Distorted History | SabrangIndia News Related to Human Rights Thu, 27 Sep 2018 05:52:22 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.2.2 https://sabrangindia.in/wp-content/uploads/2023/06/Favicon_0.png Distorted History | SabrangIndia 32 32 Irresponsible journalism: Dainik Bhaskar distorts Bhopal history, disrespects ‘Rakhi’ bond, publishes false story https://sabrangindia.in/irresponsible-journalism-dainik-bhaskar-distorts-bhopal-history-disrespects-rakhi-bond/ Thu, 27 Sep 2018 05:52:22 +0000 http://localhost/sabrangv4/2018/09/27/irresponsible-journalism-dainik-bhaskar-distorts-bhopal-history-disrespects-rakhi-bond/ September 26, 2018   Dainik Bhaskar, a Hindi newspaper, is more known for its large circulation in Hindi belt, however, it lacks respect and credibility. This was once again proved when the newspaper published a false report and attempted to distort the history of Bhopal. It not only played with facts but also cooked up […]

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September 26, 2018

 

Dainik Bhaskar, a Hindi newspaper, is more known for its large circulation in Hindi belt, however, it lacks respect and credibility. This was once again proved when the newspaper published a false report and attempted to distort the history of Bhopal. It not only played with facts but also cooked up a baseless story and published it, terming it as history. The founder of Bhopal dynasty, Nawab Dost Mohammad Khan, had helped Rani Kamlapati after her husband, Gond ruler Nizam Shah was killed–poisoned to death by his own kin–Alam Shah Gond. After her husband’s death, Rani Kamlapati sought Sardar Dost Mohammad Khan’s help. She tied rakhi on his wrist and also offered financial help.

Khan fought for her and took revenge on the Rani’s behalf. All historical records suggest that all her life, he treated her with utmost respect. However, Dainik  Bhaskar published a report in its edition on September 23. In this report, all facts were changed and a new story was told to readers, without any facts or historical sources. The paper even termed that Kamlapati took ‘jal-samadhi’. Interestingly, there was nothing to substantiate.

So no quote, no historical text was mentioned. However, the report began with, ‘Aisa bataya jata hai’ i.e. ‘It is said that…’. No wonder, the irresponsible reporting has angered citizens in Bhopal. It is clearly a disgrace. Even after decades, the paper is yet to get any credibility among masses. This is perhaps one of the reasons that why it gets little respect, unlike other papers of the region.


 

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Ancient India did not Identify Itself as Hindu: Marathi Writer Raosaheb Kasbe at Bhopal Jan Utsav https://sabrangindia.in/ancient-india-did-not-identify-itself-hindu-marathi-writer-raosaheb-kasbe-bhopal-jan-utsav/ Wed, 06 Dec 2017 06:40:03 +0000 http://localhost/sabrangv4/2017/12/06/ancient-india-did-not-identify-itself-hindu-marathi-writer-raosaheb-kasbe-bhopal-jan-utsav/ Yogesh S from Indian Cultural Forum spoke to  Marathi writer, Raosaheb Kasbe, in Bhopal Jan Utsav. Watch the entire conversation here: Courtesy: Indian Cultural Forum

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Yogesh S from Indian Cultural Forum spoke to  Marathi writer, Raosaheb Kasbe, in Bhopal Jan Utsav. Watch the entire conversation here:

Courtesy: Indian Cultural Forum

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बीजेपी 441 साल बाद राणा प्रताप को जिताएगी हल्दी घाटी का युद्ध ! https://sabrangindia.in/baijaepai-441-saala-baada-raanaa-parataapa-kao-jaitaaegai-haladai-ghaatai-kaa-yaudadha/ Thu, 09 Feb 2017 09:46:33 +0000 http://localhost/sabrangv4/2017/02/09/baijaepai-441-saala-baada-raanaa-parataapa-kao-jaitaaegai-haladai-ghaatai-kaa-yaudadha/ इतिहास की नज़र में तथ्य सर्वाधिक पवित्र होते हैं। नए तथ्यों के आने से इतिहास में बदलाव भी होता है। बदलाव का आधार किसी की इच्छा या राजनीतिक ज़रूरत हो तो फिर वह इतिहास नहीं गप्प कहलाता है। समयचक्र घूमने के साथ ऐसी कोशिश करने वाले हास्यास्पद बन जाते हैं। अफ़सोस कि बीजेपी, मेवाड़ के […]

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इतिहास की नज़र में तथ्य सर्वाधिक पवित्र होते हैं। नए तथ्यों के आने से इतिहास में बदलाव भी होता है। बदलाव का आधार किसी की इच्छा या राजनीतिक ज़रूरत हो तो फिर वह इतिहास नहीं गप्प कहलाता है। समयचक्र घूमने के साथ ऐसी कोशिश करने वाले हास्यास्पद बन जाते हैं। अफ़सोस कि बीजेपी, मेवाड़ के राणा प्रताप की महानता पर ऐसा ही झूठ का मुलम्मा चढ़ाना चाहती है।

Rana Pratap

महाराणा प्रताप की बहादुरी पर किसे नाज़ नहीं होगा। जब सारा राजपूताना अकबर के कदमों में बिछ गया था तो राणा प्रताप अकेले थे जिन्होंने मुगल मनसबदार बनने से इंकार कर दिया। आज़ादी के लिए उनकी कुर्बानियाँ इतिहास में दर्ज हैं और इससे उनकी महानता में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि वे अकबर से हार गए।

लेकिन बीजेपी इतिहास की इस हार को जीत में तब्दील करना चाहती है। पिछले हफ्ते राजस्थान युनिवर्सीटी के सिंडीकेट मेंबर और किशनपोल (जयपुर) से बीजेपी के विधायक मोहनलाल गुप्ता ने प्रस्ताव रखा था कि पाठ्यक्रम बदलकर लिखा जाए कि महाराणा प्रताप हारे नहीं थे बल्कि उन्होंने 1576 ई. में हल्दी घाटी के युद्ध में जीत हासिल की थी। वसुंधरा सरकार के तमाम मंत्री इसके पक्ष में हैं और मसला राजस्थान युनिवर्सिटी की बोर्ड ऑफ स्टडीज़ के सामने पहुँच गया है।

यह इतिहास के साथ मज़ाक है। इस युद्ध का आँखों देखा हाल लिखने वाले अब्दुल क़ादिर बदायूँनी की ‘तारीख़े बदायूँनी’ समेत तमाम समकालीन दस्तावेज़ इस बात को प्रमाणित करते हैं कि हल्दी घाटी के युद्ध में राणा प्रताप हार गए थे। लेकिन वे मुगल सेना की पकड़ में नहीं आये और ‘घास की रोटियाँ’ खाकर भी अपनी आज़ादी की रक्षा करते रहे।

कवि नरोत्तम ने इस भीषण युदध का वर्णन यूँ किया है-

परिय लोथि तिहिं केत नांउ तिनि कोई न जानइ।

इतहि उतहि बहु जोध क्रोध करि भीरहि भानइ।।

राउत राजा राउ  सूर चौडरा जि केउव।

कहत न आवहि पारु औरु चींधरया ति तेउव।।

भिरि स्वाँम काँम संग्राम महि, लगी लोह सब लाज जिहि।

जीत्यौ जु माँ नीसाँन हनि खस्यो खेत परताप तिहि।।

“लड़ाई इतनी भीषण थी कि लाशों पर लाशें गिरने लगीं। इनका कोई नाम तक नहीं जानता था। दोनों तरफ के योद्धा एक दूसरे से जूझ रहे थे। राजा, रावत और घुड़सवार की क्या गिनती, झंडा उठाकर चलने वाले भी अपने मालिक की इज़्ज़त के लिए लड़े। राजा मान सिंह डंके की चोट पर विजयी हुए और महाराणा प्रताप युद्ध क्षेत्र से खिसक लिए।”

दिलचस्प बात यह है कि राणा प्रताप और मुगलों की इस लड़ाई को आरएसएस, हिंदू-मुस्लिम संघर्ष के रूप में प्रस्तुत करता है, लेकिन हल्दीघाटी में राणा की लड़ाई अकबर से नहीं, उनके सेनानायक राजा मान सिंह से हुई थी। यही नहीं, राणा प्रताप के मुख्य सेनानायक थे हकीम खँ सूर जिनके पीछे हज़ारों अफ़गान सैनिक राणा की ओर से मुगलों के ख़िलाफ़ जी-जान से लड़े।

इससे करीब आठ साल पहले सन 1568  ई. में अकबर ने जब खुद चित्तौड़ की घेरेबंदी की थी, तब भी राणा प्रताप किले में नहीं थे। वे शाही फौजों के आने के पहले ही निकल गए थे। किले की रक्षा की ज़िम्मेदारी राजपूत सरदार जयमल के पास थी जो अकबर की बंदूक का निशाना बना था।

यह सही है कि हल्दीघाटी का युद्ध जीतने के बावजूद राणा प्रताप का ना पकड़ा जाना अकबर को  अच्छा नहीं लगा और वे कुछ दिनों तक मान सिंह से मिले नहीं। ऐसी भी अफ़वाहें थीं कि मान सिंह ने जानबूझकर अकबर को निकल जाने दिया क्योंकि उनका पुराना ख़ानदानी रिश्ता था। लेकिन बाद में इसका फ़ायदा मिला जब राणा प्रताप के बेटे अमर सिंह मुगल दरबार में पाँच हज़ारी मनसबदार हो गए और उन्हें सिंध का सूबेदार बना दिया गया।

लेकिन बीजेपी को इतिहास से कोई लेना-देना नहीं। उसके लिए मुगलों और मेवाड़ की लड़ाई महज़ हिंदू-मुसलमान की लड़ाई है औऱ हिंदूराष्ट्र के प्रोजेक्ट की सफलता के लिए राणा प्रताप का जीतना ज़रूरी है, 441 साल बाद ही सही।

(लेखक पत्रकार और इतिहास के विद्यार्थी हैं)
 

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मधु किश्वर जी, तैमूर ने लाखों मुसलमानों का सिर काट कर साम्राज्य बनाया था ! नफ़रत न फैलाएँ ! https://sabrangindia.in/madhau-kaisavara-jai-taaimauura-nae-laakhaon-mausalamaanaon-kaa-saira-kaata-kara/ Tue, 27 Dec 2016 12:11:21 +0000 http://localhost/sabrangv4/2016/12/27/madhau-kaisavara-jai-taaimauura-nae-laakhaon-mausalamaanaon-kaa-saira-kaata-kara/ तस्वीर में सन 1400 में तैमूर लंग के दमिश्क विजय का चित्रण है। सीरिया की राजधानी दमिश्क को जीतने के बाद तैमूर ने उसे जला दिया। शहर के बाहर 20 हज़ार नरमुंडों की मीनार बनाई गई। ये मुंड उन्हीं लोगों के थे जो इस्लाम में अक़ीदा रखते थे। दो साल पहले ही दिल्ली विजय के […]

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तस्वीर में सन 1400 में तैमूर लंग के दमिश्क विजय का चित्रण है। सीरिया की राजधानी दमिश्क को जीतने के बाद तैमूर ने उसे जला दिया। शहर के बाहर 20 हज़ार नरमुंडों की मीनार बनाई गई। ये मुंड उन्हीं लोगों के थे जो इस्लाम में अक़ीदा रखते थे। दो साल पहले ही दिल्ली विजय के समय इस्लाम की दुहाई देने वाले तैमूर को अपने ही धर्म के लोगों के सिर काटने में कोई हिचक नहीं हुई। 

Timur

लेकिन आजकल यह बताने की होड़  लगी हुई है कि तैमूर हिंदुओं का (ही) हत्यारा था। उसने दिल्ली लूटी और लाखों हिंदुओं का क़त्ल करा दिया। यह विवाद  सैफ़-करीना के बेटे के नामकरण से उपजा है। इन फ़िल्मी सितारों ने अपने बच्चे का नाम तैमूर रखा है। क्या यह संयोग है कि इस  विवाद में आये दिन कोई नया ऐंगल जोड़ा जाता है ?  जिस तरह से इस पूरे विवाद को हिंदू-मुसलमान का रूप दिया जा रहा है, उससे तो मामला सुविचारित योजना का ही लग रहा है। मशहूर मोदीभक्त और कभी एक सम्मानित पत्रकार का दर्जा रखने वाली मधु किश्वर का ट्वीट इस सिलसिले की ताज़ा कड़ी है जो बहुत कुछ कहता है। इस ट्वीट के दो संदेश हैं। पहला तो यह कि भारत के मुसलमान तैमूर (लंग) पर गर्व करते हैं और हिंदुओं की यह ज़िम्मेदारी है कि वे दंगों को रोकें (जो ज़ाहिर तौर पर तैमूर के प्रशंसक यानी भारतीय मुसलमानों का शगल है !)

यह कहना फ़िज़ूल है कि मधु किश्वर से ऐसे सस्ते कमेंट की उम्मीद नहीं थी। बल्कि उनसे ऐसी ही उम्मीद थी कि वे एक बच्चे के नामकरण पर उपजे विवाद को वह दिशा दें जिससे विभाजनकारी राजनीति हमेशा फ़ायदा उठाती रही है। स्मृति ईरानी की वजह से कोप भवन में चली गईं मधु किश्वर के लिए यह 'मुख्यधारा' में लौटने का अच्छा मौक़ा था और वे चूकीं नहीं। 

ज़ाहिर है, इस समूह के लिए यह बात संदेह से परे है कि सैफ़-करीना ने अपने बेटे का नाम उसी तैमूर लंग पर रखा है जो 14वीं सदी के अंत में दिल्ली लूटने आया था और उसने ज़बरदस्त क़त्लो-ग़ारत मचाई थी। हालाँकि तैमूुर का अर्थ फ़ौलाद होता है जो तलवार (सैफ़) नामधारी बाप को यूँ भी पसंद आ सकता है। पर ज़ोर इस बात पर है कि नाम तो नि:संदेह तैमूर लंग पर ही है जिसने  हिंदुओं को मारा था (जिसका बदला लेना ऐतिहासिक कार्यभार है ! ) । साफ़तौर पर कोशिश इतिहास से सबक़ लेने की नहीं, उसे तीर बनाकर वर्तमान को घायल करने की है। 
मधु किश्वर का ट्वीट, अकेला नहीं है। ख़ासतौर पर हिंदी मीडिया इन दिनों तैमूर लंग की क्रूरता के क़िस्से सुनाने में जुट गया है। 'हिंदू-हत्यारे' तैमूर के चित्रण में यह बात सिरे से ग़ायब है कि उसने मुसलमानों और ईसाइयों के साथ भी कम बेरहमी नहीं की।  एशिया के उन देशों में भी उसने नरमुंडों के ढेर लगाये जहाँ दूर-दूर तक हिंदू नहीं थे। 

बहरहाल, हिंदी के आम अख़बारों और टीवी चैनलों से क्या शिकायत करें जब यह रोग बीबीसी जैसे जगप्रसिद्ध समाचार संस्थान को लग गया हो। 22 दिसंबर को पंजाब विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर राजीव लोचन के हवाले से बीबीसी हिंदी वेबसाइट में बताया गया है कि कैसे तैमूर ने भारत पर हमले के दौरान 'लाखों हिंदुओं का क़त्ल किया।' लेकिन इस लेख में जब दिल्ली के सुल्तान से युद्ध की बात आती है जिसके पास ‘हाथियों की बड़ी फ़ौज थी’ तो बस इतना लिखा जाता है कि –‘ दिल्ली पर हमला कर नसीरूद्दीन महमूद को आसानी से हरा दिया गया. महमूद डर कर दिल्ली छोड़ जंगलों में जा छिपा।’
सवाल यह है कि सुल्तान महमूद और उसकी सेना में क्या मुसलमान नहीं थे। क्या तैमूर की 'इस्लामी तलवार' ने उन्हें बख़्श दिया। उन्हें फूलो की कटार से मारा ?

इस अर्धसत्य से हिट्स बटोरे जा सकते हैं, लेकिन यह 2016 में किसी तुलाराम के मन में किसी तौसीफ़ के ख़िलाफ़ नफ़रत बोने की जानी-अनजानी कोशिश भी है। इसलिए ‘तुलाराम’ को पूरी बात बताना ज़रूरी है।

हक़ीक़त यह है कि तैमूर लंग वैसा ही लूटेरा और क्रूर था जैसा कि ऐसे साम्राज्य गढ़ने वाले सारे ही 'महान' विजेता थे। चाहे वह सिकंदर रहा हो, चंगेज़ या अशोक प्रियदर्शी। उन्होंने अपने सैन्य अभियानों की राह में आने वाले सभी को बेरहमी से मारा उनके रक्त से नदियों को लाल कर दिया, चाहे वे उन'के धर्म के रहे हों या दूसरे धर्म के।

माफ़ कीजिए, तैमूर के जीवन का मक़सद हिंदुओं को मारना नहीं था ! उसने लगभग आधी सदी तक एशिया के बड़े हिस्से को बुरी तरह रौंदा, जिसमें हिंदुस्तान का मामला महज़ कुछ महीनों का था। इसके लिए भी उसे किसी पृथ्वीराज नहीं सुल्तानी नसीरुद्दीन महमूद तुग़लक को बरबाद करना था।
वैसे, 1336 में ट्रांसआक्सियाना में पैदा हुए तैमूर के एक 'भेड़चोर' से साम्राज्य निर्माता बनने की कथा बहुत दिलचस्प है। उसमें साहस, वीरता, क्रूरता और कमीनेपन के वे सारे गुण-दुर्गुण मौजूद थे जो मध्ययुगीन शासकों को क़ामयाब बनाते थे। वह उसी अंदाज़ में धर्म का इस्तेमाल भी करता था। पश्चिम एशिया से लेकर मध्य एशिया तक फैला उसका विशाल साम्राज्य ग़ैरहिंदुओं के ख़ून (ज़्यादातर मुसलमानों) से रँगा था। उसके सिपहसालार भारत आने को लेकर आनाकानी कर रहे थे तो उसने इस्लाम के लिए दौलत बटोरने का झाँसा दिया, लेकिन यहाँ आकर बख्शा मुसलमानों को भी नहीं। 

तैमूर इतिहास में नरमुंडों के ढेर लगाने के लिए जाना जाता है। 1385 में खुरासान में विद्रोह को दबाने के बाद उसने हज़ारों क़ैदियों को दीवार में ज़िंदा चुनवा दिया। इस्फ़हान में जब विद्रोह हुआ और तैमूर के टैक्स कलेक्टरों को मारा गया तो उसने पूरे शहर को क़त्लग़ाह बना दिया। कहते हैं कि लगभग दो लाख लोगों को काट डाला गया। इतिहास में एक प्रत्यक्षदर्शी का बयान दर्ज है जिसने 1500 सिरों के 28 ढेर गिने थे। सन 1401 में तैमूर ने जब बग़दाद पर क़ब्जा किया तो 20 हज़ार शहरियों का क़त्ल किया गया। उसने अपने सैनिकों को कम से कम दो कटे सिर लाकर उसे दिखाने का हुक़्म दिया। इतिहासकारों का अनुमान है कि तैमूर के भीषण सैन्य अभियान में लगभग डेढ़ करोड़ लोग मारे गए। इनमें अधिकतर मुसलमान ही थे।

तैमूर का भारत अभियान महज़ कुछ महीनों का था। दिसंबर 1398 में सुल्तान महमूद तुग़लक को परास्त करने, भीषण रक्तपात और लूट के बाद वह मार्च 1399 में वापस चला गया। सन 1400 में उसने अनातोलिया पर हमला किया और 1402 में अंगोरा की लड़ाई में ऑटोमन तुर्कों को बुरी तरह परास्त किया। यहां भी गले काटे गए और नरमुंडों के स्तूप खड़े किए गए। 1405 में वह चीन पर हमले की योजना बना रहा था जब उसकी मौत हुई।

यहाँ एक बार और ग़ौर करने की है कि सैफ़-करीना के बेटे का नाम तैमूर अली 'ख़ान' रखा गया है, जबकि लंगड़ा तैमूर कभी 'ख़ान' नहीं हो पाया था। वह अपने नाम के आगे 'अमीर' लगाता था। ख़ान की उपाधि का रिश्ता राजवंशों से था जबकि तैमूर की शुरुआत एक ग़ुलाम और चोर के बतौर हुई थी। उसने इस मर्यादा का अतिक्रमण नहीं किया क्योंकि मध्ययुगीन समाज में उसे यह मान्यता कभी नहीं मिलती।  दिलचस्प बात यह भी है कि 'ख़ान' का इस्लाम से भी कोई रिश्ता नहीं है। यह चीन के हान वंश के लोगों की शिनाख़्त से जुड़ा है। ख़ान के मूल में हान है। हान आगे चल कर ख़ान बन गया और मंगोलिया से होते हुए मध्य और पश्चिम एशिया में फैला। ध्यान रहे कि चंगेज़, कुबलई और हलाक़ू सभी 'ख़ान' थे, पर मुसलमान नहीं थाे 

कहने का मतलब यह है कि इतिहास का अर्धसत्य वर्तमान में ज़हर घोल सकता है।  जिस मीडिया कि दिलचस्पी  अर्धसत्य में है उसके इरादे में खोट है। मधु किश्वर जैसी बुद्धिजीवी इस आग को भड़का रही हैं जबकि उन्हें पता है कि दुनिया का हर साम्राज्य की बुनियाद किसी लुटेरे और हत्यारे ने ही डाली है। यह प्राचीन और मध्यकाल का आम रिवाज था। लोकतंत्र और सेक्युलर राज्य जैसी अवधारणाएँ सदियों के संघर्ष के बाद अस्तित्व में आईं। इसलिए जो लोग सैकड़ों साल पहले हुई लड़ाइयों को 21वीं सदी में लड़ना चाहते हैं, वे समाज को मध्यकाल में धकेलने की ख़्वाहिश रखते हैं।
अपने ही एक शेर से बात ख़त्म करता हूँ-

कोई हो सल्तनत, बुनियाद डाली है लुटेरों ने 
हैं सारे ज़ख्म सुल्तानी तो मरहम आसमानी क्या !
 
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार और इतिहास में डी.फ़िल हैं।)

Courtesy: Media Vigil

 

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‘Parvati’ in Mohenjo-daro: New claims for the statuette are part of the continuing Hindutva project https://sabrangindia.in/parvati-mohenjo-daro-new-claims-statuette-are-part-continuing-hindutva-project/ Tue, 27 Dec 2016 10:26:32 +0000 http://localhost/sabrangv4/2016/12/27/parvati-mohenjo-daro-new-claims-statuette-are-part-continuing-hindutva-project/ The recent paper in the ICHR journal is yet another attempt in the long history of Hindu-ising the remains of the Indus Valley Civilisation.   The Indian Council for Historical Research’s Hindi journal, Itihaas, in its latest issue carries a so-called research paper that identifies the famous “Dancing Girl” bronze statue from Mohenjo-daro with the […]

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The recent paper in the ICHR journal is yet another attempt in the long history of Hindu-ising the remains of the Indus Valley Civilisation.


 

The Indian Council for Historical Research’s Hindi journal, Itihaas, in its latest issue carries a so-called research paper that identifies the famous “Dancing Girl” bronze statue from Mohenjo-daro with the Hindu goddess Parvati. This is not the first time a claim has been made for a widespread Shaiva worship in the Indus Valley civilisation in a bid to Hindu-ise its history.

John Marshall, a colonial archaeologist, was the first one to identify “seal 420” (incidentally also the seal used in the ICHR paper to substantiate the claim) as the “Proto-Shiva” seal.

Image: Wikipedia Commons
Image: Wikipedia Commons

The seal features a figure seated cross-legged, wearing a horned headdress and surrounded by several wild animals. Regarded as a “yogi” and “pasupati” (lord of animals), the figure was recognized by Marshall as being an early form of the Puranic deity, Shiva. Marshall strengthened his claim by identifying the finds of several conical objects as early representations of the Shiva linga.

Marshall’s theory has been refuted several times even as Hindutva-leaning scholars and archaeologists have continued to support it. Scholars such as Doris Srinivasan (1984) and Gregory Possehl (2002) have argued that the theory rests on flimsy evidence since the Vedic predecessor of Shiva, Rudra, was neither a yogi nor a protector of wild animals. The argument also holds relevance for the “Parvati” claim, given the fact that Parvati is a Puranic goddess with no reference in the Vedas, making the hypothesis of her presence in the Indus Valley largely untenable. Furthermore, objects identified by Marshall as Shivalinga were found in drains and streets, places largely regarded as unsuitable for a sacred object. Moreover, the worship of Shiva in the form of a linga surfaces 2000 years after the disappearance of the Indus Valley civilisation.

Furthermore, the presence of a large quantity of female terracotta figurines in the Indus Valley assemblage was interpreted as signifying the presence of a fertility/mother goddess cult in the civilisation. The claim was part of the popular view in the 19th and 20th centuries that a mother goddess cult existed in areas from present day Turkey to western Asia during antiquity. Scholars such as Pusalker (1937) and Hiltebeitel (1978) have used this to trace the origins of Vedic goddesses even as recent studies (Bruce Trigger, 2003 and Sharri Clark, 2003) have dismissed the claim for scarcity of evidence.

Apart from arguing for the prevalence of Shaiva worship and a mother goddess cult in the Indus Valley civilisation, archaeologists such as SR Rao (1980) have interpreted structures in Kalibangan and Lothal as “fire altars” used for the worship of the Fire god referred to in the Vedas as Agni. Gregory Possehl (2002) however refutes the claim arguing that the fire altars “are not fully convincing as ritual facilities, since they could have been for domestic use”.

In 1980, SR Rao claimed to have deciphered the Indus script associating the pictographs with Sanskrit phonemes in a bid to suggest that the first alphabet was invented in the Indus valley by “Vedic scribes”. Michael Witzel (along with Steve Farmer and Richard Sproat, 2004) not only declared this reading as complete bunkum but also remarked that “Rao’s views have no serious backers today even among extreme Hindu nationalists”

BB Lal, in 2002 identified a dried up channel of the Ghaggar Hakra river system, feeding a number of Indus Valley sites, as river Saraswati, mentioned in the Rig Veda. Accordingly, it is argued that the civilisation be renamed to Saraswati Sindhu civilisation or simply Saraswati civilisation. The theory has garnered so much support in right wing circles that the Haryana government not only instituted a Saraswati Heritage Development Board but also recently announced it would pump water into the dried up “Saraswati” channel, a project that will use the tax payers’ money to fructify a myth.

Similarly, AD Pusalker in 1950 gave an argument supporting the assimilation of Vedic and Indus Valley culture primarily using Rig Veda as evidence. Pusalker claims that since the Rig Veda does not mention an “original home outside India, neither do some extra terrestrial influences persist in their culture”, it is safe to say that the Aryan were autochthonous to India. Ghosh (1972) critiqued the likes of Pusalker arguing that there was a gap of 700-900 years between the disappearance of Indus Valley sites and the emergence of the historical period (Vedic Age).

The propaganda behind the Hindu-isation of the Indus Valley Civilisation is to push back the history of Hinduism and to argue that the “Aryans” were the original inhabitants of the Indian subcontinent and not migrants from Central Asian Steppes, as is the widely accepted view in academia. This is why shoddy arguments, such as the presence of a horse in the Indus Valley civilisation, have been frequently made. Doubtlessly, these assertions show a clear superimposition of the present on to the past and stem from the need to fashion a long and glorious “Hindu” history for the subcontinent. Paucity of evidence for such claims is hardly a deterrent for believers.

Ruchika Sharma is pursuing her doctorate in history at Jawaharlal Nehru University.

Courtesy: Scroll.in

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टीवी टुडे के ‘लल्लनटॉप इतिहासकारों’ ने बहादुरशाह ज़फ़र की आँखें फोड़ीं…भारत सम्राट को “मुख़बिर” बताया ! https://sabrangindia.in/taivai-taudae-kae-lalalanataopa-itaihaasakaaraon-nae-bahaadaurasaaha-japhara-kai-ankhaen/ Sat, 13 Aug 2016 05:54:25 +0000 http://localhost/sabrangv4/2016/08/13/taivai-taudae-kae-lalalanataopa-itaihaasakaaraon-nae-bahaadaurasaaha-japhara-kai-ankhaen/   दो-तीन दिन से जारी बेचैनी से निजात पाने के लिए बोलना ज़रूरी था, पर अक़्ल के घोड़े रोके हुए थे। बार-बार कह रहे थे कि पानी में रहकर कब तक मगर से बैर लेते रहोगे ? लेकिन रेडियो मिर्ची पर अभी-अभी सआदत हसन मंटो की कहानी ‘ सन1919 की एक बात’ सुनने के बाद […]

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दो-तीन दिन से जारी बेचैनी से निजात पाने के लिए बोलना ज़रूरी था, पर अक़्ल के घोड़े रोके हुए थे। बार-बार कह रहे थे कि पानी में रहकर कब तक मगर से बैर लेते रहोगे ? लेकिन रेडियो मिर्ची पर अभी-अभी सआदत हसन मंटो की कहानी ‘ सन1919 की एक बात’ सुनने के बाद इन घोड़ों की लगाम कसने की ताक़त हासिल हो गई। पुराने दोस्त दारेन शाहिदी की पुरक़शिश आवाज़ में एक जिस्म बेचने वाली औरत के बदन से पैदा हुए बाग़ी नौजवान के शरीर में धँसी अंग्रेज़ी गोलियों का दर्द जैसे अपने जिस्म में फूट पड़ा जो बुज़दिली और ख़ुदगर्ज़ी के तमाम अहसास को बहा ले गया।

‘बोलना ज़रूरी है’, यह विचार तब भी आया था जब पहली बार इस लेख को पढ़ा था। पहले ग़ुस्सा मगर फिर ख़्याल आया कि क्या मैंने ठेका ले रखा है मीडिया में हो रही ग़लतियों को उजागर करने का ?…मैं क्यों रोज़ किसी न किसी मीडियावाले से रिश्ते बिगाड़ता जा रहा हूँ ? यह तो कुल्हाड़ी पर पाँव मारने की हरक़त है..! पर 'दी लल्लनटॉप.कॉम' पर 9 अगस्त को शाया हुई इस ख़बर को अभी तक यानी 12 अगस्त रात 11 बजे तक 13,693 लोग शेयर कर चुके हैं। ज़ाहिर है, इसे लाखों पढ़ चुके हैं और आगे भी न जाने कितने लाख पढ़ेंगे। वे तो यही समझेंगे कि 1857 की क्रांति में हिंदुस्तान का प्रतीक बनकर उभरा वह 80 बरस का बूढ़ा बादशाह बहादुरशाह बहादुरशाह ज़फ़र अंग्रेज़ों का मुख़बिर था और यह भी कि वह अंधा होकर मरा। इस झूठ को बरदाश्त करते हुए चुप कैसे रहा जाए ?

लल्लनटॉप' यानी..? दरअसल, यह ‘आज तक’ जैसे सबसे तेज़ चैनल और पत्रिका इंडिया टुडे प्रकाशित करने वाले टीवी टुडे  की एक वेबसाइट है। ख़ासतौर पर युवाओं को समर्पित है।

zafar lallon

चीजों को हल्के-फ़ुल्के अंदाज़ में लिखने की अदा हिट्स पाने का उसका अपना नुस्खा है। पर हल्क़ापन इस क़दर बढ़ जाएगा, उम्मीद न थी। जिस लेखनुमा ख़बर ने मुझे बेचैन कर रखा है, उसे आप यहाँ पढ़ सकते हैं। आज़ादी का जश्न मनाते हुए यह साइट 9 अगस्त से रोज़ाना 1857 की क्रांति से जुड़ा एक क़िस्सा छाप रही है। यह सिलसिला 15 अगस्त तक चलेगा।

बहरहाल,मक़सद जिस खबर से है वह 9 अगस्त को 'ऋषभ प्रतिपक्ष' की बाइलाइन से छपी है। ख़बर का शीर्षक है-दिल्ली में 22 हज़ार मुसलमानों को एक ही दिन फाँसी पर लटका दिया गया ! लेकिन इसमें दी गई जानकारियों में यह दो दावे ख़ास चौंकाने वाले हैं—
 
1.लड़ाई अपने तय समय से पहली शुरू हो गयी थी. क्योंकि मंगल पाण्डेय ने कारतूस में चर्बी के नाम पर अपने एक अफसर को मार दिया था. सैनिक वहीं से विद्रोह कर गए. जब बहादुरशाह जफ़र को इसके बारे में बताया गया तो उन्होंने ब्रिटिश अफसरों को खबर कर दी. पर फिर भी उनको नेता बना लिया गया. 

2. बहादुरशाह जफ़र की आंखें फोड़कर उनको रंगून भेज दिया गया. आंखें फोड़ने से पहले उनके बेटों को उनके सामने ही क़त्ल कर दिया गया. 

यानी बहादुरशाह ज़फ़र ने मंगल पांडेय के विद्रोह की ख़बर अंग्रेजों को दे दी थी (मुख़बिरी की ! )। फिर भी उनको नेता बनाया गया (वे इस लायक़ नहीं थे !) । उनके बच्चों को उनके सामने कत़्ल किया गया और उनकी आँखें फोड़ दी गईं (रंगून अंधा बनाकर भेजा गया !)

मैं सोच रहा था कि आख़िर ख़बर लिखने वाले को यह सब पता कहाँ से चला होगा। क्या इतिहास से जुड़ी किसी जानकारी को बिना स्रोत का ज़िक्र किये, ‘कहा जाता है’, ‘सुना जाता है’ के अंदाज़ में लिखा जा सकता है? फिर लगा कि लिखा जा रहा है तो ‘लिखा जा सकता है ? ’ जैसा सवाल मेरी मूर्खता का ही प्रमाण है।

आख़िर सच क्या है…. ?
सच यह है कि मंगल पांडेय की बग़ावत से जुड़ी ख़बर पाकर बादशाह ज़फ़र की प्रतिक्रिया बिलकुल उलट थी। क्रांति की नाकामी के बाद जब लालकिले में ज़फ़र के ख़िलाफ़ मुक़दमा चला तो शाही हक़ीम एहसन उल्ला खाँ ने अपनी गवाही में यह दर्ज कराया-

"मुझे वह महीना याद नहीं है जबकि कलकत्ता रेजीमेंट ने सबसे पहले चर्बी के नए कारतूस लेने से इंकार किया था और उसकी ख़बर बादशाह को मिली। मुझे इतना याद है कि कलकत्ता के किसी अख़बार से यह सूचना मिली थी और जब कारतूसों की स्थान-स्थान पर चर्चा फैली तो यह अनुमान किया गया था कि जितनी अधिक चर्चा होगी उतनी ही अधिक उत्तेजना देश के कोने-कोने में फैलेगी और देशी सेना  अंग्रेजों का नाश करके राज्य को उलट देगी। उस समय बादशाह ने प्रकट किया था कि उनकी दशा अच्छी होगी क्योंकि जो शक्ति राज्य का भार लेगी, वह उनकी इज़्ज़त करेगी।"
(पेज 152, ‘बहादुर शाह का मुक़दमा’ संपादक- ख़्वाजा हसन निज़ामी..(हिंदी अनुवाद) प्रकाशक- स्वर्ण जयंती, संस्करण 1999)

यानी ज़फ़र को उम्मीद थी कि देशी सेना की जीत में उनके सिंहासन या मुग़लिया सल्तनत का रौब लौट आयेगा। ऐसे में उनकी मुख़बिरी का मक़सद क्या हो सकता है ? और क्या अंग्रेज़, सूचना पाने के लिए लालक़िले में बैठे पेंशनयाफ़्ता बूढ़े बादशाह पर निर्भर थे ? अंग्रजों के पास अपना और प्रभावी सूचना तंत्र था जिसका कोई मुक़ाबला न था। दूसरे, जो ख़बर अख़बार के ज़रिये बादशाह तक पहुँची, वह अंग्रेज़ों से कैसे छिपी रह सकती थी ?

लल्लनटॉप को शिकायत है कि ज़फ़र ने ब्रिटिश अफ़सरों को ख़बर कर दी, फिर भी बाग़ियों ने उन्हें नेता बना दिया। शायद 'लल्लनटॉप इतिहासकारों' को अंदाज़ा नहीं कि बाग़ी सिपाहियों की नज़र में ज़फ़र की क्या अहमियत थी। दरअसल, मुग़लिया सल्तनत जिस भी हाल में थी, भारत का प्रतीक थी। अंधेरे में इस बुझते चिराग़ को सूरज बनाने की ठानने वाले क्या सोचते हैं, इसका कुछ अंदाज़ा ख़्वाजा हसन निज़ामी यूँ देते हैं—

"10 मई 1857 को मेरठ छावनी में हुए सिपाही विद्रोह के बाद बाग़ी सेनाओं ने सीधे दिल्ली के लालकिले की ओर कूच किया था और 11 मई की सुबह वहाँ पहुँचकर, अंग्रेज़ों की पेंशन पर गुज़ारा कर रहे और नाम-भर के बादशाह रह गए, बहादुरशाह के आगे गुहार की थी, “ हे धर्मरक्षक, दीन के गुसैंया, हम धर्म को बचाने के लिए अंग्रेज़ों से बिगाड़कर आए हैं। आप हमारे सिर पर हाथ रखें और इंसाफ़ करें। हम आपको हिंदुस्तान का शहंशाह बनाना चाहते हैं।” बादशाह ने अपनी तंगहाली बयान की, “ मेरे पास ख़ज़ाना भी नहीं है कि तुम्हें तनख़्वाह दे सकूँ, न फौज ही है कि तुम्हारी मदद कर सकूँ, सल्तनत भी नहीं कि तुम लोगों को अमलदारी में रख सकूँ।” जवाब में सिपाहियों ने कहा “हमें यह सब कुछ नहीं चाहिए। हम आपके पाक कदमों पर अपनी जान कुर्बान करने आए हैं। आप बस हमारे सिर पर हाथ रख दीजिए।”

 इसके बाद आकाशभेदी जयकारों व तालियों की गड़गड़ाहट के बीच बहादुर शाह ज़फ़र एक बार फिर सचमुच के हिंदुस्तान के बादशाह और हिंदुस्तान की पहली जंगे आज़ादी के नेता बन गए। तोपख़ाने ने 21 तोपों दाग़कर उन्हें सलामी दी।

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यह आँखों देखा हाल बताता है कि बहादुर शाह ज़फ़र को मुख़बिर बताना कितनी बड़ी हिमाक़त है। यह सच है कि मुकदमे के दौरान ज़फ़र ने दलील दी थी कि उन्होंने सैनिकों के दबाव में विद्रोह की कमान संभाली थी, लेकिन अंग्रेजों ने तमाम सबूतों और गवाहों के आधार पर ज़फ़र को ‘पक्का षड़यंत्रकारी’ और ब्रिटिश राज के ख़िलाफ़ जंग करने वाला माना और उन्हें सज़ा सुनाई। कोई लल्लनटॉप गवाह यह साबित नहीं कर पाया कि, "हुज़र, ये तो आपके मुख़बिर हैं..पुराने वफ़ादार, इन्हें क्यों सज़ा दे रहे हैं.?."  

इसी तरह लल्लनटॉप ख़बर देती है कि बादशाह की आँख फोड़ दी गई थी। यह बात न इसके पहले सुनी गई, न पढ़ी गई। बेहतर होता कि लेखक इस जानकारी का स्रोत भी बताता। इसी तरह ‘बादशाह की आँख फोड़ने से पहले शहज़ादों को उनके सामने क़त्ल’ करने की बात भी कल्पना की उड़ान है। सच्चाई यह है कि 22 सितंबर 1857 को तीनों शहज़ादों मिर्ज़ा मुग़ल, अबू बक्र और ख़िज्र सुल्तान को दिल्ली गेट के पास ख़ूनी दरवाज़े पर गोलियों से भून डाला गया। तीनों शहज़ादो का सिर काटे गये और फिर एक थाल में सजाकर और उन्हें रेशमी कपड़ों में ढंककर, हुमायूँ के मक़बरे से पकड़कर लालक़िले में क़ैद करके रखे गये बहादुरशाह ज़फ़र और बेग़म ज़ीनत महल के सामने पेश किया गया। बहादुर शाह ने कपड़ा हटाकर कटे हुए सिरों को देखा तो कहा —“हमारे तैमूरी ख़ानदान के लोग हमेशा इसी तरह सुर्खरू होकर सामने आते हैं।”

अंग्रेज़ों ने ज़फ़र को रंगून भेज दिया ताकि विद्रोह का कोई केंद्रीय प्रतीक भारत में न रहने पाये। ज़फ़र आला दर्ज़े के शायर थे। उनकी आँखें सलामत थी। लिखना-पढ़ना रंगून में भी जारी रहा जहाँ में 7 नवंबर 1862 को उनका इंतक़ाल हुआ। ज़फ़र का यह शेर बड़ा मशहूर है-

‘कितना है बदनसीब ज़फ़र दफ़्न के लिए, दो ग़ज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में..’

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 ( यह बर्मा भेजे जाने से पहले लालक़िले में क़ैद और बीमार बहादुरशाह ज़फ़र की वास्तविक तस्वीर है। आँखें सलामत नज़र आ रही हैं। )

क्या लल्लनटॉप की आलोचना का अर्थ यह है कि मैं पत्रकारों से इतिहास या किसी अन्य विषय का 'ज्ञाता' होने की अपेक्षा कर रहा हूँ ? बिलकुल नहीं। बस मैं इतना कह रहा हूँ कि जब कोई रिपोर्ट करे तो उसके स्रोत के बारे में जानकारी ज़रूर दे। इतिहास का ज्ञाता होना सबके लिए मुमकिन नहीं, लेकिन एनसीईआरटी या एनबीटी की किताबें तो अपने पास रखी ही जा सकती हैं, अगर इतिहास पर लिखने का शौक़ है तो !

हैरानी यह भी है कि लल्लनटॉप में छपा यह लेख अगर चार दिनों से पढ़ा और शेयर किया जा रहा है तो इसकी ग़लतियों पर, टीवी टुडे के फ़िल्म सिटी, नोएडा वाले 'शीशमहल' में मौजूद तमाम संपादकों और आला प्रोड्यूसरों की नज़र क्यों न गई ? अरुण पुरी ने मीडिया इंडस्ट्री के एक से एक नगीनों को इकट्ठा कर रखा है जो यह काम आसानी से कर सकते थे। वे लल्लनटॉप के संपादक से ग़लतियाँ दुरुस्त करने के लिए कह सकते थे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ ! कहीं ऐसा तो नहीं कि वे इस साइट को तवज्जो लायक़ नहीं पाते.. अगर सचमुच ऐसा है तो अरुण पुरी जी से पूछा जाना चाहिए कि फिर करोड़ों हिंदी भाषी जनता ने ही क्या बिगाड़ा है ?

यह कहानी संपादकीय संस्था के बरबाद हो जाने का एक आदर्श नमूना है। एक ज़माने में संवाददाताओं की कॉपी को छह हज़ार रुपये पाकर रिटायर हो जाने वाला उप संपादक मुँह पर दे मारता था। रिपोर्टर को बार-बार कॉपी दुरुस्त करनी पड़ती थी। वह ‘ग्रो’ करता था। लेकिन आजकल यह काम जैसे बंद ही हो गया है। रिपोर्टर को पता ही नहीं चलता कि उसने जो लिखा है, उसमें क्या ग़लती है। वह बस वाह-वाही पर पलता है, और यूँ ही न जाने कितने ऋषभ, ‘वृषभ’ में बदल जाते हैं।
बहरहाल, घड़ी बता रही है कि तारीख़ बदल गई है। तवारीख़ के साथ खिलावड़ की इस कोशिश के ख़िलाफ 'चींटी भर चेष्टा' ने सीने का बोझ कुछ हल्का कर दिया है। अब घर में मढ़वाकर रखी, इलाहाबाद विश्वविद्यालय से मिली इतिहास की डी.फ़िल डिग्री, चुप्पी पर सवाल उठाते हुए शर्मिंदा नहीं करेगी।

लेकिन क्या कभी वे भी शर्मिंदा होंगे जो ज़फ़र को इस क़दर बदनाम कर रहे हैं। क्या लल्लनटॉप की 'आर्काइव' से यह लेख गायब होगा या अनंतकाल तक अपना ज़हर फैलाता ही जाएगा ? ज़फ़र को ऐसी सज़ा तो अंग्रेज़ों ने भी नहीं दी थी। …पढ़िये, उस बादशाह का दर्द —

या मुझे अफ़सर-ए-शाहा न बनाया होता 
या मेरा ताज गदाया न बनाया होता 
ख़ाकसारी के लिये ग़रचे बनाया था मुझे 
काश ख़ाक-ए-दर-ए-जानाँ न बनाया होता 
नशा-ए-इश्क़ का ग़र ज़र्फ़ दिया था मुझ को 
उम्र का तंग न पैमाना बनाया होता 
रोज़-ए-ममूरा-ए-दुनिया में ख़राबी है 'ज़फ़र' 
ऐसी बस्ती से तो वीराना बनाया होता
 
होना तो यह चाहिए था कि आज़ादी की 70वीं सालगिरह पर ज़फ़र की मिट्टी को कू-ए-यार यानी दिल्ली में दो ग़ज़ ज़मीन का दिलाने का संकल्प लिया जाता, लेकिन हो यह रहा है कि ज़फ़र की यादों पर भी झूठ की मिट्टी डाली जा रही है। लल्लनटॉप की हरकत बताती है कि हम किस दर्जे के नाशुकरे हैं ! बख़्श दो यारों इस बूढ़े को.. तरस खाओ… इस लेख को हटाओ..या दुरुस्त करो !
 
(लेखक एक चैनल से बरख़ास्त पत्रकार हैं)

Courtesy: MediaVigil.com
 

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