden dump came crashing, burying men and machinery.

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