Voices | SabrangIndia News Related to Human Rights Sat, 13 Feb 2016 10:29:00 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.2.2 https://sabrangindia.in/wp-content/uploads/2023/06/Favicon_0.png Voices | SabrangIndia 32 32 NY’s Public Theater cancels Palestinian production, ‘The Siege,’ it agreed to stage in May https://sabrangindia.in/nys-public-theater-cancels-palestinian-production-siege-it-agreed-stage-may/ Sat, 13 Feb 2016 10:29:00 +0000 http://localhost/sabrangv4/2016/02/13/nys-public-theater-cancels-palestinian-production-siege-it-agreed-stage-may/   Courtesy: http://mondoweiss.net/2016/02/nys-public-theater-cancels-palestinian-production-the-siege-it-was-to-stage-for-may/ This is tragic news. The Public Theater is slamming the door on Palestinian artists. The US Friends of the Jenin Freedom Theatre in Palestine made this announcement today: A message from the US Friends of The Jenin Freedom Theatre regarding the plans to present The Siege in partnership with the Public Theater: It […]

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Courtesy: http://mondoweiss.net/2016/02/nys-public-theater-cancels-palestinian-production-the-siege-it-was-to-stage-for-may/

This is tragic news. The Public Theater is slamming the door on Palestinian artists. The US Friends of the Jenin Freedom Theatre in Palestine made this announcement today:

A message from the US Friends of The Jenin Freedom Theatre regarding the plans to present The Siege in partnership with the Public Theater:

It is with deep regret that we announce that the Public Theater has decided not to proceed with the plans to showcase The Freedom Theatre’s The Siege in May, 2016.

Regardless of the difficulties, we intend to present this play to the US public. We are disappointed, but we are working to find another comparable venue for the play in the fall of 2017.

Thank you,
Friends of The Jenin Freedom Theatre
Constancia, Inea, Kathy, Felice, Yoram, Noelle, Liz, Jen, Josh, Margo, Terry, Dorothy, Dana, Lisa, Shaina, Linda, Gary

The production had already been postponed one year at the request of the Public, but with a promise to put it on this year. It was never on the official schedule; and the decision came down in recent days. I am told that Oskar Eustis, the trailblazing artistic director at the Public, was behind the show all the way. But evidently intense pressure came to bear on the Public Theater board, ala the “Death of Klinghoffer” pressures that came to bear on the Metropolitan Opera over that production, which went off in 2014 but with such opposition that the Metropolitan may well rue that decision. The Public didn’t want to take that chance, evidently.
 

Here is a description of the Siege, a play about resistance. Account from the International Solidarity Movement:
 

Inspired by the true story of a group of freedom fighters, now exiled across Europe and Gaza, The Siege tells of a moment in history that took place during the height of the second intifada in 2002. The Israeli army had surrounded Bethlehem from the air and on land with snipers, helicopters and tanks, blocking all individuals and goods from coming in or out. For 39 days, people were living under curfew and on rations, with their supply of water cut and little access to electricity. Along with hundreds of other Palestinians, monks, nuns and ten activists from the International Solidarity Movement, these five freedom fighters took refuge in the Church of the Nativity, one of the holiest sites in the world.
 
The play gives some insight into what it was like to be trapped inside the church, surviving on so little, with the smell of decaying dead bodies in the building, shot by Israeli snipers. It brings out the hard choice they were faced with between surrendering or resisting until the end. However, no matter what they chose, they were given no other option than to leave behind their family and homeland for ever, as all the freedom fighters – in reality 39 – were deported and have not been able to come back since.
 
We’ll be following this story, which is so reminiscent of the New York Theatre Workshop’s cancellation of My Name Is Rachel Corrie in 2006. Yes, ten years ago, and I keep saying things are thawing. Not in the belly of the beast. What an insult and rebuke to Palestinian artists. More to come.

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लोकसाहित्य और दलित आदिवासी स्त्री की अभिव्यक्ति https://sabrangindia.in/laokasaahaitaya-aura-dalaita-adaivaasai-satarai-kai-abhaivayakatai/ Mon, 11 Jan 2016 08:07:34 +0000 http://localhost/sabrangv4/2016/01/11/laokasaahaitaya-aura-dalaita-adaivaasai-satarai-kai-abhaivayakatai/ Image Courtesy: Jiaur Rahman: Tribal Dance   किसी भी देश के लोकगीतऔर लोकगाथाएं उस देश की आम जनता की भावना, संस्कृति, राग-द्वेष, दुख दर्द, भावनाओं और उनकी सांझी विरासत का दर्पण होती है। लोकगीत और लोकगाथाओं का सृजन आम जनजीवन कीभावनाओं की उन्मुक्त स्थिति है। समाज में जैसा भी अच्छा-बुरा, सुंदर-असुंदर, रहा है, उसके प्रति […]

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Image Courtesy: Jiaur Rahman: Tribal Dance
 
किसी भी देश के लोकगीतऔर लोकगाथाएं उस देश की आम जनता की भावना, संस्कृति, राग-द्वेष, दुख दर्द, भावनाओं और उनकी सांझी विरासत का दर्पण होती है। लोकगीत और लोकगाथाओं का सृजन आम जनजीवन कीभावनाओं की उन्मुक्त स्थिति है। समाज में जैसा भी अच्छा-बुरा, सुंदर-असुंदर, रहा है, उसके प्रति साधारण जन मानस की भावनाएं लोकसाहित्य में ही दिखती है। लोकसाहित्य से ही जन मानस के दुख-दर्द, आशा-निराशा, पीडा, संवेदना, छटपटाहट-चिंताएं, कष्ट और जीवन के प्रति उनका दर्शन समझना संभव है। लोकसाहित्य का आधार मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यु की समाप्ति तक के दर्शन से जुडा होने के कारण इसमें कहीं हर्षोल्लास के क्षण हैतो कहीं दु:ख के बादल मंडराते है। लोकसाहित्य का सबसे महत्वपूर्ण बिन्दु यह है कि इसके मूल में मनुष्य होने की का दर्द छिपा है।

स्त्री के संदर्भ में लोकसाहित्य की सबसे बडी विशेषता उनके मनुष्य होकर भी, मनुष्य के समान ना जीने के अवसर मिलने की पीड़ाऔर उसके अनुभव का व्यक्त होना है। और स्त्रियों में खासकर दलित और आदिवासी स्त्री के साथ तो यह पीड़ा बहुत ही मर्मांतक है। दलित आदिवासी स्त्री जिस ब्राह्मणवादी पुरूषसत्तात्मक समाज में जी रही है, वह उसे निम्न से भी निम्नतर श्रेणी में जीने को मजबूर करता है। लोकसाहित्य दलित आदिवासी स्त्री की अस्मिता, उसकी पहचान से जुड़े गीत, कहानियां उसके प्रति बरती जा रही अमानवीय क्रूरता, उपेक्षा, हिंसा और भेदभाव की पोल पट्टी खोलते हुए, उसके समर्थन में आकर समाज को चुनौती देता है। दलित आदिवासी स्त्री द्वारा रचे गए गीत-प्रगीत, किस्से कहानियां, उनके शारीरिक शोषण से लेकर मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना की शिकायत करते है। उनके प्रति की जा रही घरेलू और सामाजिक हिंसा की मार्मिक दास्तान सुनाते है।

लोकसाहित्य जनमानस की धड़कन होते हुए भी समाजिक उपेक्षा के शिकार रहे है। इसका कारण है लोकसाहित्य का जनमानस से जुडा होना। लोकसाहित्य अपनी सहज अभिव्यक्तीय क्षमता और संपेक्षणीयता के कारणशास्त्रीय साहित्य को हमेशा टक्कर देता रहा है। एक तरफ शास्त्रीय साहित्य हमेशा सत्ता- वैभव- शक्ति सम्पन्न और वर्णव्यवस्था के हिमायती झंडाबरदारों द्वारा पोषित रहा है, दूसरी तरफ लोकसाहित्य आम जन द्वारा अपने द्वारा रोज रोज जिए जा रहे संघर्ष, अनुभव और स्वभाव की सहज सरल संपदा से परिपूर्ण रहा है। शास्त्रीय साहित्य और उसकी कलाएं एक नियम, अनुशासन, रीति से बंधी होती है जबकि लोकसाहित्य भावनाओं की मुक्त-स्वछंद और स्वतंत्र अभिव्यक्ति है। इसीलिए लोकसाहित्य मेंजहां एक ओर आम जनमानस का खुशी से नाचता-झूमता रूप नज़र आता है वहीं दूसरी ओर वह अपने रूदन को भी उतने ही सहज रूप से अभिव्यक्त करता है।

दलित साहित्य में अभी लोकसाहित्य पर काम होना बाकी है।पर सवाल यह है कि दलितों- आदिवासियों के बीच बिखरा पड़े लोकसाहित्य का संग्रह कैसे किया जाए? मेरा मानना है कि दलित- आदिवासी समाज की मनोदशा और उसकी स्थिति को समझने में लोकसाहित्य की बहुत बडी भूमिका हो सकती है, इसलिए इस दुश्कर लेकिन इस अति महत्वपूर्ण और रोमांचकारी काम को सामाजिक काम या सामाजिक उत्तरदायित्व समझकर करना पडेगा।

एक समय लोकगीतों का संकलन काग़ज की बरबादी माना जाता था परन्तु बाद में विख्यात साहित्यकार रामनरेश त्रिपाठी और देवेन्द्र सत्यार्थी आदि ने अपने हाथ में बीड़ा लिया और जगह-जगह घूम-घूम कर इन गीतों को संग्रह किया। आज भी अगर लोकमानस की नस पहचाननी है तो हमें लोकगीतों का अध्ययन करना चाहिए क्योंकि लोकगीत उनकी धड़कन में बसे है। जहाँ आदिवासी लोकगीतों की रचना उनकी संस्कृति और उसके रहन सहन, उनके जल जंगल जमीन से जुड़ाव के गीत है तो वहीं दलित समाज के गीत, समाज में अन्याय, पीड़ा अभाव और मजबूरी में बने रचे। आदिवासियों के जीवन में अशिक्षा, गरीबी उनके शरीर में खून की तरह घुल-मिल गए है । लोकगीत समाज में व्याप्त भेदभाव, शोषण, उत्पीड़न की बेबाक अभिव्यक्ति करते है। अधिकतर लोकगीत कन्या विवाह व कन्या विदाई से सम्बन्धित है, परन्तु कहीं-कहीं कन्या के जन्म पर भी गीत मिल जाते है। आश्चर्य की बात है कि जहां पुत्र जन्म या पैदा होने के अवसर पर गाए जाने वाले लोकगीतों की भरमार है, वहीं कन्या जन्म पर मुश्किल से एका-आध ही गीत मिलते है और वह भी कन्या पैदा ना करने के बारे में, या कन्या पैदा होने पर माँ दादी दादी पिता के मायूस होने व दुखी होने की स्थिति को ही अधिक दर्शाते है।आखिर हमारे समाज में हर कोई चाहे वह शिक्षित तबका हो या अशिक्षित, सबको पुत्र प्राप्ति की कामना ही क्यों रहती है? समाज में यह पितृसत्तात्मक मूल्य कूट कूट कर भरा गया है कि पुत्र ही वंश-वृद्धि और मोक्ष का द्वार है, मृत माता-पिता को कंधा देकर वहीं उन्हे स्वर्ग की सीढियां चढवाता है। इसलिए पुत्र होने पर स्त्री भाग्यशाली और पुत्री होने पर तरह-तरह के तानों से नवाजी जाती है। पुत्र पैदा होकर उसे जग हँसाई से बचाता है। दुनिया में उसका रूतबा बढ़ाता है। यही कारण है कि पुत्रों की कामना में वह व्रत रखती है मनौतियां मानती है। दूसरी ओर जब लड़की होती है तो शोक मनाया जाता है। समाज में लड़की पैदा होने को इस तरह बताया जाता है मानों लड़की होना माने 'कुछ नहीं होना' है। पुत्रों को ज्यादा महत्व देने के संदर्भ में एक अहम बात और है, वह यह कि पुत्र पैदा करना पुरुष के लिए उसकी मर्दानगी की कसौटी है. जिसके पुत्र नही पैदा होते और पुत्रियां ही पैदा होती है वह पिता चाहे अनचाहे मर्दानगी के अभाव के सामाजिक दबाब में जीता है। पुत्रियों वाला पिता, बाकी पुरुष समाज द्वारा या पूरे समाज दवारा हेय अथवा दया की देखा जाता है और अक्सर उपहास का कारण बनता है। जबकि यह एक वैज्ञानिक कारण है कि पुत्र और पुत्री होना ना तो औरत के हाथ में है ना ही पुरुष के हाथ में। फिर भी समाज में तरह तरह के अंधविश्वास और भ्रांतियां फैली हुई हैं, जिस में दोष सिर्फ और सिर्फ स्त्री के सिर ही मढा जाता है।

बन्जारा समाज में भी पुत्री जन्म के समय थाली और पुत्र जन्म के समय नगाड़ा बजाया जाता है।घऱ में बच्चा( पुत्र) पैदा होने के छठे दिन छठी मनाई जाती है। छठी माता की पूजा की जाती है तथा पुत्र के लिए तरह-तरह की दुआएं मांगी जाती है। छठी माता से अनुरोध किया जाता है कि आगे भी उसे पुत्र ही देना पुत्री नहीं देना।नीचे दिए गए बंजारा लोकगीत में एक स्त्री कहती है,“हे ! जन्म देने वाली देने वाली देवी! सन से सुतलीकातने तथा बुनने वाली पुरूष जाति को स्त्री के गर्भ से जन्म देना , सुई-धागे से कपड़े सीने वाली स्त्री जाति को हमारे कोख से जन्म न देना"

वे माता हासत-हासत आयेस
रोतो-रोतो पर जायेस
सण ढेरो लेन वर आयेस
सुई दोरा लेन पर आयेस
सुओ सुतली लेन वर जायेस
लेपो लावण लेन पर जायेस
वे माता हासत-हासत आयेस
रोतो-रोतो पर जायेस
           (बंजारा जाति, समाज और संस्कृति यशवन्त जाधव, वाणी प्रकाशन पृष्ठ 25-26)

अब क्या कारण है कि इस देश की धरती पर एक स्त्री दूसरी स्त्री का जन्म ही देना नही चाहती ? क्या इसका कारण परिवारों में महिलाओं का पितृसत्ता के कलंक में अपने हाथ रंगना, स्त्री होने की पीड़ा से अपनी बेटी को बचाना है, या फिर दहेज प्रथा या महिलाओं की समाज में सबसे निम्नतम जगह होना है अथवा कुछ और?बन्जारा जाति में औरतों का जीवन जीवट भरा होता है। घर के अधिकांश काम जिनमें घर-बाहर के सारे कामकाज के साथ-साथ अपने खुद के कपड़े भी स्वयं सीना भी शामिल है, सब उसे ही करने पड़ते है। पुत्री के विवाह के समय उसका वर पक्ष से मूल्य लेना क्या एक बंजारा औरत को आहत नही करता होगा, जब उसके कौमार्य को, उसके स्वाभिमान को, कुछ रूपयों में पति रुपी मर्द के हाथ में बेच दिया जाता है? उसे दिनभर लोहे की बड़ी-2 भट्टियों में तपना पड़ता है। लोहे के हंसिये, तवे, चिमटे बेचने के लिए, बाजार में बेठकर सभ्य समाज की गन्दी निगाहों का शिकार होना पड़ता है, शायद उसकी यही व्यथा गीतों में फूट पड़ती है कि सूई से कपड़े सीने वाली स्त्री जाति को धरती पर जन्म मत देना।

पर बेटी होने की अपनी खुशियां भी है। कहीं कहीं लोकगीतों में बेटी होने का जश्न या खुशी भी दिखती है, पर वह क्षणिक ही होती है, जैसे इस लोकगीत में जिसमेंकबदायूं क्षेत्र की एक गर्भवती बहू भगवान से बेटी देने की इच्छा प्रकट करती है-

मैं तो पहले जनौगी धीयरी,
मेरी जौ कौख होय सुलच्छनी।।
जाकी गरजति आवैगी बराइति री,
पालिकी चढ़ि आवै साजन

परन्तु तुरन्त ही उसे यह अहसास हो जाता है कि बेटी तो ब्याह के अपने घर चली जायगी। घर और मेरी कोख दोनों खाली हो जायेगी। इसलिए मैं बेटी ना जनके बेटा जनूंगी जिससे मेरा घर भरा पूरा रहे। बहू घर में रूप भरती हुई घर में डोलेगी। महत्वपूर्ण और रोचक तथ्य यह है कि लोक साहित्य में जहाँ कन्याजन्म की चर्चा बहुत ही कम है जबकि पुत्र जन्म के ऊपर हजारों गीत हैं, दूसरी ओर कन्या के विवाह को लेकर अनगिनत गीत मिलते है। एक लोकगीत में कन्या अपने पिता से सवाल पूछती है,“हे ! पिताकौन ग्रहण रात में लगता है? कौन दिन में? और कौन ग्रहण बेवक्त लगता है? और कब छूटता है?”पिता अपनी पुत्री के सवालों का जबाब देता हुआ कहता है,“हे बेटी! चन्द्र ग्रहण रात में लगता है और सूर्य ग्रहण दिन में। कन्या ग्रहण का कोई ठिकाना नहीं कि कब लगे और कब छूटे?”

आदिवासी समाज में भी जन्मगीत खूब मिलते है परन्तु आदिवासी समाज में लड़की होना उतनी शर्म की बात नहीं जितना की अन्य समाज में। इसका कारण शायद यही है कि आदिवासी समाज में स्त्री-पुरुषों के संबंधों में कुछ तो समानता रही ही है। एक मुण्डा लोकगीत जिसमें एक स्त्री अपनी पुत्री की जन्मk संबंधी जिज्ञासा शांत करते हुए कहती है कि-जब लड़का पैदा होता है तब सूर्य उगा, जब चांद उगा तू लड़की पैदा हुई। जब लड़का पैदा हुआ तब गोहाल उजड़ गया और जब लड़की पैदा हुई तब गोहाल भर गया।
 

दलित आदिवासी स्त्री द्वारा रचे गए गीत-प्रगीत, किस्से कहानियां, उनके शारीरिक शोषण से लेकर मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना की शिकायत करते है। उनके प्रति की जा रही घरेलू और सामाजिक हिंसा की मार्मिक दास्तान सुनाते है।

दलित स्त्रीजाति के बाण से किस प्रकार घायल होती है, वह अपने दलित होने की सजा हमेशा पाती है। एक तरफ उसे दलित समझकर उसको उपभोग की वस्तु समझा जाता है तो दूसरी और उसको सबसे ज्यादा सामाजिक हिंसा का शिकार होना पडता है। सवर्ण समाज के स्त्री पुरुष दोनों ही उसको तरह तरह से उत्पीड़ित करते है। वह जीवन के प्रत्येक स्तर पर जातीय भेदभाव, धार्मिक पाखंड तथा अंधविश्वास झेलती है।दलित औरतों का किस प्रकार यौन शोषण किया जाता है, उनकी गरीबी का, उनके देह का इस्तेमाल किस कदर किया जाता है,इसका एक मैथिली गीत 'भंडौवा' में छूआछूत मानने वाले एक ब्राह्मण के इसी स्वरूप का पर्दाफाश किया है। जिस ब्राह्मण की बात बात किसी के स्पर्श मात्र से ही जात चली जाती है, उसी ब्राह्मण का दलित स्त्री के साथ जबर्दस्ती शारीरिक संबंध बनाने से, उनका चुंबन लेने से जाति नही जाती है। दलित स्त्रियां ऐसे ढोंगी ब्राह्मण पर ताने कसते हुए और उसका मजाक बनाते हुए कहती है कि-  

अरे हो बुडबक बमना, अरे अरे हो बुडबक बमना
चुम्मा लेते में जात नहीं जाएं रे।
सुपति- मडनियां लाए डोमिनियां, मांगे प्यास से पनियां
कुआं के पानी ना पाए बेचारी, दौड़ल कमला के किनरियां,
सोही डोमनियां जब बनली नटिनियां, आंखी मारे पिपनियां?
ते करे खातिर दौड़ले बौड़हवा, छोड़के घर में बमनियां।
जोलहा, धुनिया, तेलनियां के पीए न छुअल पनियां
नटिनी के जोबना के गंगा जमुनुवां में डुबकी लगा के नहनियां।
दिन भर पूजा पर आसन लगा के पोथी पुरान बचनियां
रात के ततमा टोली के गलियन में जोत खीजी पतरा गननियां
भकुआ बमना चुम्मा लेवे में जात नहीरे जाए।

 -(लोकगीतों में क्रान्तिकारी चेतना- विश्वमित्र उपाध्यय पृ.स.18 प्रकाशन विभाग)
ऐसे ही एक गरीब दलित महिला जब गांव की सभी गैर दलित महिलाओं को त्यौहार पर सुंदर सुंदर कपडे पहने देखती है तो अपनी सहेली से कहती है कि- कार्तिक माह में सब महिलाएं अच्छेवस्त्र पहनकर स्नान करने जायेगी। परन्तु मैं तो फटा पुराना वस्त्र पहनकर ही जाऊंगी क्योंकि मेरे पास अच्छे वस्त्र नहीं हैं-
कातिक हे सखि पुन्य महीना, सखि
सब कोई पहिने पाट पंय्बर
हम सखि गुदरी पुरान है।।
पूस हे सखि ओस पड़ि गेल,
भीजि गेल लामी लामी केश है।
जाड़ा छेदे, तन सुई सन छन छन
थर थर कांपई करेज हे।
(लोकगीतों में क्रान्तिकारी चेतना पृ.स.16, प्रकाशन विभाग)

अकाल, भूख, गरीबी, अभाव की मार सबसे ज्यादा गरीबदलित तबके की स्त्री को ही झेलनी पड़ती है। दलितों के पास ना तो अपनी जमीन होती है और ना ही खेत-खलिहान होते है। सौ मेंनब्बे प्रतिशत खेतिहर मजदूर- किसान, असंगठित क्षेत्रों में काम कर रहे मजदूर दलित समाज के ही होते है। इन दलित आदिवासी भारतीय मजदूरों की हालत किसी से छिपी नही है। वे बेहद गंदे और छोटे घरों में रहते है. जहां बिजली, पानी, हवा, स्कूल, अस्पताल आदि किसी भी तरह की व्यवस्था नही होती। पुरुष कामगारों से भी अधिक स्त्री मजदूर कामगारों की हालत खराब होती है। ना उन्हे मजदूरी ठीक से मिलती है और ना ही एक कामगार के बराबरी का रुतबा और ना ही सम्मान । ऐसे में वह घर से लेकर बाहर तक शोषण अन्याय उत्पीड़न की चक्की मे रात-दिन पिसती है। ऐसी ही परिस्थितियां झेल रही एक श्रमिक महिला समाज से सवाल करती है कि वह कड़ी धूप में जब मिट्टी तोड़ रही है, उसके पास इतनी मेहनत करने के बाद भी ना पहनने को पूरे कपड़े हैं और ना ही भूख मिटाने का खाना. जब वह पसीने और मिट्टी से तरबतर है तब मालिक और अमीर लोग अपने अपने घरों में गट्ट-गट्ट खाना खाकर आराम से सो रहे है। 

अंग पर अंगिया नही, भूखी प्यासी मैं
गिट्टी तोड़ती हूँ इस भरे घास में
पत्थर की किरच छक की आवाज़ से
मेरे शरीर पर टकराती है,
मेरा जीवन हराम है।
अंग पर पसीना छक छक करता है
नयनों से आंसुओं का परनाला बहता है।
ओ मां मेरे शरीर पर मिट्टी खप से चुभ जाती है।
रक्त की धार बह उठती हैं
पैसे वाले गट्ट गट्ट खाना खाकर
घर पर आराम करते है।
(लोकगीतों में क्रान्तिकारी चेतना वही पृष्ठ 161)
 
सर्दी गर्मी बरसात चाहे कोई मौसम हो हरेक मौसम में गरीब दलित आदिवासी लोगों का जीवन दूभर होता है। सर्दी की विभीषिका को झेलते हुए एक मुंडा आदिवासी स्त्री कहती है-
हाय जाड़ा तुम चले जाओ।
हाय ठंड तुम उठ जाओ.
हे जाड़ा तुम उन व्यापारियों के पास चले जाओ
हे ठंड तुम उन सौदागरों के पास चले जाओ
जिनके पास मोटे कपड़े है
( बांसुरी बज रही है- मुण्डा लोकगीत- पृष्ठ 136, श्री जगदीश त्रिगुणायत)
 
अधिकांश लोकगीतों में सास, ननद, पति, ससुर, देवर के नाकारात्मक चित्र है। दरअसल सास ससुर, देवर नंद और पति यह सब लोग भारतीय परिवारों में पितृसत्तात्म मूल्यों के प्रहरी बन असहाय स्त्री पर जुल्म करते है। यह जातिवादी भारतीय मानसिकता ही है कि ताकतवर कमजोर पर अत्याचार करने में अपनी शेखी समझता है। चूंकि बहु को विवाह करके लाया गया है, उसे अच्छी तरह तोल-मोल और देख-दाख के परिवार के लिए लाया गया है इसलिए उस से रात-दिन काम करवाकर, उसके साथ खरीदी गई दासी की तरह बर्ताव करने का अधिकार अनचाहे ही पूरे परिवार को मिल जाता है ।ज्यादातर लोकगीतों में भाई अपनी बहन के लिए, बेटा अपनी माँ के लिए तो कहीं-कहीं बेहद संवेदनशील दिखाई देता है, पर वह अपनी पत्नी के लिए वैसा स्नेह, सुरक्षा की भावना, संवेदनशीलता नही जुटा पाता है। जैसे ही उसकी पत्नी बच्चे के रुप में बेटा नही जन्मती, पत्नी के रुप में उसके माता पिता की सेवा नही करती, या घर के काम काज को परिवार के मानदण्डो पर पूरा नही करती, वैसे ही पति उसका किसी बहाने परित्याग, या फिर दूर नौकरी के बहाने से उसे छोड कर चला जाता है। बहुत सारे लोकगीतों में पति के खिलाफ एक पत्नी के दुख दर्द और वेदना ही प्रकट हुई दिखती है।एक निमाड़ी गीत में पति को पंखा करते समय पत्नी को नींद आ गई तो उसे उसका पति उसे बुरी तरह से पीट देता है।

धणियेर राजा सोया सुख सेज
रणुबाई रीझ रणों जी.
डोलत जे डोलत आई गई झपकी
हाथ का रीझणों, भुई गिरयो जी
धणियेर राजा की खुलि गई नींद,
तड़ा  तड़ मारयो  ताजणी ।
(पृष्ठ संख्या-110, लोकगीतों में वेदना और विद्रोह- संपादक माता प्रसाद, सम्यक प्रकाशन)

दलित समाज में अपना हास्य-बोध, सौन्दर्य-बोध और प्रेम-बोध है। जहां गैर दलित लोकगीतों में पति के अत्याचार वाला रूप प्रमुख है पर दलित स्त्रियों द्वारा गाए जाने वाले लोकगीतों में पति-पत्नी के हास्य विनोद, प्रेम-स्नेह, लड़ाई- झगड़े के चित्र भी खूब दिखाई देते है। दलित समाज में गाए जाने वाले गीतों में दहेज-प्रताड़ना के गीत कम है, क्योंकि इस समाज के पास देने के लिए दहेज है ही नही।दलित आदिवासी परिवारों में अभी भी स्त्री-पुरुष समानता के कुछेक तत्व बचे हुए है। एक लोकगीत में पति पत्नी के बीच आपस का प्यार इस प्रकार प्रकट हुआ है-

मैं बड़ी दूर से आया, मेरो गोरी.. मुन्डसे बीच नगीना
मैंने ऐसा पंखा डोला, जल्दी मरा पसीना
मुझे ऐसी करके राखियों, मेरा राजा, जैसे गूंठी बीच नगीना
मैं बडी दूर से आया, मेरो गोरी, सुरमें बीच सपीना
मैंने ऐसा पंखा डोला जल्दी मरा पसीना
मुझे ऐसा करके रखियों, मेरा राजा, जैसा किंगूठी बीच नगीना
( पृष्ठ संख्या 146, मेरठ जनपद की परिगणित जातियों के लोकसाहित्य का अध्ययन- लेखक डॉ. देवी सिंह)

पति के बाहर कमाने के लिए जाने पर पत्नी का उसके साथ जाने की बात पर अड़ना, उससे लडाई झगडा करने वाली भावनाओं पर बहुत सारे लोकगीत है। इन लोकगीतों में पति के बाहर जाने पर पत्नी का अकेले पड़ जाने का भय, तथा ससुराल के अत्याचार झेलने का डर स्वाभाविक दिखता है। अक्सर होता भी यही था कि जिसमें पति बाहर नौकरी करने चला जाता है फिर अपनी ब्याहता औरत को सुध नही लेता था। आदमी के लिए बाहर की दुनिया है तो औरत के लिए घर की घुटनभरी दुनिया। ऐसे ही एक लोकगीत में कमाने के लिए परदेश जा रहे पति के किसी भी शर्त पर जाने के लिए एक ब्याहता स्त्री कहती है-

'अपने बलम की टोपी बनूंगी, जुल्फो में रहूंगी रे
मेरे राजा फूल गुलाब के, गुलकन्द बनूंगी रे
मैं रो रो अखियों लाल, बलम तेरे साथ चलूंगी रे
अपने बलम का सुरमा बनूंगी रे, डोरों में रहूंगी रे
मैं रो रो अंखियों लाल, बलम तेरे संग चलूंगी रे'
( पृष्ठ संख्या 149, मेरठ जनपद की परिगणित जातियों के लोकसाहित्य का अध्ययन- लेखक डॉ. देवी सिंह)
 
पति के परदेश जाने पर, औरत अकेली हो जाती है ऐसे में उसके अकेले पड़ जाने पर अक्सर परिवार के ही दूसरे लोग चाहे वह पड़ोसी हो या रिश्तेदार, या फिर अपने ही घर के सगे-संबंधी, वे इन अकेली पड़ गई औरतों का जबर्दस्ती फायदा उठाने में कोई कोर कसर नही छोड़ते। छोटे भाई के कमाई के लिए परदेस जाने पर, बडा भाई यानि जेठ कैसे छोटे भाई की बीबी को छेडता है इसका बड़ा ही मार्मिक वर्णन एक लोकगीत में मिलता है। जेठ की शिकायत करने पर परिवार का कोई सदस्य उसको उसकी इस हरकत के लिए नही रोकता, अपितु बहु को ही दोष देने लगता है। यहां तक कि बहु को अपनी रक्षा करने के लिए जेठ पर तेल छिड़क-छिड़क कर मरने मारने की भी धमकी देने का असर नही होता –

पकड़ आम की डाली, धनि क्यूं खड़ी
का तुझै लगा है बैराग, ता का मैथिली हारी
चला जा रे मूरख गंवार, तुझे मेरी का पड़ी
मेरे राजा गए परदेश, अन्देसे में मैं खड़ी
गंगा रे जमन के बीच, जउड़े दो मक्खियां
अरे देख राजा तेरी बाट, दुख मेरी अंखियां।
मैं गम गम कोठे चढ़ गई री, मेरे हाथ में घड़ी।
पीछे से जेठा चढ़ गए री, मेरी बईया पकड़ी।
घरों में बैठी सासल, मैंने उनसे कहीं
मना लो अपने पेटा ने,मेरी बईया पकड़ी
म्हारा क्या इसमें दोस, तू ता सुथरी घणी।
आजा रे मेरे जेठा, जोड़ी अजब मिली।
छिड़कूंगी मटिया का तेल, बोतल आले में धरी।
( पृष्ठ संख्या 151, मेरठ जनपद की परिगणित जातियों के लोकसाहित्य का अध्ययन- लेखक डॉ. देवी सिंह)
 

पुत्रों को ज्यादा महत्व देने के संदर्भ में एक अहम बात और है, वह यह कि पुत्र पैदा करना पुरुष के लिए उसकी मर्दानगी की कसौटी है. जिसके पुत्र नही पैदा होते और पुत्रियां ही पैदा होती है वह पिता चाहे अनचाहे मर्दानगी के अभाव के सामाजिक दबाब में जीता है।

 
मेरठ जनपद की परिगणित जातियों के लोकसाहित्य का अध्ययन के लेखक डॉ. देवी सिंह ने दलित समाज में प्रचलित ऐसे लोकगीतों का संकलन किया है जिसमें दलित समाज की स्त्रियां अपने परिवार में अपनी इच्छाओं आकांक्षाओं को खुलकर बताती है। उनके इच्छाओं आंकाक्षाओं पर परिवार के द्वारा रोक ना होकर अपितु इन इच्छाओं को पूरा करने में सहयोग ही दिखाई देता है। निश्चय ही दलित समाज में दलित स्त्री की आजादी के लिए बंधन उतने कठोर नही रहे है जितने कि सवर्ण समाज में रहे है। लोकगीतों में कुछ ऐसे भी गीत है जहां कुंवारी लड़किया अपने होने वाले पति से मिलना चाहती है या फिर उन्हें किसी से प्रेम हो जाता है तो वे उसके साथ जाना चाहती है। वह किसी से छुपकर या छुपाकर नहीं बल्कि परिवार के अन्य सदस्यों को बताकर मिलने जाना चाहती है।

कमला लिकड बाग ते, बाग में कौन बटेऊ सै
अम्मा बैल्ले में दूध सेल्ला, बाग में तेरा जमाई सै
मेरी अम्मा रान्धे दाल, भावज मेरी मान्डे पोवे सै
मेरी लाई कई कसार, सखी मेरी तेल दिखावै सै
मणे पहरी रेशमी सूट, के झिल मिल होरी सै
मणे ओड़ी काल बेल, के झिलमिल होरी सै
मणे दिया सीट पे पैर के गाड़ी चालू हो री सै
छोरूं ने मारी किलकारी , है रै र र होरी सै
( पृष्ठ संख्या 140, मेरठ जनपद की परिगणित जातियों के लोकसाहित्य का अध्ययन- लेखक डॉ. देवी सिंह)
 
इसी तरह एक और लोकगीत में विवाह से पूर्व लड़की अपनी दादा-चाचा-ताऊ से अपने होने वाले दूल्हे से मिलने के लिए जाना चाहती है तो वह अपने चाचा ताऊ दादा से अरज करती है कि मेरे होने वाले पति बाग में आ गये है मैं उनसे कैसे मिलने जाऊ ? तब चाचा ताऊ और दादा लड़की को उसके भावी दूल्हे से मिलने के लिए मालन और धोबिन बनकर जाने के लिए कहते है –
लाडो बेटी अरज करे दादा से, मैं किस विद देखन जाऊ
रंगीले आ गये बागन मैं।
हाथ छबडियां फूलन की है , लाडो मालनियां बनके जाऊ
रंगीले आ गये बागन मैं।।
बोल गये बतलाए गये बागन मैं,
मेरी हलद चढ़ी लाडों कू, नजर लगाए गये बागन मैं
मेरी केस खिली लाडो को, नजर लगाय गये बागन मैं
लाड़ो अरज करै बाबा से, मैं किस विद देखन जाऊं
रंगीले आ गए बागन में
जल का लोटा हाथन में लाड़ो धोबनियां बन के जाओ।
छबीले आ गये तालन में
बोल गये बतलाय गये तालन में
मेरी सीरी चढ़ी लाडों कू, नजर लगाए गये तालन मैं
मेरी केस खिली लाडो को, नजर लगाय गये तालन मैं
( पृष्ठ संख्या 143, मेरठ जनपद की परिगणित जातियों के लोकसाहित्य का अध्ययन- लेखक डॉ. देवी सिंह)
 
ऐसी गीतों की रचयिता स्वयं औरतें ही रही है और वे इन्ही गानों के माध्यन से अपने मन की इच्छाओं को बताती रही है। दलित-आदिवासी स्त्रियों की एक बडी खूबी है कि वे अपने जीवन को पूरी जीवटता से जीती है। वे किसी भी परिस्थितियों में हार नही मानती है। झलकारी बाई, फूलो झानो,सिनगी दई, ऊदादेवी पासी, महावीरी देवी से लेकर फूलन देवी तक दलित आदिवासी स्त्रियां असख्य की संख्या में हमारे सामने शूरवीरता की मशाल लेकर खडी है। यह स्त्रियां जितनी जाबांज, जितनी मेहनती होती है उतनी ही हास परिहास में भी माहिर होती है। अगर किसी को देखना हो तो इनके हास-परिहास व इनके व्यंग्य की मारक क्षमता लड़के के विवाह में बारात जाने के बाद देखी जा सकती है जिसमें बारात में ना जाकर घर पर रुकी औरतें मिलकर विवाह की पैरोडी बनाकर नाटक की तरह खेलती है। जिनमें उनकी हंसी के पात्र पंडित-जमींदार- शोहदे से लेकर ऐसे लोग बनते है जो उनको किसी तरह तंग या बुरी निगाह से देखते है। समाज में फैली कुरीतियां भी इनके व्यंग्य की धार से लहुलुहान हो जाती है।

ऐसे ही एक लोकगीत में एक पत्नी अपने पति के साथहास्य-विनोद करती हुई और पति को जलाने, चिढ़ाने के लिए अपने देवर का सहारा लेती हुई कहती है –
मेरे राजा ने बाग लगाय दिया रै,
छोटे देवर ने नीमड़ी लगाई रै।
मन रसिया, रसिया रे, गेटूरा रै।।
राजा के बागों में ना जाऊं रै।
छोटे देवर की नीमड़ी की नीमड़ी में सोऊ जाय रै।
( पृष्ठ संख्या 145, मेरठ जनपद की परिगणित जातियों के लोकसाहित्य का अध्ययन- लेखक डॉ. देवी सिंह)

इसमें कोई संदेह नही कि अगर दलित-आदिवासी संस्कृति की खोज करनी है, दलित-आदिवासी समाज को समझना है तो हमें लोकसाहित्य को खंगालना पड़ेगा। क्योंकि लोकसाहित्य मनुष्य के आपसी संबंधो से लेकर उनके सामाजिक व्यवहार, उनके प्रति बाकी समाज का रवैया, उनकी परंम्पराएं, उनके हर्ष-विषाद के क्षण को खोजने की कुंजी है। सबसे पहले किसी समाज को जानने के लिए सबसे प्राथमिक तथ्य उनकी अपनी वाचिक और मौखिक परंपरा ही होती है। खासकर ऐसे समाज की मनोदशा को जनाने के लिए, जिस पर सदियों से जुल्म अत्याचार, भेदभाव, शोषण होता रहा हो. जो मात्र दलित समाज में जन्म लेने के कारण ही प्रत्येक मानवीय अधिकार से दूर कर दिए गए। जिनकी हालत जानवरों से भी बदतर कर दी गई हो। जिनके शरीर के साथ दिमाग को भी गुलाम बना लेने का पूरा षड़यंत्र रचा जाता रहा हो। ऐसे समाज को जानने के लिए उस समाज की लोकसाहित्य की परम्परा को पढा जाना, उसे लिखा जाना और उसे स्थापित किया जाना बेहद जरुरी है।

(अनिता भारती सुप्रसिद्ध दलित स्त्रीवादी साहित्यकार और सामाजिक कार्यकर्ता है।)
 
 

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विद्रोह की मशाल से समाज को रोशनी – कवियित्री भी थी सावित्री बाई फुले https://sabrangindia.in/vaidaraoha-kai-masaala-sae-samaaja-kao-raosanai-kavaiyaitarai-bhai-thai-saavaitarai-baai/ Sun, 03 Jan 2016 12:05:48 +0000 http://localhost/sabrangv4/2016/01/03/vaidaraoha-kai-masaala-sae-samaaja-kao-raosanai-kavaiyaitarai-bhai-thai-saavaitarai-baai/   यह जानकर गहरा आश्चर्य होता है कि 18 वीं शताब्दी में भारत की पहली अध्यापिका तथा सामाजिक क्रांति की अग्रदूत सावित्रीबाई फुले एक प्रखर, निर्भीक, चेतना सम्पन्न, तर्कशील, दार्शनिक, स्त्रीवादीख्याति प्राप्त लोकप्रिय कवयित्री, अपनी पूरी प्रतिभा और ताकत के साथ उपस्थित होती है लेकिन किसी की निगाह उन पर जातीभी नहीं? या फिर दूसरे […]

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यह जानकर गहरा आश्चर्य होता है कि 18 वीं शताब्दी में भारत की पहली अध्यापिका तथा सामाजिक क्रांति की अग्रदूत सावित्रीबाई फुले एक प्रखर, निर्भीक, चेतना सम्पन्न, तर्कशील, दार्शनिक, स्त्रीवादीख्याति प्राप्त लोकप्रिय कवयित्री, अपनी पूरी प्रतिभा और ताकत के साथ उपस्थित होती है लेकिन किसी की निगाह उन पर जातीभी नहीं? या फिर दूसरे शब्दों में कहूं तो उनके योगदान पर, मौन धारण कर लिया जाता है। सवाल है इस मौन का, अवहेलना और उपेक्षा का क्या कारण है? क्या इसका एकमात्र कारण उनका शूद्र तबके में जन्म लेना और दूसरा स्त्री होना माना जाए?सावित्रीबाई फुले का पूरा जीवन समाज के वंचित तबकों, खासकर स्त्री और दलितों के अधिकारों के लिए संघर्ष और सहयोग में बीता। ज्योतिबा संग सावित्रीबाई फुले ने जब क्रूर ब्राह्मणी पेशवाराज का विरोध करते हुए,लड़कियों के लिए स्कूल खोलने से लेकर तत्कालीन समाज में व्याप्त तमाम दलित-शूद्र-स्त्री विरोधी सामाजिक, नैतिकऔर धार्मिक रूढ़ियों-आडंबरों-अंधविश्वासों के खिलाफ मजबूती से बढ-चढकर डंके की चोट पर जंगलड़ने की ठानी, तब इस जंग में दुश्मन के खिलाफ लडाई का एक मजबूत हथियार बना उनका स्वरचित साहित्य।इसका उन्होंने प्रतिक्रियावादी ताकतों को कड़ा जबाब देने के लिए बहुत खूबसूरती से इस्तेमाल किया। सावित्रीबाई फुले के साहित्य में उनकी कविताएं, पत्र, भाषण, लेख, पुस्तकें आदि शामिल है।
 
कवयित्री सावित्रीबाई बाई फुले ने अपने जीवन काल में दो काव्य पुस्तकों की रचना की, जिनमें उनका पहलासंग्रह‘काव्य-फुले’ 1854 में तब छपा; जब वे मात्र तेईस वर्ष की ही थी। उनका दूसरा काव्य-संग्रह ‘बावनकशी सुबोधरत्नाकर’ 1891 में आया, जिसको सावित्रीबाई फुले ने अपने जीवनसाथी ज्योतिबा फुले की परिनिर्वाण प्राप्ति के बाद उनकी जीवनी रूप में लिखा था।
 
अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी में ब्राह्मणवाद का कट्टरतम रूप अपने चरमोत्कर्ष पर था। उस समय सवर्ण हिन्दू समाज और उसके ठेकेदारों द्वारा शूद्र, दलितों और स्त्रियों पर किए जा रहे अत्याचार-उत्पीड़न-शोषण की कोई सीमा नहीं थी। बाबा साहेब ने उस समय की हालत का वर्णन अपनी पुस्तक 'एनिहिलेशन ऑफ कास्ट' में करते हुए कहा है-'पेशेवाओं के शासनकाल में, महाराष्ट्र में, इन अछूतों को उस सड़क पर चलने की आज्ञा नही थी, जिस पर कोई सवर्ण हिन्दू चल रहा हो। इनके लिए आदेश था कि अपनी कलाई में या गले में काला धागा बांधे, ताकि हिन्दू इन्हें भूल से भी ना छू लें। पेशवाओं की राजधानी पूना में तो इन अछूतों के लिए यह आदेश था कि ये कमर में झाडू बांधकर चलें, ताकि इनके पैरों के चिह्न झाडू से मिट जाएं और कोई हिन्दू इनके पद चिन्हों पर पैर रखकर अपवित्र न हो जाएं।अछूत अपने गले में हांडी बाँधकर चले और जब थूकना हो तो उसी में थूकें, भूमि पर पड़ें हुए अछूत के थूक पर किसी हिन्दू का पैर पड़ जाने से वह अपवित्र हो जाएगा'।
 
ऐसी विपरित परिस्थितियों में सावित्री बाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1931 को महाराष्ट्र के सतारा जिला के एक छोटे से ग्राम नायगांव में हुआ। मात्र 9 साल की उम्र में ग्यारह साल के ज्योतिबाके संग ब्याह दी गई। केवल सत्रह वर्ष की उम्र में ही सावित्रीबाई ने बच्चियों के एक स्कूल की अध्यापिका और प्रधानाचार्या दोनों की भूमिका को सवर्ण समाज के द्वारा उत्पन्न अड़चनों से लड़ते हुए बडी ही लगन, विश्वास और सहजता से निभाया। समता, बंधुत्व, मैत्री और न्यायपूर्ण समाज की ल़डाई के लिए, सामाजिक क्रांति को आगे बढ़ाने के लिए सावित्राबाई फुले ने साहित्य की रचना की। आज भी यह बात बहुत कम लोग जानते है कि वे एक सजग, तर्कशील, भावप्रवण, जुझारू औरक्रांतिकारी कवियित्री थी। मात्र 23 साल की उम्र में उनका पहला काव्य संग्रह काव्य-फुले आ गया था, जिसमें उन्होंने धर्म, धर्मशास्त्र, धार्मिक पाखंडों और कुरीतियों के खिलाफ जम कर लिखा। औरतों की सामाजिक स्थिति पर कविताएं लिखी और उनकी बुरी स्थिति के लिए जिम्मेदार धर्म, जाति, ब्राह्मणवाद और पितृसत्ता पर कड़ा प्रहार किया। अपनी एक कविता में वे दलितों औऱ बहुजनों को समाज में बैठीअज्ञानता को पहचान कर, उसे पकड़कर कुचल- कुचल कर मारने के लिए कहती है क्योंकि यह अज्ञानता यानी अशिक्षा ही दलित बहुजन और स्त्री समाज की दुश्मन है। जिससे जानबूझकर सोची समझी साजिश के तहत वंचित समूह को दूर रखा गया है।
 
           
उसका नाम है अज्ञान
उसे धर दबोचो, मजबूत पकड़कर पीटो
और उसे जीवन से भगा दो
 
इस अशिक्षा रूपी अज्ञानता के कारण ही पूरा बहुजन समाज सवर्ण हिन्दुओं का गुलाम बना है। इनके पाखंड और कूटनीति के हथियार ज्योतिष, पंचाग, हस्तरेखा आदि पर व्यंग्य करती हुई सावित्री बाई फुले कहती है-
 
ज्योतिष पंचाग हस्तरेखा में पड़े मूर्ख
स्वर्ग नरक की कल्पना में रूचि
पशु जीवन में भी
ऐसे भ्रम के लिए कोईस्थान नहीं
पत्नी बेचारी काम करती रहे
मुफ्तखोर बेशर्म खाता रहे
पशुओं में भी ऐसा अजूबा नहीं
उसे कैसे इन्सान कहे?(पेज-2)
 
सावित्रीबाई फुले जानती है कि शूद्र और दलितों की गरीबी का कारण क्या है। लोग समझते है कि ब्राह्मणवाद केवल एक मानसिकता ही नही वरन् एक पूरी व्यवस्था है जिससे धर्म और ब्राह्मणवाद के पोषक तत्व देव-देवता, रीति-रिवाज, पूजा-अर्चना आदि गरीब दलित दमित जनता को अपने में नियंत्रण में रखकर उनकी उन्नति के सारे रास्ते बंद कर उन्हें गरीबी, तंगी, बदहाली भरे जीवन में धकेलते आए हैं।
 
शूद्र और अति शूद्र
अज्ञान की वजह से पिछड़े
देव धर्म, रीति रिवाज़, अर्चना के कारण
अभावों से गिरकर में कंगाल हुए-
                                     (पेज- 6)
 
वे शूद्रों के दुख को, जाति के आधार पर प्रताड़ना के दुख को दो हजार साल से भी पुराना बताती है। सावित्रीबाई फुले इसका कारण मानती है कि इस धरती पर ब्राह्मणों ने अपने आप को स्वयं घोषित देवता बना लिया है और उसके माध्यम से यह स्वयं घोषित ब्राह्मण देवता अपनी मक्कारी और फरेब का जाल बिछाकर, उन्हें डरा-धमका कर रात-दिन अपनी सेवा करवाते है।
 
दो हजार साल पुराना
शूद्रों से जुड़ा है एक दुख
ब्राह्मणों की सेवा की आज्ञा देकर
झूठे मक्कार स्वयं घोषित
भू देवताओं ने पछाड़ा है।-   पेज 14
 
सावित्रीबाई फुले के अनुसार, ब्राह्मणों का ग्रंथ 'मनुस्मृति', दलित, शूद्र और स्त्री की दुर्दशा का जिम्मेदार है इसलिए वे मनुस्मृति के रचयिता मनु को इस बात के लिए आड़े हाथ लेती है जिसमें यह कहा गया है कि जो हल चलाता है, जो खेती करता है वह मूर्ख है। दरअसल सावित्रीबाई फुले इस बात के पीछे छिपे षडयंत्र को जानती हैं। वे जानती है कि यदि शुद्र और दलित खेती करेंगे तो सम्पन्न होंगे। यदि वे सम्पन्न होंगे तो खुशहाली भरा जीवन जिएंगे, जिससे वे ब्राह्मणों की धर्माज्ञा मानना बंद कर देंगे। इसलिए मनुस्मृति रचयिता को खरी-खरी सुनाते हुए वे कहती हैं – 
 
हल जो चलावे, खेती जी करे
वे मूर्ख होते है, कहे मनु ।
मत करो खेती कहे मनुस्मृति
धर्माज्ञा की करे घोषणा, ब्राह्मणों की।
 
शूद्र और दलित यहाँ के मूलनिवासी यानी 'नेटिव' है। आक्रामक आर्य बाहर से आए थे और उन्होने अपनी चलाकी और धूर्तता से, अन्य सत्ताधारी शासकों से मिलकर यहां के भोले -भाले मूलनिवासियों को पद-दलित कर दिया। लेकिन यहाँ के नेटिव मूलनिवासी अपने शौर्य दयालुता और प्रेम आदि जीवन मूल्यों में विश्वास रखते आए है। इन शूरवीर जननायकों में छत्रपति शिवाजी, महारानी ताराबाई, अंबाबाई आदि हैं, जिन्होने समतामूलक समाज बनाने के लिए अन्याय और अत्याचार के खिलाफ लडाई लडी। सावित्रीबाई फुले इन शूरवीरों के समक्ष अपना सिर झुकाती हैं। महान शूरवीर योद्धा बलिराजा के प्रति अपना सम्मान प्रकट करते हुए और अपने तथा अपने वंचित समाज को उनका वंशज मानतीहुई, कहती हैं –
 
शूद्र शब्द का
सही अर्थ है-नेटिव
आक्रामक शासकों ने
शुद्र का ढप्पा लगाया।
 
पराजित शूद्र हुए गुलाम
इराणी ब्राह्मणों के
और ब्राह्मण अंग्रेजों के
बने उग्र शूद्र ।
 
असल में शूद्र ही
स्वामी इंडिया के
नाम उनका था इंडियन
 
थे शूर पराक्रमी हमारे पुरखे
उन्ही प्रतापी योद्धाओं के
हम सब वंशज हैं।
 
शूद्र राजा बलिराजा के राज में समृद्धि है, जनता के पास काम है। वह मेहनती है। खुश है। सुखी है और खुशहाल है। एक वंचित वर्ग के शासक बलिराजा को सिर पर ताज की उपाधि देते हुए सावित्री बाई फुले कहती है-
 
बलिराज में जनता सुखी-संतोषी
 
दान में पाएं याचक स्वर्ण घन कंचन
सिर पर ताज रत्नों का बलिराज
और जनता के विशाल मन
 
छत्रपति शिवाजी बडे शूरवीर योद्धा और जननायक हैं। वंचित तबके की शूद्र-अतिशूद्र जनता उन्हें अपना हमदर्द मानकर सुबह-सवेरे रोज याद करती है और उनका शौर्य गान गाती है-
 
छत्रपति शिवाजी को
सुबह- सवेरे याद करना चाहिए
शूद्र-अतिशूद्र के हमदर्द
उनका गुणगान करे पूरी भावना से।
 
 
आगे वे इसी कविता में कहती है कि राजा नल द्रौपदी युधिष्ठिर आदि का गान तो केवल शास्त्र पुराणों तक ही सीमित है जबकि शिवाजी की शौर्य गाथाएं इतिहास में दर्ज हो गई है और हमेशा रहेगी।
 
नल राजा युधिष्ठिर, द्रोपदी
आदि
नामी गिरामी शास्त्र-पुराणों के
पन्नों तक ही सीमित
किन्तु छत्रपति शिवाजी की शौर्य गाथा
है इतिहास में दर्ज।
 
शूद्र अतिशूद्र और आदिवासी समाज में स्त्रियाँ बहुत बहादुर और जुझारू होती है। वह किसी भी कठिन से कठिन परिस्थिति में भी हार नही मानती हैं। मुसीबत आने पर भी किसी भी मोर्चे अपने समाज के साथ खडी होकर अपने बच्चों को साथ ले, बराबरी से डटकर मुकाबला करती है।महारानी छत्रपति ताराबाई ऐसी ही एक बहादुर योद्धा थी। उनको लड़ाकू वीरांगना की पदवी देते हुए सावित्रीबाई फुले उन्हें शत्रु मर्दिनी, शेर की तरह दहाडने वाली, बिजली से भी अधिक फुर्तीली बताती है और उनको अपना प्रेरणास्त्रोत मानती है।
 
महारानी ताराबाई लड़ाकू वीरागंना
रणभूमि में रण चंडिका तूफानी
युद्ध भूमि में युद्ध की प्रेरणास्त्रोत
आदर से सिर झुक जाता
उसे प्रणाम करना मुझे सुहाता
 
सावित्रीबाई फुले अपनी तमाम उम्र दलित वंचित शूद्र व स्त्री तबके के जिस अधिकार के लिए लड़ती रही वह अधिकार था शिक्षा का। इस पूरे वर्ग को जानबूझकर शिक्षा रहित करके उसी ताकत योग्यता और उसके श्रम का शोषण किया गया। उसके वो तमाम रास्ते जो उसे आगे ले जा सकते थे, जो उसे अन्याय के खिलाफ प्रतिकार करने की ताकत देते थे, जो उसे शोषण और अत्याचार से लड़ना सिखाते थे, सब के सब शिक्षा के अधिकार के बिना अधूरे रह गए। सावित्रीबाई फुले ने सवर्णों की इस कुचाल को समझा कि यह सवर्ण समाज कभी दलितों वंचितों और शूद्रों को पढने लिखने नही देगा इसलिए सावित्रीबाई ने सबसे ज्यादा अपनी कविताओं के माध्यम से शिक्षा प्राप्त करने की अलख जगाई। उन्हें अपने सामाजिक कार्यों द्वारा अनुभव हो चुका था कि शिक्षा के बिना, खासकर अंग्रेजी शिक्षा के बिना शूद्र अतिशूद्र तथाकथित मुख्यधारा के विकास में शामिल नहीं हो सकते। अत: वह शूद्र अति शूद्रों को अंग्रेजी पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करती हैं, और अपनी कविता अंग्रेजी मैय्या मे कहती है-
 
"अंग्रेजी मैय्या, अंग्रेजी वाणई
शूद्रों को उत्कर्ष करने वाली
पूरे स्नेह से।
 
अंग्रेजी मैया, अब नहीं है मुगलाई
और नहीं बची है अब
पेशवाई, मूर्खशाही।
 
अंग्रेजी मैया, देती सच्चा ज्ञान
शूद्रों को देती है जीवन
वह तो प्रेम से।
 
अंग्रेजी मैया, शूद्रों को पिलाती है दूध
पालती पोसती है
माँ की ममता से।
 
 
अंग्रेजी मैया,तूने तोड़ डाली
जंजीर पशुता की
और दी है मानवता की भेंट
सारे शूद्र लोक को।
 
इसी तरह अपनी दूसरी कविता 'अंग्रेजी पढ़ो' में शूद्रो अतिशूद्रों को अपनी जीवन शिक्षा से सुधारने के लिए कहती है-
 
स्वाबलंबनका हो उद्यम, प्रवृत्ति
ज्ञान-धन का संचय करो
मेहनत करके।
 
बिना विद्या जीवनव्यर्थ पशु जैसा
निठल्ले ना बैठे रहो
करो विद्या ग्रहण।
 
शूद्र-अतिशूद्रों के दुख दूर करने के लिए
मिला है कीमती अवसर
अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त करने का।
 
अंग्रेजी पढ़कर जातिभेद की
दीवारें तोड़ डालो
फेक दो भट-ब्राह्मणों के
षड्यंत्री शास्त्र-पुराणों को।
 
धार्मिक रूढियों, अँधविश्वास और आडंबर की पोल खोलकर उनका मजाक बनाते हुए, उसपर व्यंग्य करती हुई सावित्रीबाई अपनी मन्नत कविता में कहती है-
 
पत्थर को सिंदूर लगाकर
और तेल में डुबोकर
जिसे समझा जाता है देवता
वह असल में होता है पत्थर
 
आगे वह इसी कविता में पत्थर से मन्नत माँगकर पुत्र प्राप्त करने की अवैज्ञानिकता का मखौल उड़ाते हुए कहती है-
 
यदि पत्थर पूजने से होते बच्चे
तो फिर नाहक
नर-नारी शादी क्यों रचाते?
 
जिस समय सावित्रीबाई का प्रथम कविता संग्रह काव्य फुले आया उस समय सावित्रीबाई फुले शूद्र-अतिशूद्र लड़कियों को पढा रही थीं। ज्योतिबा सावित्री ने पहला स्कूल 13 मई 1848 में पहला स्कूल खोला था और काव्यफुले 1852 में आया। जब वे पहले पहल स्कूल में पढ़ाने के लिए निकली, तो वे खुद उस समय बच्ची ही थी। उनके कंधे पर ज्यादा से ज्यादा बच्चों को स्कूल तक लाना तथा उन्हें स्कूल में बनाए रखने की भी बात होती। सावित्रीबाई फुले ने बहुत ही सुंदर बालगीत भी लिखे हैं, जिसमें उन्होंने खेल-खेल में गाते गाते बच्चों को साफ-सुथरा रहना, विद्यालय आकर पढाई करने के लिए प्रेरित करना व पढाई का महत्व बताना आदि है। बच्चों के विद्यालय आने पर वे जिस तरह स्वागत करती है वह उनकी शिक्षा देने की लगन को दर्शाता है –
 
सुनहरे दिन का उदय हुआ
आओ प्यारे बच्चो
आजहर्ष उल्लास से
तुम्हारा स्वागत करती हूँ आज
 
वह विद्या को श्रेष्ठ धन बताते हुए कहती है –
 
विद्या ही सच्चा धन है
सभी धन-दौलत से बढ़कर
जिसके पास है ज्ञान का भंडार
है वह सच्चा ज्ञानी लोगों की नज़रो में
 
अपने एक अन्य बालगीत में बच्चों को समय का सदुपयोग करने की प्रेरणा देते हुए कहती है
 
करना है जो काम आज
उसे करो तुम तत्काल
 
जो करना है दोपहर में
उसे कर लो तुम अभी 
 
पलभर के बाद का काम
पूरा कर लो इसी वक़्त 
 
काम पूरा हुआ कि नहीं ?
न कभी भी पूछती मृत्यु कारण।
 
 
सावित्रीबाई फुले की एक बालगीत पुस्तक'समूह' एक लघुनाटिका के समान लगती है। इस कविता में वे पांच समझदार पाठशाला जाकर पढने वाली शिक्षित बच्चियों से पाठशाला न जाने वाली अशिक्षित बच्चियों की आपस में बातचीत व तर्क द्वारा उन्हें पाठशाला आकर पढ़ने के लिए कहती हैं तो निरक्षर बच्चियाँ जवाब देती है-
 
अरे, क्या धरा है पाठशाला में
क्या हमारा सिर फिर गया है ?
पाठशाला जाने से तो अच्छा है खेलना
चलो चलो, जाकर खेलें।…..
 
 
उन्हीं में से कुछ बच्चियां कहती है-
 
रूको जरा, जाकर माँ से पूछते हैं
खेल-कूद, घरकाम या पाठशाला ?
चलो, सारी सखियाँ,
उसकी सलाह लेते हैं।…..
 
 
लेकिन सभी अशिक्षित बच्चियाँ जब अपनी- अपनी माँ के पास पहुंची और उन्हें पढाई के लिए हुए सारे वाद-विवाद बताए, तब उन अशिक्षित बच्चियों की मां भी इन बच्चियों को शिक्षा का महत्व समझाते हुए कहती है-

स्वाभिमान से जीने के लिए
पढ़ाई करो पाठशाला की 
इन्सानों का सच्चा गहना शिक्षा है
चलो, पाठशाला जाओ।….. 
 
सावित्रीबाई फुले जिन स्वतंत्र विचारों की थी, उसकी झलक उनकी कविताओं में स्पष्ट रूप से मिलती है। वे लड़कियों के घर में काम करने, चौका बर्तन करने की अपेक्षा उनकी पढाई-लिखाई को बेहद जरूरी मानती थी। कविताओं की इन पंक्तियों से पता चल जाता है कि सावित्रीबाई फुले स्त्री अधिकार-चेतना सम्पन्न स्त्रीवादी कवयित्री थी.
 
पहला कार्य पढ़ाई, फिर वक्त मिले तो खेल-कूद
पढ़ाई से फुर्सत मिले तभी करो घर की साफ-सफाई
चलो, अब पाठशाला जाओ।…..
 
इस लघु नाटिका जैसे गीत के अंत में पांचों बच्चियों को शिक्षा का महत्व समझ में आ जाता है और वे पढने के लिए उत्सुक होते हुए कहती है-
 
चलो, चलें पाठशाला हमें है पढ़ना, नहीं अब वक्त गंवाना
ज्ञान-विद्या प्राप्त करें, चलो हम संकल्प करें
अज्ञानताऔरगरीबी की गुलामीगीरी चलो, तोड़ डालें
सदियों का लाचारी भरा जीवन चलो, फेंक दें।
 
हमें ना हो इच्छा कभी आराम की
ध्येय साध्य करें पढ़कर शिक्षा का
अच्छे अवसर का आज ही सदुपयोग करें
समय की सहयोग हमें प्राप्त हुआ हैं।
 
सावित्रीबाई फुले बेहद प्रकृति प्रेमी थी। काव्यफुले में उनकी कई सारी कविताएं प्रकृति, प्रकृति के उपहार पुष्प और प्रकृति का मनुष्य को दान आदि विषयों पर लिखी गई है। तरह-तरह के फूल, तितलियां, भँवरे, आदि का जिक्र वे जीवन दर्शन के साथ जोड़कर करती है। प्रकृति के अनोखे उपहार हमारे चारों ओर खिल रहे तरह-तरह के पुष्प जिनका कवयित्री सावित्रीबाई फुले अपनी कल्पना के सहारे उनकी सुंदरता, मादकता और मोहकता का वर्णन करती है वह सच में बहुत प्रभावित करने वाला है। पीली चम्पा (चाफा) पुष्प के बारे में लिखते हुए वह कहती है-
 
पीला चम्पा
हल्दी रंग का
बाग में खिला,
ह्रदय के भीतर तक बस गया
 
 
ऐसे ही एक अन्य कविता है'गुलाब का फूल'। इस कविता में सावित्रीबाई फुले गुलाब और कनेर के फूल की तुलना आम आदमी और राजकुमार से करके अपनी कल्पना के जरिए सबको विस्मित कर देती है –
 
गुलाब का फूल और फूल कनेर का
रंग- रूप दोनो का एक- सा
एक आम आदमी, दूसरा राजकुमार
गुलाब की रौनक, देसी फूलो से उसकी उपमा कैसी?
 
तितली और फूलों की कलियां कविता में सावित्री बाई फुले की दार्शनिक दृष्टि का विस्तार दिखता है। जिस तरह से समाज के सारे रिश्ते-नाते स्वार्थ की दहलीज पर खडे होकर अपना स्वार्थ साधते है। इस भाव को अभी तक अन्य कवियों ने अपनी कविताओं में फूल और भंवरे के माध्यम से बताया है, पर सावित्रीबाई फुले ने इस स्वार्थपरता की भावना को तितली के जरिए स्पष्ट किया है  –
 
तितलियाँ रंग-बिरंगी
बहुत ही सुंदर
उनकी आँखे चमकदार, सतरंगी
उनकी हंसी बातुनी
पंख रेशमी उनकी देह पर
छोटे-बड़े, पीले रंग के 
पंख मुड़े हुए, किन्तु भरे उड़ान आकाश में
उनका रूप-रंग मनोहर।
 
तितलियाँ देख-देखमैं खो गयी
बिसर गई अपने आप को
 
फूलों की कलियाँ
कोमल, अति सुन्दर
आतुर होकर तितलियों को
पास बुलाती
राह देखती उनकी
आ जाओ दौड़-दौड़ कर तितली
कहती मन ही मन फूलों की कलियाँ।
 
उड़कर आ पहुँची तितलियाँ
फूलों के पास
इकट्ठा कर शहद पी लिया
मुरझा गयी सारी कलियाँ।
 
फूलोंकी कलियों का रस चखकर
ढूँढा कहीं और ठिकाना।
 
रीत है यही दुनियाँ की
स्वार्थ और पलभर के हैं रिश्ते
देख दुनियां की रीत
हो जाती हूँ मैं चकित।
 
प्रकृति का सार्वभौमिक सत्य है जियो और जीने दो। इन्सान और प्रकृति कविता में वह इसी तथ्य को प्रतिपादित करते हुए कहती हैं
 
मानव जीवन को करे समृद्ध
भय चिंता सभी छोड़कर आओ,
खुद जिएं और औरों को जीने दें।
 
मानव-प्राणी, निसर्ग-सृष्टि 
एक ही सिक्के के दो पहलू
एक जानकर सारी जीवसृष्टि को
प्रकृति के अमूल्य निधि मानव की
चलो, कद्र करें।
 
सावित्रीबाई फुले अपने दाम्पत्य जीवन में, अपनी आजादी में, अपने आनंद में औरअपने सामाजिक काम में ज्योतिबा फुले के प्यार, स्नेह और सहयोग को हमेशा दिल में जगाए रखती थी। पचास साल के अपने दाम्पत्य जीवन में वे ज्योतिबा के साथ हर पल, हर समय उनके साथ कदम से कदम मिलाकर चलती रही तथा ज्योतिबा को अपने मन के भीतर संजोकर रखा। ज्योतिबा और सावित्रीबाई फुले जैसा प्यार, आपसी समझदारी सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणा और समाज के लिए मिसाल है। सामाजिक काम की प्रेरणा के साथ वे अपने काव्य सृजन की प्रेरणा भी ज्योतिबा फुले को ही मानती। ज्योतिबा से मिले ज्ञान के बोध को वे मन की पोटली में बांधकर रखती है-
 
"ऐसा बोध प्राप्त होता है
ज्योतिबा के सम्पर्क में
मन के भीतर सहेजकर रखती हूं,
मैं सावित्री ज्योतिबा की।
 
'संसार का रास्ता' कविता में संसार के रास्ते से अलग चलते हुए वे कहती है-
 
मेरे जीवन में ज्योतिबा स्वांनद समग्रआनंद
जिस तरह होता है शहद
फूलों, कलियों में।
 
ज्योतिबा को सलाम
ह्रदय से करतेहैं
ज्ञान का अमृत हमें वे देते हैं,
और जैसे हम
पुनर्जीवित होत जाते हैं
 
महान ज्योतिबा,
दीन दलित, शूद्र- अतिक्षुद्र
तुम्हें पुकारते हें
 
ज्योतिबा-सावित्री संवाद कविता, सावित्रीबाई फुले ने अपने और ज्योतिबा फुले के बीच के प्रातःकालीन भ्रमण के समय सुबह की प्राकृतिक सुषमा का वर्णन किया है। सावित्रीबाई फुले इस कविता में सुबह की प्राकृतिक सुषमा के मनोहारी दृश्य के वर्णन के बीच सामाजिक मुददों पर बहस छिड जाती है, इसका बेहद खूबसूरत से चित्रमय संवाद दिखाया है। ज्योतिबा सावित्रीबाई से सुबह होने पर, रात के दुखी होने की बात करते है। इस बात का सावित्रीबाई फुले जवाब देते हुए कहती है कि क्या रात यदि यह इच्छा करती है कि प्रकृति सूर्य बिन रहे तो उसकी इच्छा उल्लू के सामान है, जो सूरज को गाली गलौज और श्राप देने की कामना करता है?
 
बातें ज्योतिबा की सुन कहे सावित्री
करे इच्छा रात-रजनी
रहे प्रकृति सूरज बिन
रहे अंधियारे में हमेशा-हमेशा
उल्लुओं की इच्छा होती है ऐसी
करे सूरज को, गाली-गलौच और दे शाप
 
सावित्री का तर्क सम्मत जवाब सुन ज्योतिबा कहते है तुम ठीक कहती हो सावित्री शिक्षा के कारण अंधकार छट गया है और शूद्र महार जाग गये है। उल्लुओं की हमेशा इच्छा होती है कि शूद्र और महार दीन-दलित अज्ञानियों की तरह जीवन जिए। मुर्गे को टोकरी से ढकने पर भी वह बांग देना नही छोड़ता। अतः कोई कितना कोशिश करे, एक दिन शूद्र-महार जनता अपना शिक्षा का अधिकार पाकर ही रहेगी –
 
सच कहती हो तुम, छट गया अंधकार
शूद्रादि महार जाग गए हैं।
 
दीन दलित अज्ञानी रहकर दुख सहे
पशु भांति जीते रहे
यह थी उल्लुओं की इच्छा ।
 
टोकरी से ढका रखने पर भी
मुर्गा देता है बांग
और लोगों को देता है, सुबह होने की खबर।
 
कविता के अन्त में सावित्री घोषणा करती है-
 
शूद्र लोगों के क्षितिज के पर,
ज्योतिबा है सूरज
तेज से पूर्ण, अपूर्व, उदय हुआ है।
 
 
सावित्रीबाई फुले का दूसरा काव्य संग्रह 'बावन्नकशी सुबोधरत्नाकर' ज्योतिबा फुले की याद में लिखा गया है। यह काव्य संग्रह ज्योतिबा फुले की प्रामाणिक जीवनी के रूप में उनके परिनिर्वाण के एक साल बाद 1891 में उनको सादर समर्पण के रूप में प्रकाशित हुआ। बावनकशी या बावन तोले यानी बावन पद हैं, जिसमें प्रत्येक पद पाँच-छह पंक्तियों का है। इन बावन पदों में सावित्रीबाई फुले ने ज्योतिबा के जीवन संघर्ष, जीवन दर्शन, और उनके सामाजिक कार्यों द्वारा उस समय शूद्रों-महारो-स्त्रियों की स्थिति में आए क्रांतिकारी बदलावों का बहुत सच्चाई, प्रेम और सम्मान के साथ वर्णन हुआ है। एक एक पद में सावित्रीबाई फुले ने ज्योतिबा के प्रति अपने ह्रदय के सच्चे उद्गार प्रस्तुत किए है । बावनकशी सुबोधरत्नाकर सावित्रीबाई फुले के पहले काव्य संग्रह काव्यफुले के पूरे उन्तालीस साल के अंतराल के बाद आया था जिसमें कुल मिलाकर बावन पदों को छह भागों में क्रमश: उपोद्घात, सिद्धांत, पेशवाई, आंग्लाई, ज्योतिबा और अंत में उपसंहार शीर्षक से बांटा गया है। बावनकशी सुबोधरत्नाकर में कवयित्री सावित्रीबाई फुले नेअपनी कविताओं के माध्यम सेउस समय के इतिहास, स्थिति, परिस्थिति, और उसमें ज्योतिबा फुले के योगदान को स्पष्ट तौर पर देखा जा सकता है। बावनकशी सुबोधरत्नाकर के आरंभ में ही कवयित्री सावित्री बाई फुले अपना काव्य संग्रह अपने जीवन साथी ज्योतिबा फुले को समर्पित करते हुए कहती है कि अब वह इस दुनिया में ही है पर मेरे चिंतन और मन में बसे हुए है-
 
सहज काव्य रचना करती हूँ
भुजंग प्रयात छंद में
मन के भीतर रचती हूँ पंक्तियाँ
फिर उतारती हूँ कागज़ पर गीत 
पति ज्योतिबा को
वो सारे गीत अर्पण करती हूं
आदर के साथ
अब वे यहां नहीं हैं इस जगत में
किन्तु हमेशा रहते हैं मेरे चिंतन में॥2
 
सावित्री ज्योतिबा फुले के बारे में सोचती हुई कहती है कि ज्योतिबा उनके जीवन साथी तो हैं ही लेकिन वे इससे ज्यादा बढ़कर दलित और शूद्र समाज के अंधकारों को दूर करने वाले क्रांतिसूर्य भी है। वे अपनी कविता लिखने का उद्देश्य बताती है कि वे हमेशा वंचित शोषित समाज के लिए कविता लिखना चाहती है. "प्रणाम करती हूं मैं सभी शूद्रों को मैं सावित्री मनोभावसे, हमेशा सृजन करूं मैं कविताएं उनकी उन्नति के लिए।" कहना न होगा की क्रांतिकारी सामाजिक नेत्री कवयित्री सावित्री बाई फुले के लेखकीय सरोकार बहुत बड़े है। इस समाजिक सरोकार में लिखना भी शामिल है। सावित्रीबाई फुले अपने लेखन से सामजिक कार्य और उस सामाजिक कार्य से शूद्र-दलितों की पीड़ा उजागर करते हुए उनके खिलाफ खड़े होने की प्रेरणा देती है।
 
प्रसिद्ध लेखक एम. जी. माली के अनुसार 'बावनकशी सुबोध रत्नाकर ज्योतिबा फुले की सबसे पहली प्रमाणिक, उपलब्ध जीवनी है, जिसे सावित्रीबाई फुले ने बावन पदों में काव्यात्मक शैली में लिखा है'। दूसरे शब्दों में कहे तो बावनकशी सुबोध रत्नाकर ज्योतिबा फुले पर लिखा गया संक्षिप्त महाकाव्य है जो देखने में छोटा पर अपने उद्देश्य में अत्यन्त विशाल और अति महत्वपूर्ण है। बावनकशी में सावित्री बाई फुले उस समय के धार्मिक पाखंड से पूर्ण समाज और उसके ठेकेदारों चेले चेलियों का वर्णन करते हुए कहती है-
 
परिक्रमा करे चेलियां मेले में शंकराचार्य की
प्रचार करे रूढ़ियों का मूर्खता से
रीति-रिवाज का करो सब अनुशासन से पालन॥9
 
 
सावित्रीबाई फुले के अनुसार मनुस्मृति ही शूद्र समाज की दुर्दशा का कारण है। इस मनुस्मति के कारण ही चार वर्णों का जहरीला निर्माण हुआ है. इसी के कारण समाज में दलित शूद्रों की स्थिति और जीवन भयानक मानसिक और सामाजिक गुलामी में बीता है। यही पुस्तक सारे विनाश की जड़ है।
 
मनुस्मृति की कर रचनामनु ने
किया चातुर्वर्ण का विषैला निर्माण 
उसकी अनाचारी परम्परा हमेशा चुभती रही
स्त्री और सारे शूद्र गुलामी की गुफा में हुए बन्द
पशु की भाँति शूद्र बसते आए दड़बों में॥13
 
 
पेशवा राज में शूद्र और दलितों की स्थिति किसी काल्पनिक नरक की अवधारणा से भी ज्यादा भयंकर थी तथा उस असहनीय यातना घर की तरह थी जिसमें शूद्र और दलितों को एकदम पद दलित की स्थिति पर खड़ा कर दिया। जिसमें उनकी स्थिति पशुओं से भी बदतर हो गई थी।
 
पेशवा ने पाँव पसारे
उन्होंने सत्ता, राजपाट संभाला
और अनाचार, शोषण अत्याचार होता देखकर
शूद्र हो गए भयभीत
थूक करे जमा
गले में बंधे मटके में
और रास्तों पर चलने की पाबंदी
चले धूल भरी पगडंडी पर,
कमर पर बंधे झाड़ू से मिटाते
पैरों के निशान॥17
 
सावित्रीबाई फुले अपने काव्य के माध्यम से पेशवाराज के जुल्मों का वर्णन करते हुए बताती है कि पेशवाराज में शूद्रो अतिशूद्रों के साथ उच्च वर्ग की स्त्रियों के हालात भी इतने बदतर थे कि पेशवा के बुलाने पर उसी की ऊंच जाति कानिर्लज्ज पति अपनी पत्नी को यह कहते हुए कि "चलो हवेली, एक सुनहरा मौका आ खड़ा हुआ है' कहकर रावबाजी पेशवा के यहां छोड़ आया करता था।
 
पेशवा राज के बाद अंग्रेजों के आगमन पर जब शूद्र और दलित वर्ग शिक्षा की ओर थोडा सा अग्रसर हुआ तो भट्ट-ब्राह्मण दलित और शूद्रों का मज़ाक बनाते थे। उनकी इस अभद्रता के खिलाफ बोलते हुए सावित्री कहती है-
 
 
ज्ञानी बनता देख भटलोग बरगलाते
देखो, कैसे हाँके ईसा भेड़-बकरियों को
झूठे बढ़ा-चढ़ाकर॥27
 
बावनकशी में वे ज्योतिबा के जन्म से लेकर पालन-पोषण, शिक्षण और उनके सामाजिक कार्यों का बेहद सरल और रोचक शैली में वर्णन करती है। जब ज्योतिबा केवल नौ ही महीने के थे तब उनकी माँ चल बसी और ज्योतिबा की मौसेरी बहन सगुणाबाई क्षीरसागर ने उनका पालन पोषण किया। ज्योतिबा ने अपनी पढ़ाई के साथ-साथ अपनी बड़ी बहन सगुणाबाई और अपनी जीवन साथी सावित्रीबाई को भी पढ़ाया। वे कहती है-
 
मुझे और आऊ को उन्होंने ही
पढ़ना-लिखना सिखाया
नारी शिक्षा की भव्य घटना की
रखी नींव ज्योतिबा ने॥38
 
*************
 
घर के कुएं से प्यासे अतिशूद्रों के लिए
पानी पिलाने और भरने की
अनोखी हुई शुरूआत
इन्सानों को दिखाया ज्योतिबा ने सदमार्ग
पढ़ाया दलितों को
अपने अधिकारों का पाठ
जोतिबा थे युगचेतना के आविष्कारक॥41
 
ज्योतिबा युग चेतना के अविष्कारक हीं नहीं थे अपितु वे युगदृष्टा भी थे। ज्योतिबा ने एक बच्चे को गोद लिया तथा उसे पढ़ाया लिखाया डॉक्टर बनाया। उसको भी अपने साथ सामाजिक कार्य में जोड़ा। सावित्री बाई फुले ज्योतिबा की तुलना संत तुकोबा से करते हुए कहती है -"जैसे संत तुकोबा वैसे संत ज्योतिबा । क्रांतिसूर्य ज्योतिबा का सबसे बड़ा योगदान उनका शूद्र दलित जनता को लगातार शिक्षा की ओर प्रेरित करते हुए बाह्मणवाद के अस्त्र-शस्त्र के पाखंड से निपटने का रास्ता दिखाना भी है।
 
करते रहे बयान जोतिबा सच्चाई
 कि अंग्रेजी मां का दूध पीकर
बलवान बनो
और पूरे संकल्प से करते रहे प्रयास
लगातार शूद्रों की शिक्षा-प्राप्ति के
शूद्रों के संसार में
 सुख-शांति समाधान के लिए॥46
 
 
* * *
पढ़ा इतिहास
सत्य असत्य ढूंढकर सच्चाई
का बोध ले
 
ज्योतिबा ने दुखी-जन, स्त्रियों, शुद्रों और दलितों की तरक्की, उनकी इंसानी गरिमा को बरकरार रखने, उनके ऊपर हो रहे जुल्मो सितम के खिलाफ खड़े होने, उनको सशक्त बनाने के लिए अनथक कार्य किए। यही कारण था और है कि दलित जनता उन्हें अपना सच्चा हितैषी मानती थी-
 
यद्यपि ज्योतिबा का जन्म हुआ वहां
जिन्हें शूद्र माली के नाम से
पुकारा जाता था
सभी दलित-शोषित उन्हें माली जाति के नहीं
अपना मुक्तिदाता मानते थे
 महान जोतिबा अमर हो गए
प्रणाम करती हूँ ऐसे जोतिबा को॥50॥
 
बावन्नकशी सुबोधरत्नाकर काव्य-संग्रह के अंत में सावित्री अपने लेखन की कसौटी अपनी दलित शूद्र जनता को ही बनाते हुए कहती है कि-
 
मेरी कविता को पढ़-सुनकर
यदि थोड़ा भी ज्ञान हो जाये प्राप्त
मैं समझूंगी मेरा परिश्रम सार्थक हो गया
मुझे बताओ सत्य निडर होकर
 कि कैसी हैं मेरी कविताएं
ज्ञानपरक, यथार्थ, मनभावनया अद्भुत
तुम ही बताओ॥52॥
 
 
वर्ण-व्यवस्था के पूर्वाग्रह से ग्रसित ब्राह्मणवादी जातीय समाज के कर्ता-धर्ताओं ने सच्ची क्रांतिकारी, महान क्रांति सूर्या सावित्रीबाई फुले के इतने कार्यों के बाद भी उनके अमूल्य योगदान का आकलन कभी ठीक से किया ही नही परंतु वह दिन अब दूर नही जब उनके सम्पूर्ण योगदान के पन्नों को एक-एक करके खोल लिया जायेगा। यह हिन्दी में अनुवादित काव्य संग्रह उसी किताब का एक ढंका पन्ना है जिसे हमने खोलकर पाठकों के समाने रख देने की कोशिश की है।
 
(अनिता भारती सुप्रसिद्ध दलित स्त्रीवादी साहित्यकार और सामाजिक कार्यकर्ता है)

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