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Iranian Actress to Shun Oscars in Protest of Trump Immigrant Ban

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New York. The star of Iran's Oscar-nominated movie "The Salesman" said on Thursday she would not attend the Academy Awards ceremony in Hollywood next month because of US President Donald Trump's proposed ban on immigrants from Muslim nations.

Taraneh Alidoosti,

Taraneh Alidoosti, 33, a Tehran-born actress, said the move was racist.

"Trump's visa ban for Iranians is racist. Whether this will include a cultural event or not, I won't attend the #AcademyAwards 2017 in protest," Alidoosti said on Twitter.

An executive order expected to be signed by Trump in coming days will block the entry to the United States of Syrian refugees, and suspend the entry of any immigrants from Muslim-majority countries Syria, Sudan, Somalia, Iraq, Iran, Libya and Yemen.

In "The Salesman," Alidoosti plays one half of an Iranian couple whose life becomes strained as they take part in a production of the American stage classic "Death of a Salesman."

The film, by Iranian director Asghar Farhadi, was nominated on Tuesday for a foreign-language Oscar, and has won prizes at film festivals in Cannes, Chicago and Munich.

Alidoosti has also appeared in the popular Iranian TV soap opera "Shahrzad."

Reuters
 

बजरंगी पत्रकारों की फौज लेकर दक्खिन से लॉन्‍च हो रहा है अर्नब गोस्‍वामी का ‘रिपब्लिक !’

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यह संयोग नहीं है कि इस गणतंत्र दिवस यानी रिपब्लिक डे पर 26 जनवरी को चिल्‍लाकर अंग्रेज़ी बोलने वाले इकलौते भारतीय समाचारवाचक अर्नब गोस्‍वामी का समाचार चैनल ‘रिपब्लिक’ लॉन्‍च हो रहा है। इसे मुहावरे में समझें या यूं ही, लेकिन यह ‘रिपब्लिक’ अब औपचारिक रूप से एनडीए यानी भारतीय जनता पार्टी यानी राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ की अपनी दुकान होगा जिसके गर्भगृह यानी न्‍यूज़रूम में केवल दक्षिणमुखी बजरंगियों की एक फौज आपको जबरन राष्‍ट्रवाद की खुराक पिलाने का धंधा करेगी।

Arnab Goswami

टाइम्‍स नाउ छोड़ने के अगले ही दिन अर्नब गोस्‍वामी ने इस कंपनी को ज्‍वाइन कर लिया था। कहा जा रहा था कि यह स्‍वतंत्र पत्रकारिता का एक ठिकाना होगा, लेकिन इंडियन एक्‍सप्रेस ने सबसे पहले ख़बर छापी कि इस चैनल में सबसे बड़ा निवेश भारतीय जनता पार्टी के राज्‍यसभा सांसद और केरल में एनडीए के उपाध्‍यक्ष उद्यमी राजीव चंद्रशेखर का होगा। (फोटो दाएँ) ‘रिपब्लिक’ की मूल कंपनी का नाम है एआरजी आउटलायर मीडिया प्राइवेट लिमिटेड जिसके प्रबंध निदेशक खुद अर्नब गोस्‍वामी हैं, जिन्‍होंने 19 नवंबर को यह पद ग्रहण क लिया था और उसके बाद से घूम-घूम कर सबको बता रहे हैं कि यह चैनल दिल्‍ली की लुटियन पत्रकारिता को चुनौती देगा।

चंद्रशेखर ने इस चैनल में 30 करोड़ रुपये का निवेश अपनी अलग-अलग कंपनियों के रास्‍ते किया है। चंद्रशेखर की एशियानेट के अलावा अर्नब की कंपनी एसएआरजी मीडिया होल्डिंग का इसमें निवेश है।

मसला केवल निवेश का नहीं है बल्कि इस गणतंत्र को लेकर जैसी परिकल्‍पना इसके मालिकों ने रची है, उसी हिसाब से अपना गणतंत्र रचने के लिए उन्‍हें कामगार फौज की भी तलाश है। इंडियन एक्‍सप्रेस की 21 सितंबर की एक ख़बर के मुताबिक चंद्रशेखर की कंपनी जुपिटर कैपिटल के सीईओ अमित गुप्‍ता ने अपनी संपादकीय प्रमुखों को एक ईमेल भेजा था जिसमें निर्देश दिया गया था कि संपादकीय टीम में उन्‍हीं पत्रकारों को रखा जाए ”जिनका स्‍वर दक्षिणपंथी हो”, ”जो सेना समर्थक हों”, ”चेयरमैन चंद्रशेखर की विचारधारा के अनुकूल हों” और ”राष्‍ट्रवाद व राजकाज” पर उनके विचारों से ”पर्याप्‍त परिचित” हों।

बाद में गुप्‍ता ने हालांकि इस ईमेल को ”इग्‍नोर” करने के लिए एक और मेल लिखा, लेकिन बंगलुरू में अंडर 25 समिट में अर्नब ने अपने रिपब्लिक के पीदे का विचार जब सार्वजनिक किया तो यह साफ़ हो गया कि टीवी के इस नए गणतंत्र को दरअसल वास्‍तव में बजरंगी पत्रकारों की एक ऐसी फ़ौज चाहिए जो मालिक के कहे मुताबिक दाहिनी ओर पूंछ हिला सके। अर्नब का कहना था कि वे लुटियन की दिल्‍ली की पत्रकारिता से पत्रकारिता को बचाने का काम करेंगे क्‍योंकि वे लोग समझौतावादी हैं और उन्‍हें जनता का प्रतिनिधित्‍व करने का कोई हक़ नहीं है।

क्‍या वास्‍तव में पत्रकार जनता का प्रतिनिधि हो सकता है? अगर चैनल ‘रिपब्लिक’ हो सकता है तो पत्रकार उसका प्रतिनिधि भी हो सकता है। ज़ाहिर है, सच्‍चा प्रतिनिधि वही होगा जो रिपब्लिक के मालिकान की अवधारणा के साथ हो।

बहरहाल, इंडियन एक्‍सप्रेस ने जब लिखकर अर्नब से यह सवाल पूछा कि क्‍या उनके मालिक चंद्रशेखर का चैनल में निवेश हितों का टकराव नहीं है क्‍योंकि वे खुद रक्षा सौदों से जुड़े हैं और रक्षा पर संसद की स्‍थायी समिति के सदस्‍य भी हैं साथ ही रक्षा मंत्रालय की परामर्श समिति में भी हैं। इस पर अर्नब की ओर से अख़बार को कोई जवाब नहीं मिला। देखें:

‘रिपब्लिक’ 26 जनवरी से शुरू हो रहा है। यह रिपब्लिक डे पर किसी भी पत्रकारिता संस्‍थान के लिए गौरव की बात होनी चाहिए, लेकिन एक बात साफ़ है कि इस रिपब्लिक में संविधान के मूल्‍यों का तटस्‍थता से निर्वाह नहीं किया जाएगा क्‍योंकि इसके स्‍वामित्‍व पर सवाल हैं और पत्रकारों की भर्ती प्रक्रिया पर भी सवाल उठ चुके हैं। देखने को केवल यह रह जाता है कि नया वाला रिपब्लिक पुराने वाले रिपब्लिक की पैदाइश है या पुराना वाला रिपब्लिक चलाने वालों को नए रिपब्लिक की जरूरत आन पड़ी है।

Courtesy: Media Vigil

 

मुझे इंतज़ार है जब भारत के पत्रकार अपने नए-नवेले स्‍टारडम से मुक्‍त होंगे-शाहरुख़ ख़ान

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पिछले हफ्ते फिल्‍म स्‍टार शाहरुख़ खान ने द इंडियन एक्‍सप्रेस की अलका साहनी को एक साक्षात्‍कार दिया। साहनी ने उनसे सवाल पूछा था कि गोल्‍डेन ग्‍लोब पुरस्‍कार में मेरिल स्‍ट्रीप के संबोधन के बाद भारतीय सेलिब्रिटी, खासकर बॉलीवुड की शख्सियतों पर काफी सवाल उठे हैं कि वे ऐसा कुछ नहीं बोलते। इसका जवाब शाहरुख ने काफी विस्‍तार से दिया है जो रविवार, 29 जनवरी को संडे एक्‍सप्रेस पत्रिका में प्रकाशित होगा। उससे पहले हालांकि अख़बार ने साक्षात्‍कार के कुछ अंश एक लेख के रूप में छापे हैं जिसमें भारतीय मीडिया पर कुछ बेहद गंभीर सवाल शाहरुख़ ने उठाए हैं। हम यहां उस लेख के कुछ अंशों का तर्जुमा पेश कर रहे हैं- संपादक

Shah Rukh Khan

मुझे यह बात बहुत अटपटी लगी जब सारे पत्रकार कहने लगे “भारत के अभिनेता आखिर कब इस तरह से बोलना शुरू करेंगे?” सवाल है कि भारतीय अभिनेता एक ऐसी स्थिति के बारे में क्‍यों बोलें जो यहां मौजूद ही नहीं है। अगर आप किसी एजेंडे या परिस्थिति पर हमसे बोलवाना चाहते हैं तो आपको हमसे उस बारे में पूछना चाहिए और बेशक, हम बोलेंगे।

मैं पलटकर पूछना चाहता हूं: ‘यहां के पत्रकार उस तरह से व्‍यवहार क्‍यों नहीं करते जैसा पश्चिम के पत्रकार करते हैं। आप देखिए कि वहां के पत्रकार राष्‍ट्रपति पद के उम्‍मीदवार से बिना डरे तथ्‍यात्‍मक सवाल पूछते हैं। अगर कोई बीच में टोकता है तो वे उसे रोक कर कहते हैं, “यह समय इनका है।”

मैं यहां के पत्रकारों से कहना चाहता हूं कि अभी आपका समय नहीं आया है, इसलिए आप  कृपया शांत रहें। क्‍या मैं उन दो लोगों को सुन सकता हूं जिनसे आपने सवाल पूछा है। अजीब बात है कि टीवी के परदे पर दो पत्रकार आपस में ही बात करते रहते हैं और पैनल पर बैठे लोग चुपचाप बैठे रहते हैं। अद्भुत स्‍पेस है ये…।

आप जबरन कोई राय कायम मत करिए। मेरी ये फिल्‍में दो साल से लटकी हुई थीं। मैं आज  भी इस बात पर भरोसा करता हूं कि एक कलाकार का काम अपने तरीके से सर्वश्रेष्‍ठ मनोरंजन करना होता है। हम तो दर्शकों को जिम्‍मेदार नहीं ठहराते या उन पर बंदूक नहीं तानते जब वे हमारी फिल्‍में नापसंद कर देते हैं या हमारे विचार से सहमत नहीं होते?

फिर आखिर क्‍या वजह है कि सबसे पहले खबर देने या सबसे पहले कोई विचार सामने रखने के चक्‍कर में मीडिया दूसरे लोगों का इस्‍तेमाल करता है? कम से कम इतनी प्रतिष्‍ठा बचाकर  रखें कि पूछ सकें- “क्‍या आप मेरे साथ हैं? ”फिर हम दोनों उस पर बात कर सकते हैं… या फिर ऐसे ही चलता रहेगा कि आप हमारे स्निपेट, बाइट, लेख और शब्‍दों को कुल मिलाकर किसी न किसी रूप में अपनी राय पुष्‍ट करने के काम में लाते रहेंगे?

मेरिल स्‍ट्रीप की स्‍पीच के बाद मुझसे यह पूछना कि भारतीय अभिनेता वैसा ही क्‍यों नहीं कर रहे हैं, अजीब बात है। ये तो ऐसे ही हुआ कि अचानक आप मुझसे पूछें कि मैं टाइगर वुड्स जैसा गोल्‍फ क्‍यों नहीं खेल रहा।

बुनियादी बात यह है कि आपको ऐसे लोगों से बात करनी है जिन्‍हें आपकी बात समझ में आये। स्‍ट्रीप ने अपनी बात कहने के लिए जिस जगह का इस्‍तेमाल किया, उसमें मंच से ज्‍यादा अहम वे लोग थे जो उनका कहा समझते थे… ।

मैं मीडियाकर्मियों का इंतज़ार कर रहा हूं कि वे अपने नए-नए अर्जित स्‍टारडम से मुक्‍त हो सकें। अधिकतर मेरे दोस्‍त हैं। मैं उनसे पूछना चाहता हूं: आखिर आप लोग क्‍यों सोशल मीडिया पर मौजूद बेचेहरा हुल्‍लड़बाजों में शामिल होना चाहते हैं जो कुछ भी कह के अचानक मशहूर हो जा रहे हैं? आपको ऐसा करने की जरूरत नहीं है। आप ऐसे लोग हैं जिन्‍हें जनता की राय को सामने रखना था ताकि मैं आपकी और दूसरों की राय से मिलाकर दुनिया के बारे में अपनी राय बना सकूं। जो कुछ हो रहा है, आप उसके बारे में जानकारी का पहला स्रोत हैं…।

आप क्‍यों चाहते हैं कि भारतीय कलाकार स्‍ट्रीप की तरह बोलें? क्‍या मैं यह कह सकता हूं कि मेरी इच्‍छा है कि भारतीय पत्रकार भी मुझे वैसे ही पेश करें? क्‍या यह सही होगा? मुझे ऐसा मंच दीजिए जहां मैं अपनी राय रख सकूं, जो आपकी स्‍टोरीलाइन के एजेंडे की मोहताज न हो। तब मैं बोलूंगा, और मैंने हमेशा अपनी बात कही है।

अनुवाद-अभिषेक श्रीवास्तव

Courtesy: Media Vigil
 

7 मुस्लिम देशों से शरणार्थियों के अमेरिका आने पर डोनाल्‍ड ट्रम्‍प ने लगाया प्रतिबंध

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अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शनिवार को एक ऐसे शासकीय आदेश पर हस्ताक्षर किए हैं। जो शरणार्थियों के प्रवाह को सीमित करने के लिए और चरमपंथी आतंकियों को अमेरिका से बाहर रखने के लिए सघन जांच के नए नियम तय करता है।

डोनाल्‍ड ट्रम्‍प

डोनाल्ड ट्रंप ने सात मुस्लिम देशों से आने वाले मुसलमान शरणार्थियों को बैन कर दिया है। राष्‍ट्रपति ट्रंप ने यह कदम अमेरिकी शरणार्थी पुर्नवास कार्यक्रम को स्‍थगित करके उठाया है। इस ऑर्डर के तहत अमेरिका में सात मुसलमान देशों सीरिया, इरान, इराक, लीबिया, सूडान, यमन और सोमालिया से आने वाले शरणार्थियों पर नए प्रतिबंध लगा दिए गए हैं।

 

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप ने पेंटागन में ऑर्डर को साइन किया और कहा कि हम सिर्फ उन्‍हीं लोगों को देश में एंट्री देंगे जो अमेरिका को सपोर्ट करेंगे और यहां के लोगों से प्‍यार करेंगे।

ट्रंप ने अमेरिका के शरणार्थी कार्यक्रम को 20 दिनों के लिए स्‍थगित कर दिया है। वहीं जांच के लिए नए नियम लागू कर दिए हैं।

बता दें कि ट्रंप ने अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के दौरान और राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के बाद कट्टरपंथी आतंकवादियों के खात्मे का संकल्प लिया था। उन्होंने कहा था कि CIA ऐसा करने के लिए योजना बनाएगी।

Courtesy: Janta Ka Reporter
 

मोदी सरकार में घटा इन्वेस्टमेंट, क्रेडिट एजेसियों ने भी घटाई साख

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मोदी सरकार के 2.5 साल के कार्यकाल में पहली बार ऐसा होने जा रहा है कि कंपनियों का अपनी तरफ से इन्वेस्टमेंट घट गया है और क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों ने भी भारत की रेटिंग को पहले के स्तर से नीचे कर दिया है। इससे आगामी बजट इस सरकार का सबसे मुश्किलों से भरा रहेगा। 

Modi

नोटबंदी से पड़ा है कंपनियों पर काफी असर

समाचार एजेंसी ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, नोटबंदी को 3 महीने से ऊपर का समय गुजर गया है, लेकिन इससे सरकार की चुनौतियां काफी बढ़ गई हैं।  इससे आम लोग तो प्रभावित हुए, साथ ही उद्योगों पर भी काफी नकारात्मक असर पड़ा है।

इस बार के बजट में उद्योगों को रफ्तार देने के लिए कदम उठाने पड़ेंगे। अगर मोदी और वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इसके लिए कोई घोषणा नहीं की तो देश की इकनॉमी पर इसका काफी असर पड़ने की संभावना है। 
 

क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों ने भी घटा दी है रेटिंग

 


 
विश्व की प्रमुख क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां जैसे की फिच, एसएंडपी ग्लोबल, मूडी ने भारत की साख को काफी नीचे कर दिया है। इसके साथ ही रिजर्व बैंक ने भी जीडीपी के अनुमान को 7.6 फीसदी से घटाकर के 6.8 फीसदी कर दिया है। केवल नोमुरा ने कहा है कि नोटबंदी से इकनॉमी पर इतना असर नहीं पड़ा है। 

Courtesy: Amar Ujala