Mahendra-Narayan-Singh-Yadav | SabrangIndia https://sabrangindia.in/content-author/mahendra-narayan-singh-yadav-11193/ News Related to Human Rights Sat, 15 Oct 2016 07:06:38 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.2.2 https://sabrangindia.in/wp-content/uploads/2023/06/Favicon_0.png Mahendra-Narayan-Singh-Yadav | SabrangIndia https://sabrangindia.in/content-author/mahendra-narayan-singh-yadav-11193/ 32 32 संतों ने किया हंगामा तो नास्तिक सम्मेलन करना पड़ा रद्द https://sabrangindia.in/santaon-nae-kaiyaa-hangaamaa-tao-naasataika-samamaelana-karanaa-padaa-radada/ Sat, 15 Oct 2016 07:06:38 +0000 http://localhost/sabrangv4/2016/10/15/santaon-nae-kaiyaa-hangaamaa-tao-naasataika-samamaelana-karanaa-padaa-radada/ उत्तर प्रदेश के वृंदावन में शुक्रवार को धर्माचार्यों ने आखिरकार नास्तिकों का सम्मेलन नहीं होने दिया। सम्मेलन के लिए देश भर से पांच सौ से ज्यादा लोग जुटे थे, लेकिन विश्व हिंदू परिषद और धर्मरक्षा सभा जैसे संगठनों के लोगों के हमले और कड़े विरोध के बाद नास्तिक सम्मेलन रद्द करना पड़ा। उत्तर प्रदेश के […]

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उत्तर प्रदेश के वृंदावन में शुक्रवार को धर्माचार्यों ने आखिरकार नास्तिकों का सम्मेलन नहीं होने दिया। सम्मेलन के लिए देश भर से पांच सौ से ज्यादा लोग जुटे थे, लेकिन विश्व हिंदू परिषद और धर्मरक्षा सभा जैसे संगठनों के लोगों के हमले और कड़े विरोध के बाद नास्तिक सम्मेलन रद्द करना पड़ा।

Sadhu protest
उत्तर प्रदेश के वृंदावन में नास्तिक सम्मेलन का विरोध करते लोग. Image: Hindi BBC

कभी प्रवचन करने वाले और अब नास्तिक हो चुके स्वामी बालेंदु ने इस नास्तिक सम्मेलन का आयोजन किया था। उनका और सम्मेलन के लिए आए अन्य लोगों ने आरोप लगाया है कि उनके साथ मारपीट की गई।

सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार ने फेसबुक पर अपनी पोस्ट के जरिये बताया है कि हिंदुत्ववादी संगठनों ने सम्मेलन में आए लोगों पर हमला किया। यहाँ तक कि महिलाओं की भी पिटाई की गई और उनके कपड़े फाड़ दिए गए। उन्होंने बताया कि प्रशासन के एक बड़े अधिकारी ने आयोजकों से पूछा कि वे लोग ये राष्ट्रविरोधी गतिविधियाँ क्यों कर रहे हैं।

हिमांशु कुमार ने सवाल उठाया है कि क्या नास्तिक होना देशद्रोह हो गया है। शहीद भगत सिंह भी नास्तिक थे, तो क्या वे राष्ट्रद्रोही थे?

स्वामी बालेंदु ने भी कहा कि वो सम्मेलन रद्द होने से निराश जरूर हैं लेकिन इसे अपनी सफलता के तौर पर देखते हैं। वे अपनी मुहिम जारी रखने का ऐलान करते हैं। उनका कहना है कि नास्तिक होना कोई गुनाह नहीं है, और संविधान ने उन्हें भी उतने ही अधिकार दिए हैं जितने कि किसी आस्तिक को दिए हैं।

स्वामी बालेंदु का कहना है, “समाज में ईश्वर और धर्म अंधविश्वास फैलाने का कारण हैं। लोग इनसे दूर होंगे तो बेहतर समाज बनाया जा सकता है।”

सम्मेलन का विरोध करने वालों में शामिल विश्व हिंदू परिषद की वृंदावन नगर इकाई के पूर्व अध्यक्ष और धर्म रक्षा संघ के प्रमुख सौरभ गौड़ का कहना है कि वृंदावन में ऐसा कोई कार्यक्रम होने नहीं दिया जा सकता है क्योंकि वृंदावन धार्मिक नगरी है, भगवान कृष्ण की लीला भूमि है, और करोड़ों लोगों के लिए आस्था का केंद्र है।

सम्मेलन निरस्त होने को अपनी बड़ी सफलता बताते हुए सौरभ गौड़ ने ये भी कहा कि कार्यक्रम का रद्द होना बेहतर है वरना कोई बड़ा कांड हो जाता।

नास्तिक सम्मेलन का विरोध कर रहे लोगों का कहना था कि आयोजक बालेंदु स्वामी ने मंदिर, मस्जिद और गिरिजाघर को धर्मगुरुओं की ऐशगाह बताया था। जिसके बाद साधु-संत गुस्सा हो गए। कार्यक्रम स्थल के बाहर संतों और उनके समर्थकों ने जमकर हंगामा किया। स्थिति को देखते हुए वहां पुलिस बल तैनात करना पड़ा। संतों ने इस संबंध में सिटी मजिस्ट्रेट को ज्ञापन देकर बालेंदु स्वामी की गिरफ्तारी की माँग भी की।

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BHU लाइब्रेरी आंदोलन के निलंबित छात्रों द्वारा राष्ट्रपति महोदय को खुला पत्र  https://sabrangindia.in/bhu-laaibaraerai-andaolana-kae-nailanbaita-chaataraon-davaaraa-raasatarapatai-mahaodaya-kao/ Sat, 24 Sep 2016 11:19:30 +0000 http://localhost/sabrangv4/2016/09/24/bhu-laaibaraerai-andaolana-kae-nailanbaita-chaataraon-davaaraa-raasatarapatai-mahaodaya-kao/ प्रति राष्ट्रपति महोदय,  भारतीय गणतंत्र महोदय ​​​​​​​ हम जैसे छात्र अपने गांव को छोडकर जब शहर पढाई करने आते हैं तो हमारे साथ माॅ-बाप के सपनों के साथ-साथ समाज की उम्मीदों बोझ भी होता है। BHU जैसे संस्थान में घुसते ही हजारो एकड में फैला यह कैम्पस हमें धरती पर स्वर्ग का एहसास कराता है। […]

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प्रति
राष्ट्रपति महोदय, 
भारतीय गणतंत्र

महोदय


​​​​​​​
हम जैसे छात्र अपने गांव को छोडकर जब शहर पढाई करने आते हैं तो हमारे साथ माॅ-बाप के सपनों के साथ-साथ समाज की उम्मीदों बोझ भी होता है। BHU जैसे संस्थान में घुसते ही हजारो एकड में फैला यह कैम्पस हमें धरती पर स्वर्ग का एहसास कराता है। यहां प्रवेश के साथ ही हम अपने जीवन के तमान सपने बुनना शुरू कर देते हैं। 

एक छात्र के रूप में हमारी जिम्मेदारी है कि अपने ज्ञान के साथ-साथ आसपास चेतना का भी विस्तार करें ।किताबों में लिखे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता और न्याय जैसे शब्दों को जब हम BHU के धरातल पर ढूंढने की कोशिश करते हैं तो हमें प्रशासन के तानाशाही रवैये का शिकार होना पडता है।

हम छात्रों ने कैम्पस में स्थित लाइब्रेरी का समय पूर्व की भांति 24 घंटे करने की मांग किया। हमारी इस मांग में वर्णित सुविधाओं को विश्वविद्यालय आज भी अपने प्रवेश पुस्तिका के माध्यम से छात्रों को देने का झूठा दावा करता है। हमनें अपने पढने की इस मांग के लिए हर संभव लोकतांत्रिक तरीका अपनाया। 17 रातें बाहर पढाई कर विरोध दर्ज कराया वहीं लगभग 3000 स्टूडेंट्स से समर्थन में हस्ताक्षर भी करवाए लेकिन अंततः प्रशासन की उदासीनता से दुखी होकर हमें अनिश्चितकालीन भूख हडताल पर जाना पडा। 

विरोध का लोकतांत्रिक तरीका होने के बावजूद बिना किसी जांच कमेटी के बनाए हम 9 छात्रों को दो शैक्षणिक सत्र के लिए निलंबित कर दिया गया। 9 दिनों की भूख हडताल के बाद देर रात 12 छात्रों को 16 थानों की पुलिस और पीएसी बुलाकर उठवा लिया गया। इस पुरे मामले में हमारा पक्ष जानने की भी कोशिश नहीं की गई। हम कैम्पस के सवालों को लोकतात्रिक तरीके से उठाते रहे क्योकि एक छात्र और नागरिक के रूप में यह हमारी जिम्मेदारी है।

 BHU कैम्पस में ही एक छात्र के साथ अप्राकृतिक सामूहिक दुष्कर्म की घटना हुई जिसमें बीएचयू प्रशासन द्वारा आरोपियों को संरक्षण सामने आया लेकिन लाइब्रेरी आंदोलन के हम छात्र पीडित को न्याय दिलाने के लिए मजबूती से खडे रहे और अंततः आरोपी की गिरफ्तारी हुई। यही वजह है कि हाल ही में हुई मारपीट व आगजनी की घटना में बदले की भावना से प्रेरित होकर विश्वविद्यालय प्रशासन हमें फंसाने की कोशिश कर रहा है। बिना किसी सबूत के हमपर IPC की 307 समेत गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज कराया गया है। हमारे पास अपने बेगुनाही का प्रमाण होने के बावजूद कोई सुनवाई नहीं हो रही है।

हमारे लोकतांत्रिक मांगो का जिस प्रकार दमन किया गया उससे कैम्पस में कोई भी स्टूडेंट अपनी समस्याएं रखने में डर रहा है। इस तरह के अलोकतांत्रिक माहौल में देश में कैसी लोकतांत्रिक पीढी पैदा होगी। अपने मां-बाप के सपनों के साथ आए हम छात्र सामाजिक और मानसिक प्रताडना झेल रहें हैं, हमारे सपनों की मंजिले गिर रहीं है, हमें एक सामाजिक अपराधी की श्रेणी में खडा कर दिया गया है बस इसलिए क्योंकि हमने पढने के लिए लाइब्रेरी मांगी थी।

विश्वविद्यालय आलोचनात्म विश्लेषण की जगह होता है जहां हम पुराने नियमों और व्यवस्था को चुनौती देकर नई व्यवस्था लाने का प्रयास करते। इन्ही चुनौतियों की बदौलत मानव सभ्यता का इतना विकास संभव हो पाया है। लेकिन इस तरह की विश्वविद्यालयी व्यवस्था जहाॅ हमसे न्यूनतम लोकतांत्रिक अधिकारों के साथ हमारे मानवीय अधिकार भी छिने जा रहें हैं, शिक्षा के उद्देश्य और राष्ट्र की दिशा पर प्रश्नचिह्न है। लोकतंत्र के प्रहरी हमारे संस्थानों में ही जब बातचित के लिए जगह ना हो, बहस और चर्चा जैसे न्यूनतम लोकतांत्रिक क्रियाकलाप भी प्रतिबंधित हो तो देश व समाज में किस प्रकार के मूल्य स्थापित होंगे ये पूरे मानव समुदाय के लिए चिंता का विषय है।

आप हमारे विश्वविद्यालय के संरक्षक हैं। अतः आपसे निवेदन है कि इस मामले को संज्ञान में लेते हुए उचित निर्णय लेने की कृपा करें। BHU के अंदर हमारे लोकतांत्रिक मूल्य खतरे मे हैं जिसके रक्षा के लिए आपको अपनी भूमिका निभानी चाहिए।
​​​​​​​
दिनांक- 24/09/2016 आपके आभारी लाइब्रेरी आंदोलन के समस्त निलंबित छात्र (BHU)

प्रतिलिपि प्रेषित–
Prime minister of india
Chief minister of U.P.
Vice chancellor of BHU

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ओबीसी कोटे पर यूजीसी के निर्देश का विरोध https://sabrangindia.in/obaisai-kaotae-para-yauujaisai-kae-nairadaesa-kaa-vairaodha/ Sat, 24 Sep 2016 11:12:43 +0000 http://localhost/sabrangv4/2016/09/24/obaisai-kaotae-para-yauujaisai-kae-nairadaesa-kaa-vairaodha/ झारखंड केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति ने केवल असिस्टेंट प्रोफेसर के पदों पर ओबीसी को आरक्षण देने के विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के निर्देश का विरोध किया है और इस बारे में केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर को पत्र लिखा है। कुलपति नंदकुमार यादव ‘इंदु’ ने मानव संसाधन विकास मंत्री को लिखे पत्र में कहा […]

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झारखंड केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति ने केवल असिस्टेंट प्रोफेसर के पदों पर ओबीसी को आरक्षण देने के विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के निर्देश का विरोध किया है और इस बारे में केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर को पत्र लिखा है।

कुलपति नंदकुमार यादव ‘इंदु’ ने मानव संसाधन विकास मंत्री को लिखे पत्र में कहा है कि यह सरकारी नीति का उल्लंघन है। कुलपति ने सवाल उठाया है कि क्या यूजीसी को सरकारी नीति से ऊपर कोई नियम बनाने का अधिकार है। पत्र में कहा गया है:

“भारत सरकार का आदेश इस बारे में बहुत स्पष्ट है कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों के सभी स्तर के, सभी पदों पर ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण दिया जाए। इसमें असिस्टेंड प्रोफेसर, एससोसिएट प्रोफेसर या प्रोफेसर के पदों में कोई भेद नहीं किया गया है। राष्ट्रीय नीति यही है कि अगर पद सीधे विज्ञापन के जरिए भरे जाने हैं, तो ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण देना चाहिए।”

कुलपति ने अपने पत्र में यूजीसी के दो निर्देशों का हवाला दिया है। एक निर्देश 23 मार्च, 2016 को, और दूसरा 3 जून, 2016 को जारी हुआ था। इन निर्देशों में यूजीसी ने कहा है कि एससी और एसटी के लिए असिस्टेंट प्रोफेसर से प्रोफेसर तक सभी पदों के लिए आरक्षण रहेगा, लेकिन ओबीसी का आरक्षण केवल एंट्री लेवल पर ही रहेगा। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने देश के सभी 40 केंद्रीय विश्वविद्यालयों को स्पीड पोस्ट के जरिए ये निर्देश जारी किए थे।
 
इस मामले पर कुछ महीने पहले काफी विवाद भी हुआ था। राष्ट्रीय जनता दल नेता लालू प्रसाद यादव ने आरोप लगाया था कि केंद्र, ओबीसी आरक्षण को खत्म करने में लगा है।

 यूजीसी के वरिष्ठ अधिकारियों का भी कहना है कि 2007 में बनाए नियमों के अनुसार, ओबीसी कोटा केवल एंट्री लेवल पर ही दिया जा सकता है।

कुलपति प्रोफेसर यादव ने मानव संसाधन विकास मंत्री से अनुरोध किया है कि वे यूजीसी को इस बारे में तत्काल उचित निर्देश जारी करें और असंवैधानिक निर्देश वापस करने को कहें। उन्होंने कहा है कि जब तक सरकार इस बारे में कोई अंतिम निर्णय नहीं लेती, तब तक विश्वविद्यालय एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसरों के खाली पदों को भरने की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ा सकती।

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दलितों-आदिवासियों के उत्पीड़न के खिलाफ हुंकार रैली 20 सितंबर को भोपाल में https://sabrangindia.in/dalaitaon-adaivaasaiyaon-kae-utapaidana-kae-khailaapha-haunkaara-raailai-20-saitanbara-kao/ Tue, 13 Sep 2016 13:34:15 +0000 http://localhost/sabrangv4/2016/09/13/dalaitaon-adaivaasaiyaon-kae-utapaidana-kae-khailaapha-haunkaara-raailai-20-saitanbara-kao/  Image Courtesy: Navbharat Times दलित और आदिवासी उत्पीड़न के मामलों को दबाने की तमाम कोशिशें भाजपाशासित राज्यों में नाकाम होती जा रही हैं। झारखंड के बाद अब मध्य प्रदेश में भी दलित और आदिवासी संगठनों ने राज्य सरकार के खिलाफ 20 सितंबर को विशाल रैली करने का ऐलान किया है। झारखंड में भी अक्टूबर में […]

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 Image Courtesy: Navbharat Times

दलित और आदिवासी उत्पीड़न के मामलों को दबाने की तमाम कोशिशें भाजपाशासित राज्यों में नाकाम होती जा रही हैं। झारखंड के बाद अब मध्य प्रदेश में भी दलित और आदिवासी संगठनों ने राज्य सरकार के खिलाफ 20 सितंबर को विशाल रैली करने का ऐलान किया है। झारखंड में भी अक्टूबर में ऐसी ही रैली का आयोजन किया जा रहा है।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के 2015 और उसके पहले के कई वर्षों की रिपोर्टों में बलात्कार, हत्या, लूटपाट, महिलाओं-बच्चों की तस्करी के सर्वाधिक मामले मध्य प्रदेश में ही बताए जा रहे हैं। इनमें भी सर्वाधिक पीड़ित दलित और आदवासी वर्ग है।

लगातार दमन और उत्पीड़न के खिलाफ अब मध्य प्रदेश में दलित और आदिवासी संगठन राजधानी भोपाल में 20 सितंबर को एक विशाल रैली करने जा रहे हैं, जिसे हुंकार रैली नाम दिया गया है। यह रैली इस मायने में भी खास है कि इसमें दलित और आदिवासी मिलकर एक मंच पर शोषण के विरुद्ध आवाज़ उठाएँगे। दलित शोषण मुक्ति मंच और आदिवासी एकता महासभा समेत कई जनसंगठन इस रैली को सफल बनाने में जुट गए हैं।

दलित और आदिवासी संगठनों की चिंता इस बात से भी बढ़ गई है कि अब मध्य प्रदेश में जातीय उत्पीड़न की बढ़ती घटनाओं से होने वाली बदनामी को देखते हुए पुलिस ने अब ऐसे मामलों की एफआईआर दर्ज करने से मना करना शुरू कर दिया है। वैसे तो पहले भी पुलिस अपराध दर्ज करने में हीला-हवाली करती थी, लेकिन नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आँकड़े जारी होने के बाद सरकार ने खास तौर पर पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि जातीय उत्पीड़न के मामले कम से कम दर्ज किए जाएँ।

रैली का आह्वान करने वाले संगठनों का यह भी कहना है कि एससी और एसटी के जाति प्रमाण पत्र बनाने में भी बाधा खड़ी की जाती है। इसके साथ ही तमाम भूमि कानूनों को धता बताते हुए जनजाति और दलित लोगों की आबादी विकास के नाम पर छीनी जा रही है और ऐसे सारे विवादों में सरकार हमेशा पूँजीपतियों का ही साथ देती है।

मजबूर होकर दलित और आदिवासी पलायन करने पर मजबूर हो रहे हैं, लेकिन वो दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में जाते हैं, तो वहाँ उन्हें अनुसूचित जाति और जनजाति का नहीं माना जाता क्योंकि कई ऐसी जातियाँ उन राज्यों में एससी और एसटी की लिस्ट में शामिल नहीं हैं।
 

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  नवरात्रि पर मिलेगा डोमिनोज़ का शाकाहारी पिज्जा https://sabrangindia.in/navaraatarai-para-mailaegaa-daomainaoja-kaa-saakaahaarai-paijajaa/ Tue, 13 Sep 2016 12:52:40 +0000 http://localhost/sabrangv4/2016/09/13/navaraatarai-para-mailaegaa-daomainaoja-kaa-saakaahaarai-paijajaa/ Image(Representational) Courtesy: Onegreenplanet.org नवरात्रि के दौरान माँसाहारी व्यंजनों की बिक्री कम होने से चिंतित डोमिनोज़ पिज्जा ने केवल वेज फूड प्रोडक्ट बेचने का फैसला किया है। अगले महीने से शुरू होने वाले नवरात्रि के त्यौहार के लिए अमेरिकी पिज्जा कंपनी डोमिनोज़ ने यह रणनीति अपनाई है। पिछले दो सालों से कंपनी ने पाया था कि […]

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Image(Representational) Courtesy: Onegreenplanet.org

नवरात्रि के दौरान माँसाहारी व्यंजनों की बिक्री कम होने से चिंतित डोमिनोज़ पिज्जा ने केवल वेज फूड प्रोडक्ट बेचने का फैसला किया है। अगले महीने से शुरू होने वाले नवरात्रि के त्यौहार के लिए अमेरिकी पिज्जा कंपनी डोमिनोज़ ने यह रणनीति अपनाई है। पिछले दो सालों से कंपनी ने पाया था कि नवरात्रि के दौरान उसके खाद्य उत्पादों की बिक्री काफी कम हो जाती है क्योंकि इस अवधि में लोग मांसाहार त्याग देते हैं।

कंपनी इसके लिए उत्तर, मध्य और पश्चिम भारत के कुछ इलाकों में अपने करीब 500 केंद्रों में नवरात्रि के दौरान मांसाहारी खाद्य उत्पाद नहीं परोसेगी। नवरात्रि के दौरान मेन्यू में सिंघाड़े के आटा के पिज्जा होंगे। प्याज, लहसुन और अदरक भी इसमें नहीं रहेंगे। पिज्जा बनाने में साबूदाना और खड़े नमक का इस्तेमाल किया जाएगा।

​​​​​​​कंपनी चाहती है कि नवरात्रि के दिनों में भी उसके ग्राहकों की संख्या में कमी न आए, और इसके लिए वह ग्राहकों की प्रवृत्ति के अनुसार अपने मैन्यू में तब्दीली करने को तैयार हो गई है। हालाँकि, इससे उन ग्राहकों को दिक्कत हो सकती है, जो नवरात्रि पर भी मांसाहार करना पसंद करते हैं।

​​​​​​​डोमिनोज पिज्जा इंडिया के अध्य्क्ष देव अमृतेश इस बात को मानते है कि कि नवरात्रि के दौरान नॉन वेज फूड की माँग घट जाती है। उनका कहना है कि ग्लोबल ब्रांड डोमिनोज पिज्जा को भी इस बात का अहसास हो गया है और वह ग्राहकों की सांस्कृतिक जरूरतों को लेकर सजग है, इसलिए कंपनी अब वेज मैन्यू तैयार कर रही है और यह संभव भी है क्योंकि पिज्जा में कई तरह के बदलाव किए जा सकते हैं।

हालाँकि, डोमिनोज़ के स्टोरों को शुद्ध शाकाहारी बना पाना बहुत कठिन है और कंपनी को इसलिए काफी मेहनत करनी पड़ेगी, लेकिन सांस्कृतिक स्वीकार्यता बढ़ाने के चक्कर में वह ये सब कवायद करने को तैयार है। कंपनी के अधिकारियों को उम्मीद है कि शाकाहारी मैन्यू पेश करने से उनकी बिक्री पूरे वर्ष भर समान रह सकेगी।

 

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ये क्या हो रहा है अमित शाह !! अब हरियाणा में भी दिखाए काले झंडे https://sabrangindia.in/yae-kayaa-hao-rahaa-haai-amaita-saaha-aba-haraiyaanaa-maen-bhai-daikhaae-kaalae-jhandae/ Mon, 12 Sep 2016 20:14:44 +0000 http://localhost/sabrangv4/2016/09/12/yae-kayaa-hao-rahaa-haai-amaita-saaha-aba-haraiyaanaa-maen-bhai-daikhaae-kaalae-jhandae/ ये क्या हो रहा है अमित शाह !!   Image Courtesy:Patrika.com 2014 के लोकसभा चुनावों के समय लोकप्रियता के शिखर पर रहे भाजपा और उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष को अब लगातार जनता के आक्रोश का सामना करना पड़ रहा है। गुजरात में पाटीदारों के सम्मेलन में भाषण अधूरा छोड़कर भागने को मजबूर हुए अमित शाह को […]

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ये क्या हो रहा है अमित शाह !!  


Image Courtesy:Patrika.com

2014 के लोकसभा चुनावों के समय लोकप्रियता के शिखर पर रहे भाजपा और उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष को अब लगातार जनता के आक्रोश का सामना करना पड़ रहा है। गुजरात में पाटीदारों के सम्मेलन में भाषण अधूरा छोड़कर भागने को मजबूर हुए अमित शाह को अब हरियाणा में भी काले झंडे दिखाए गए हैं।

रविवार को जींद में केंद्रीय मंत्री चौधरी वीरेंद्र सिंह द्वारा आयोजित गौरव सम्मान रैली में भी मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर की मौजूदगी में ही अमित शाह को जूनियर बेसिक टीचरों ने काले झंडे दिखाए।

खास बात ये रही कि गुजरात के सूरत के पाटीदार सम्मेलन की तरह जींद में भी पुलिस ने कड़े सुरक्षा इंतजाम किए थे और किसी को भी काले कपड़े रैली स्थल पर ले जाने की अनुमति नहीं दी थी। इसके बावजूद कई महिला शिक्षिकाएँ काले कपड़े और झंडे ले जाने और अमित शाह को दिखाने में सफल रहीं।

अमित शाह के सामने विरोध-प्रदर्शन और नारेबाजी होते देख, पुलिस ने तुरंत प्रदर्शनकारियों को रैली स्थल से हटाया। इस वजह से काफी देर रैली में हंगामा होता रहा। प्रदर्शनकारियों को रैली से दूर भगाने के बाद ही रैली हो सकी।

जेबीटी शिक्षक पिछले 119 दिनों से अपनी नियुक्तियों को लेकर धरने पर बैठे हैं, लेकिन भाजपा की मनोहरलाल खट्टर सरकार उनकी माँगों पर विचार करने को तैयार नहीं है। इन शिक्षकों का चयन दो साल पहले हो चुका है, लेकिन अब तक उनकी नियुक्ति नहीं हो पाई है।

अपने खिलाफ लगातार दो प्रदर्शनों से परेशान अमित शाह ने बाद में भाषण देकर कांग्रेस सरकार और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा की आलोचना की, लेकिन तब तक रैली का मूड बदल चुका था। वैसे मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर ने भी दावा किया कि हरियाणा विकास के पथ पर आगे बढ़ रहा है, लेकिन प्रदर्शनकारी जेबीटी पहले ही उनके दावों की पोल खोलकर जा चुके थे।

सूरत और जींद में अमित शाह का विरोध उनकी घटती लोकप्रियता और टूटते तिलिस्म का तो प्रतीक है ही, साथ ही दोनों गुजरात और हरियाणा में राज्य सरकार से जनता की बढ़ती नाराजगी का भी प्रतीक है। खास बात ये है कि गुजरात में तो अमित शाह और नरेंद्र मोदी का गृहराज्य होने के नाते सरकार पर सीधा दखल है ही, साथ ही हरियाणा में भी तमाम नेताओं के दावों को दरकिनार कर अपेक्षाकृत गुमनाम और अनुभवहीन मनोहरलाल खट्टर को मुख्यमंत्री बनाना भी इन्हीं दोनों नेताओं का फैसला था।
 
Note: Photographs of chairs being hurled and broken at Amit Shah's Surat meeting last week are available but there are no photographs of the black flags shown in Haryana that have been published by the media. The image used here is from the Surat Patidar material that was disrupted soon after it started on September 8. The photo below taken by AAP MLA Ankit Lal shows Shah furious after the meeting had collapsed.

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  अब बुजुर्ग यात्रियों को ट्रेन किराए में छूट पर भी संकट मँडराया https://sabrangindia.in/aba-baujauraga-yaataraiyaon-kao-taraena-kairaae-maen-chauuta-para-bhai-sankata-mandaraayaa/ Mon, 12 Sep 2016 20:05:11 +0000 http://localhost/sabrangv4/2016/09/12/aba-baujauraga-yaataraiyaon-kao-taraena-kairaae-maen-chauuta-para-bhai-sankata-mandaraayaa/ Image Courtesy: Hindubusinessline.com ट्रेनों में फ्लैक्सी किराया लागू करने के बाद भी अगर आम नागरिक समझते हैं कि रेलमंत्री उन्हें और तंग नहीं करेंगे, तो ये उनकी भूल है। अगली गाज अब बुजुर्ग यात्रियों पर पड़ने वाली है। रेल मंत्रालय अब उन बुजुर्ग यात्रियों को यात्री किराए में मिलने वाली छूट वापस करने वाला है […]

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Image Courtesy: Hindubusinessline.com

ट्रेनों में फ्लैक्सी किराया लागू करने के बाद भी अगर आम नागरिक समझते हैं कि रेलमंत्री उन्हें और तंग नहीं करेंगे, तो ये उनकी भूल है। अगली गाज अब बुजुर्ग यात्रियों पर पड़ने वाली है।
रेल मंत्रालय अब उन बुजुर्ग यात्रियों को यात्री किराए में मिलने वाली छूट वापस करने वाला है जो अपने परिवार के किसी सदस्य के साथ यात्रा करेंगे। मंत्रालय ने 31 अगस्त को सभी डिवीजन कर्मशियल मैनेजरों के लिए सर्कुलर जारी किया है, जिसमें कहा गया है कि यदि बुजुर्ग यात्री के साथ उनके परिजन यात्रा कर रहे हैं तो उन्हें किराए में छूट न दी जाए। यानी अब किसी बुजुर्ग को

किराए में छूट तभी मिलेगी, जब वह अपने परिवार वालों के साथ यात्रा न कर रहा हो।

सर्कुलर के अनुसार, अगर बुजुर्ग के परिवार के लोग अलग कोच में आरक्षण कराते हैं, तो बुजुर्ग को किराए में छूट मिल सकती है। साथ ही यह भी कहा गया है कि बुजुर्ग यात्रियों को केवल लोअर बर्थ पर ही रिजर्वेशन मिल सकेगा।
 
इस नए नियम के लागू होने के बाद बुजुर्ग यात्रियों पर बोझ पड़ेगा। अगर उनके परिवारजन अलग से टिकट लेंगे तो बहुत संभव है कि उनकी सीट किसी और कोच में होगी। ऐसे में बुजुर्ग और खासतौर पर बीमार तथा अशक्त लोगों को काफी दिक्कत का सामना करना पड़ सकता है।

रेलवे पहले ही प्लेटफॉर्म टिकट के दाम बढ़ाकर यात्रियों पर बोझ बढ़ा चुका है। इसके बाद टिकट वापसी पर मिलने वाले रिफंड में भी कटौती की गई है। कुछ ट्रेनों पर किराये को भी फ्लैक्सी बनाया गया है जिसके अनुसार जैसे जैसे टिकट बिकते जाएंगे, वैसे-वैसे टिकट महँगा होता जाएगा।

रेल मंत्रालय की बुजुर्ग यात्रियों को दी जा रही छूट लंबे समय से अखर रही है, और इसे वह बहुत बड़ा बोझ मानकर चल रहा है। पहले रेलवे ने गैस सब्सिडी की तर्ज पर बुजुर्ग यात्रियों से रेल किराए में मिलने वाली छूट छोड़ने की भी अपील की थी।
 
 

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