विद्रोह की मशाल से समाज को रोशनी – कवियित्री भी थी सावित्री बाई फुले

 

यह जानकर गहरा आश्चर्य होता है कि 18 वीं शताब्दी में भारत की पहली अध्यापिका तथा सामाजिक क्रांति की अग्रदूत सावित्रीबाई फुले एक प्रखर, निर्भीक, चेतना सम्पन्न, तर्कशील, दार्शनिक, स्त्रीवादीख्याति प्राप्त लोकप्रिय कवयित्री, अपनी पूरी प्रतिभा और ताकत के साथ उपस्थित होती है लेकिन किसी की निगाह उन पर जातीभी नहीं? या फिर दूसरे शब्दों में कहूं तो उनके योगदान पर, मौन धारण कर लिया जाता है। सवाल है इस मौन का, अवहेलना और उपेक्षा का क्या कारण है? क्या इसका एकमात्र कारण उनका शूद्र तबके में जन्म लेना और दूसरा स्त्री होना माना जाए?सावित्रीबाई फुले का पूरा जीवन समाज के वंचित तबकों, खासकर स्त्री और दलितों के अधिकारों के लिए संघर्ष और सहयोग में बीता। ज्योतिबा संग सावित्रीबाई फुले ने जब क्रूर ब्राह्मणी पेशवाराज का विरोध करते हुए,लड़कियों के लिए स्कूल खोलने से लेकर तत्कालीन समाज में व्याप्त तमाम दलित-शूद्र-स्त्री विरोधी सामाजिक, नैतिकऔर धार्मिक रूढ़ियों-आडंबरों-अंधविश्वासों के खिलाफ मजबूती से बढ-चढकर डंके की चोट पर जंगलड़ने की ठानी, तब इस जंग में दुश्मन के खिलाफ लडाई का एक मजबूत हथियार बना उनका स्वरचित साहित्य।इसका उन्होंने प्रतिक्रियावादी ताकतों को कड़ा जबाब देने के लिए बहुत खूबसूरती से इस्तेमाल किया। सावित्रीबाई फुले के साहित्य में उनकी कविताएं, पत्र, भाषण, लेख, पुस्तकें आदि शामिल है।
 
कवयित्री सावित्रीबाई बाई फुले ने अपने जीवन काल में दो काव्य पुस्तकों की रचना की, जिनमें उनका पहलासंग्रह‘काव्य-फुले’ 1854 में तब छपा; जब वे मात्र तेईस वर्ष की ही थी। उनका दूसरा काव्य-संग्रह ‘बावनकशी सुबोधरत्नाकर’ 1891 में आया, जिसको सावित्रीबाई फुले ने अपने जीवनसाथी ज्योतिबा फुले की परिनिर्वाण प्राप्ति के बाद उनकी जीवनी रूप में लिखा था।
 
अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी में ब्राह्मणवाद का कट्टरतम रूप अपने चरमोत्कर्ष पर था। उस समय सवर्ण हिन्दू समाज और उसके ठेकेदारों द्वारा शूद्र, दलितों और स्त्रियों पर किए जा रहे अत्याचार-उत्पीड़न-शोषण की कोई सीमा नहीं थी। बाबा साहेब ने उस समय की हालत का वर्णन अपनी पुस्तक 'एनिहिलेशन ऑफ कास्ट' में करते हुए कहा है-'पेशेवाओं के शासनकाल में, महाराष्ट्र में, इन अछूतों को उस सड़क पर चलने की आज्ञा नही थी, जिस पर कोई सवर्ण हिन्दू चल रहा हो। इनके लिए आदेश था कि अपनी कलाई में या गले में काला धागा बांधे, ताकि हिन्दू इन्हें भूल से भी ना छू लें। पेशवाओं की राजधानी पूना में तो इन अछूतों के लिए यह आदेश था कि ये कमर में झाडू बांधकर चलें, ताकि इनके पैरों के चिह्न झाडू से मिट जाएं और कोई हिन्दू इनके पद चिन्हों पर पैर रखकर अपवित्र न हो जाएं।अछूत अपने गले में हांडी बाँधकर चले और जब थूकना हो तो उसी में थूकें, भूमि पर पड़ें हुए अछूत के थूक पर किसी हिन्दू का पैर पड़ जाने से वह अपवित्र हो जाएगा'।
 
ऐसी विपरित परिस्थितियों में सावित्री बाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1931 को महाराष्ट्र के सतारा जिला के एक छोटे से ग्राम नायगांव में हुआ। मात्र 9 साल की उम्र में ग्यारह साल के ज्योतिबाके संग ब्याह दी गई। केवल सत्रह वर्ष की उम्र में ही सावित्रीबाई ने बच्चियों के एक स्कूल की अध्यापिका और प्रधानाचार्या दोनों की भूमिका को सवर्ण समाज के द्वारा उत्पन्न अड़चनों से लड़ते हुए बडी ही लगन, विश्वास और सहजता से निभाया। समता, बंधुत्व, मैत्री और न्यायपूर्ण समाज की ल़डाई के लिए, सामाजिक क्रांति को आगे बढ़ाने के लिए सावित्राबाई फुले ने साहित्य की रचना की। आज भी यह बात बहुत कम लोग जानते है कि वे एक सजग, तर्कशील, भावप्रवण, जुझारू औरक्रांतिकारी कवियित्री थी। मात्र 23 साल की उम्र में उनका पहला काव्य संग्रह काव्य-फुले आ गया था, जिसमें उन्होंने धर्म, धर्मशास्त्र, धार्मिक पाखंडों और कुरीतियों के खिलाफ जम कर लिखा। औरतों की सामाजिक स्थिति पर कविताएं लिखी और उनकी बुरी स्थिति के लिए जिम्मेदार धर्म, जाति, ब्राह्मणवाद और पितृसत्ता पर कड़ा प्रहार किया। अपनी एक कविता में वे दलितों औऱ बहुजनों को समाज में बैठीअज्ञानता को पहचान कर, उसे पकड़कर कुचल- कुचल कर मारने के लिए कहती है क्योंकि यह अज्ञानता यानी अशिक्षा ही दलित बहुजन और स्त्री समाज की दुश्मन है। जिससे जानबूझकर सोची समझी साजिश के तहत वंचित समूह को दूर रखा गया है।
 
           
उसका नाम है अज्ञान
उसे धर दबोचो, मजबूत पकड़कर पीटो
और उसे जीवन से भगा दो
 
इस अशिक्षा रूपी अज्ञानता के कारण ही पूरा बहुजन समाज सवर्ण हिन्दुओं का गुलाम बना है। इनके पाखंड और कूटनीति के हथियार ज्योतिष, पंचाग, हस्तरेखा आदि पर व्यंग्य करती हुई सावित्री बाई फुले कहती है-
 
ज्योतिष पंचाग हस्तरेखा में पड़े मूर्ख
स्वर्ग नरक की कल्पना में रूचि
पशु जीवन में भी
ऐसे भ्रम के लिए कोईस्थान नहीं
पत्नी बेचारी काम करती रहे
मुफ्तखोर बेशर्म खाता रहे
पशुओं में भी ऐसा अजूबा नहीं
उसे कैसे इन्सान कहे?(पेज-2)
 
सावित्रीबाई फुले जानती है कि शूद्र और दलितों की गरीबी का कारण क्या है। लोग समझते है कि ब्राह्मणवाद केवल एक मानसिकता ही नही वरन् एक पूरी व्यवस्था है जिससे धर्म और ब्राह्मणवाद के पोषक तत्व देव-देवता, रीति-रिवाज, पूजा-अर्चना आदि गरीब दलित दमित जनता को अपने में नियंत्रण में रखकर उनकी उन्नति के सारे रास्ते बंद कर उन्हें गरीबी, तंगी, बदहाली भरे जीवन में धकेलते आए हैं।
 
शूद्र और अति शूद्र
अज्ञान की वजह से पिछड़े
देव धर्म, रीति रिवाज़, अर्चना के कारण
अभावों से गिरकर में कंगाल हुए-
                                     (पेज- 6)
 
वे शूद्रों के दुख को, जाति के आधार पर प्रताड़ना के दुख को दो हजार साल से भी पुराना बताती है। सावित्रीबाई फुले इसका कारण मानती है कि इस धरती पर ब्राह्मणों ने अपने आप को स्वयं घोषित देवता बना लिया है और उसके माध्यम से यह स्वयं घोषित ब्राह्मण देवता अपनी मक्कारी और फरेब का जाल बिछाकर, उन्हें डरा-धमका कर रात-दिन अपनी सेवा करवाते है।
 
दो हजार साल पुराना
शूद्रों से जुड़ा है एक दुख
ब्राह्मणों की सेवा की आज्ञा देकर
झूठे मक्कार स्वयं घोषित
भू देवताओं ने पछाड़ा है।-   पेज 14
 
सावित्रीबाई फुले के अनुसार, ब्राह्मणों का ग्रंथ 'मनुस्मृति', दलित, शूद्र और स्त्री की दुर्दशा का जिम्मेदार है इसलिए वे मनुस्मृति के रचयिता मनु को इस बात के लिए आड़े हाथ लेती है जिसमें यह कहा गया है कि जो हल चलाता है, जो खेती करता है वह मूर्ख है। दरअसल सावित्रीबाई फुले इस बात के पीछे छिपे षडयंत्र को जानती हैं। वे जानती है कि यदि शुद्र और दलित खेती करेंगे तो सम्पन्न होंगे। यदि वे सम्पन्न होंगे तो खुशहाली भरा जीवन जिएंगे, जिससे वे ब्राह्मणों की धर्माज्ञा मानना बंद कर देंगे। इसलिए मनुस्मृति रचयिता को खरी-खरी सुनाते हुए वे कहती हैं – 
 
हल जो चलावे, खेती जी करे
वे मूर्ख होते है, कहे मनु ।
मत करो खेती कहे मनुस्मृति
धर्माज्ञा की करे घोषणा, ब्राह्मणों की।
 
शूद्र और दलित यहाँ के मूलनिवासी यानी 'नेटिव' है। आक्रामक आर्य बाहर से आए थे और उन्होने अपनी चलाकी और धूर्तता से, अन्य सत्ताधारी शासकों से मिलकर यहां के भोले -भाले मूलनिवासियों को पद-दलित कर दिया। लेकिन यहाँ के नेटिव मूलनिवासी अपने शौर्य दयालुता और प्रेम आदि जीवन मूल्यों में विश्वास रखते आए है। इन शूरवीर जननायकों में छत्रपति शिवाजी, महारानी ताराबाई, अंबाबाई आदि हैं, जिन्होने समतामूलक समाज बनाने के लिए अन्याय और अत्याचार के खिलाफ लडाई लडी। सावित्रीबाई फुले इन शूरवीरों के समक्ष अपना सिर झुकाती हैं। महान शूरवीर योद्धा बलिराजा के प्रति अपना सम्मान प्रकट करते हुए और अपने तथा अपने वंचित समाज को उनका वंशज मानतीहुई, कहती हैं –
 
शूद्र शब्द का
सही अर्थ है-नेटिव
आक्रामक शासकों ने
शुद्र का ढप्पा लगाया।
 
पराजित शूद्र हुए गुलाम
इराणी ब्राह्मणों के
और ब्राह्मण अंग्रेजों के
बने उग्र शूद्र ।
 
असल में शूद्र ही
स्वामी इंडिया के
नाम उनका था इंडियन
 
थे शूर पराक्रमी हमारे पुरखे
उन्ही प्रतापी योद्धाओं के
हम सब वंशज हैं।
 
शूद्र राजा बलिराजा के राज में समृद्धि है, जनता के पास काम है। वह मेहनती है। खुश है। सुखी है और खुशहाल है। एक वंचित वर्ग के शासक बलिराजा को सिर पर ताज की उपाधि देते हुए सावित्री बाई फुले कहती है-
 
बलिराज में जनता सुखी-संतोषी
 
दान में पाएं याचक स्वर्ण घन कंचन
सिर पर ताज रत्नों का बलिराज
और जनता के विशाल मन
 
छत्रपति शिवाजी बडे शूरवीर योद्धा और जननायक हैं। वंचित तबके की शूद्र-अतिशूद्र जनता उन्हें अपना हमदर्द मानकर सुबह-सवेरे रोज याद करती है और उनका शौर्य गान गाती है-
 
छत्रपति शिवाजी को
सुबह- सवेरे याद करना चाहिए
शूद्र-अतिशूद्र के हमदर्द
उनका गुणगान करे पूरी भावना से।
 
 
आगे वे इसी कविता में कहती है कि राजा नल द्रौपदी युधिष्ठिर आदि का गान तो केवल शास्त्र पुराणों तक ही सीमित है जबकि शिवाजी की शौर्य गाथाएं इतिहास में दर्ज हो गई है और हमेशा रहेगी।
 
नल राजा युधिष्ठिर, द्रोपदी
आदि
नामी गिरामी शास्त्र-पुराणों के
पन्नों तक ही सीमित
किन्तु छत्रपति शिवाजी की शौर्य गाथा
है इतिहास में दर्ज।
 
शूद्र अतिशूद्र और आदिवासी समाज में स्त्रियाँ बहुत बहादुर और जुझारू होती है। वह किसी भी कठिन से कठिन परिस्थिति में भी हार नही मानती हैं। मुसीबत आने पर भी किसी भी मोर्चे अपने समाज के साथ खडी होकर अपने बच्चों को साथ ले, बराबरी से डटकर मुकाबला करती है।महारानी छत्रपति ताराबाई ऐसी ही एक बहादुर योद्धा थी। उनको लड़ाकू वीरांगना की पदवी देते हुए सावित्रीबाई फुले उन्हें शत्रु मर्दिनी, शेर की तरह दहाडने वाली, बिजली से भी अधिक फुर्तीली बताती है और उनको अपना प्रेरणास्त्रोत मानती है।
 
महारानी ताराबाई लड़ाकू वीरागंना
रणभूमि में रण चंडिका तूफानी
युद्ध भूमि में युद्ध की प्रेरणास्त्रोत
आदर से सिर झुक जाता
उसे प्रणाम करना मुझे सुहाता
 
सावित्रीबाई फुले अपनी तमाम उम्र दलित वंचित शूद्र व स्त्री तबके के जिस अधिकार के लिए लड़ती रही वह अधिकार था शिक्षा का। इस पूरे वर्ग को जानबूझकर शिक्षा रहित करके उसी ताकत योग्यता और उसके श्रम का शोषण किया गया। उसके वो तमाम रास्ते जो उसे आगे ले जा सकते थे, जो उसे अन्याय के खिलाफ प्रतिकार करने की ताकत देते थे, जो उसे शोषण और अत्याचार से लड़ना सिखाते थे, सब के सब शिक्षा के अधिकार के बिना अधूरे रह गए। सावित्रीबाई फुले ने सवर्णों की इस कुचाल को समझा कि यह सवर्ण समाज कभी दलितों वंचितों और शूद्रों को पढने लिखने नही देगा इसलिए सावित्रीबाई ने सबसे ज्यादा अपनी कविताओं के माध्यम से शिक्षा प्राप्त करने की अलख जगाई। उन्हें अपने सामाजिक कार्यों द्वारा अनुभव हो चुका था कि शिक्षा के बिना, खासकर अंग्रेजी शिक्षा के बिना शूद्र अतिशूद्र तथाकथित मुख्यधारा के विकास में शामिल नहीं हो सकते। अत: वह शूद्र अति शूद्रों को अंग्रेजी पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करती हैं, और अपनी कविता अंग्रेजी मैय्या मे कहती है-
 
"अंग्रेजी मैय्या, अंग्रेजी वाणई
शूद्रों को उत्कर्ष करने वाली
पूरे स्नेह से।
 
अंग्रेजी मैया, अब नहीं है मुगलाई
और नहीं बची है अब
पेशवाई, मूर्खशाही।
 
अंग्रेजी मैया, देती सच्चा ज्ञान
शूद्रों को देती है जीवन
वह तो प्रेम से।
 
अंग्रेजी मैया, शूद्रों को पिलाती है दूध
पालती पोसती है
माँ की ममता से।
 
 
अंग्रेजी मैया,तूने तोड़ डाली
जंजीर पशुता की
और दी है मानवता की भेंट
सारे शूद्र लोक को।
 
इसी तरह अपनी दूसरी कविता 'अंग्रेजी पढ़ो' में शूद्रो अतिशूद्रों को अपनी जीवन शिक्षा से सुधारने के लिए कहती है-
 
स्वाबलंबनका हो उद्यम, प्रवृत्ति
ज्ञान-धन का संचय करो
मेहनत करके।
 
बिना विद्या जीवनव्यर्थ पशु जैसा
निठल्ले ना बैठे रहो
करो विद्या ग्रहण।
 
शूद्र-अतिशूद्रों के दुख दूर करने के लिए
मिला है कीमती अवसर
अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त करने का।
 
अंग्रेजी पढ़कर जातिभेद की
दीवारें तोड़ डालो
फेक दो भट-ब्राह्मणों के
षड्यंत्री शास्त्र-पुराणों को।
 
धार्मिक रूढियों, अँधविश्वास और आडंबर की पोल खोलकर उनका मजाक बनाते हुए, उसपर व्यंग्य करती हुई सावित्रीबाई अपनी मन्नत कविता में कहती है-
 
पत्थर को सिंदूर लगाकर
और तेल में डुबोकर
जिसे समझा जाता है देवता
वह असल में होता है पत्थर
 
आगे वह इसी कविता में पत्थर से मन्नत माँगकर पुत्र प्राप्त करने की अवैज्ञानिकता का मखौल उड़ाते हुए कहती है-
 
यदि पत्थर पूजने से होते बच्चे
तो फिर नाहक
नर-नारी शादी क्यों रचाते?
 
जिस समय सावित्रीबाई का प्रथम कविता संग्रह काव्य फुले आया उस समय सावित्रीबाई फुले शूद्र-अतिशूद्र लड़कियों को पढा रही थीं। ज्योतिबा सावित्री ने पहला स्कूल 13 मई 1848 में पहला स्कूल खोला था और काव्यफुले 1852 में आया। जब वे पहले पहल स्कूल में पढ़ाने के लिए निकली, तो वे खुद उस समय बच्ची ही थी। उनके कंधे पर ज्यादा से ज्यादा बच्चों को स्कूल तक लाना तथा उन्हें स्कूल में बनाए रखने की भी बात होती। सावित्रीबाई फुले ने बहुत ही सुंदर बालगीत भी लिखे हैं, जिसमें उन्होंने खेल-खेल में गाते गाते बच्चों को साफ-सुथरा रहना, विद्यालय आकर पढाई करने के लिए प्रेरित करना व पढाई का महत्व बताना आदि है। बच्चों के विद्यालय आने पर वे जिस तरह स्वागत करती है वह उनकी शिक्षा देने की लगन को दर्शाता है –
 
सुनहरे दिन का उदय हुआ
आओ प्यारे बच्चो
आजहर्ष उल्लास से
तुम्हारा स्वागत करती हूँ आज
 
वह विद्या को श्रेष्ठ धन बताते हुए कहती है –
 
विद्या ही सच्चा धन है
सभी धन-दौलत से बढ़कर
जिसके पास है ज्ञान का भंडार
है वह सच्चा ज्ञानी लोगों की नज़रो में
 
अपने एक अन्य बालगीत में बच्चों को समय का सदुपयोग करने की प्रेरणा देते हुए कहती है
 
करना है जो काम आज
उसे करो तुम तत्काल
 
जो करना है दोपहर में
उसे कर लो तुम अभी 
 
पलभर के बाद का काम
पूरा कर लो इसी वक़्त 
 
काम पूरा हुआ कि नहीं ?
न कभी भी पूछती मृत्यु कारण।
 
 
सावित्रीबाई फुले की एक बालगीत पुस्तक'समूह' एक लघुनाटिका के समान लगती है। इस कविता में वे पांच समझदार पाठशाला जाकर पढने वाली शिक्षित बच्चियों से पाठशाला न जाने वाली अशिक्षित बच्चियों की आपस में बातचीत व तर्क द्वारा उन्हें पाठशाला आकर पढ़ने के लिए कहती हैं तो निरक्षर बच्चियाँ जवाब देती है-
 
अरे, क्या धरा है पाठशाला में
क्या हमारा सिर फिर गया है ?
पाठशाला जाने से तो अच्छा है खेलना
चलो चलो, जाकर खेलें।…..
 
 
उन्हीं में से कुछ बच्चियां कहती है-
 
रूको जरा, जाकर माँ से पूछते हैं
खेल-कूद, घरकाम या पाठशाला ?
चलो, सारी सखियाँ,
उसकी सलाह लेते हैं।…..
 
 
लेकिन सभी अशिक्षित बच्चियाँ जब अपनी- अपनी माँ के पास पहुंची और उन्हें पढाई के लिए हुए सारे वाद-विवाद बताए, तब उन अशिक्षित बच्चियों की मां भी इन बच्चियों को शिक्षा का महत्व समझाते हुए कहती है-

स्वाभिमान से जीने के लिए
पढ़ाई करो पाठशाला की 
इन्सानों का सच्चा गहना शिक्षा है
चलो, पाठशाला जाओ।….. 
 
सावित्रीबाई फुले जिन स्वतंत्र विचारों की थी, उसकी झलक उनकी कविताओं में स्पष्ट रूप से मिलती है। वे लड़कियों के घर में काम करने, चौका बर्तन करने की अपेक्षा उनकी पढाई-लिखाई को बेहद जरूरी मानती थी। कविताओं की इन पंक्तियों से पता चल जाता है कि सावित्रीबाई फुले स्त्री अधिकार-चेतना सम्पन्न स्त्रीवादी कवयित्री थी.
 
पहला कार्य पढ़ाई, फिर वक्त मिले तो खेल-कूद
पढ़ाई से फुर्सत मिले तभी करो घर की साफ-सफाई
चलो, अब पाठशाला जाओ।…..
 
इस लघु नाटिका जैसे गीत के अंत में पांचों बच्चियों को शिक्षा का महत्व समझ में आ जाता है और वे पढने के लिए उत्सुक होते हुए कहती है-
 
चलो, चलें पाठशाला हमें है पढ़ना, नहीं अब वक्त गंवाना
ज्ञान-विद्या प्राप्त करें, चलो हम संकल्प करें
अज्ञानताऔरगरीबी की गुलामीगीरी चलो, तोड़ डालें
सदियों का लाचारी भरा जीवन चलो, फेंक दें।
 
हमें ना हो इच्छा कभी आराम की
ध्येय साध्य करें पढ़कर शिक्षा का
अच्छे अवसर का आज ही सदुपयोग करें
समय की सहयोग हमें प्राप्त हुआ हैं।
 
सावित्रीबाई फुले बेहद प्रकृति प्रेमी थी। काव्यफुले में उनकी कई सारी कविताएं प्रकृति, प्रकृति के उपहार पुष्प और प्रकृति का मनुष्य को दान आदि विषयों पर लिखी गई है। तरह-तरह के फूल, तितलियां, भँवरे, आदि का जिक्र वे जीवन दर्शन के साथ जोड़कर करती है। प्रकृति के अनोखे उपहार हमारे चारों ओर खिल रहे तरह-तरह के पुष्प जिनका कवयित्री सावित्रीबाई फुले अपनी कल्पना के सहारे उनकी सुंदरता, मादकता और मोहकता का वर्णन करती है वह सच में बहुत प्रभावित करने वाला है। पीली चम्पा (चाफा) पुष्प के बारे में लिखते हुए वह कहती है-
 
पीला चम्पा
हल्दी रंग का
बाग में खिला,
ह्रदय के भीतर तक बस गया
 
 
ऐसे ही एक अन्य कविता है'गुलाब का फूल'। इस कविता में सावित्रीबाई फुले गुलाब और कनेर के फूल की तुलना आम आदमी और राजकुमार से करके अपनी कल्पना के जरिए सबको विस्मित कर देती है –
 
गुलाब का फूल और फूल कनेर का
रंग- रूप दोनो का एक- सा
एक आम आदमी, दूसरा राजकुमार
गुलाब की रौनक, देसी फूलो से उसकी उपमा कैसी?
 
तितली और फूलों की कलियां कविता में सावित्री बाई फुले की दार्शनिक दृष्टि का विस्तार दिखता है। जिस तरह से समाज के सारे रिश्ते-नाते स्वार्थ की दहलीज पर खडे होकर अपना स्वार्थ साधते है। इस भाव को अभी तक अन्य कवियों ने अपनी कविताओं में फूल और भंवरे के माध्यम से बताया है, पर सावित्रीबाई फुले ने इस स्वार्थपरता की भावना को तितली के जरिए स्पष्ट किया है  –
 
तितलियाँ रंग-बिरंगी
बहुत ही सुंदर
उनकी आँखे चमकदार, सतरंगी
उनकी हंसी बातुनी
पंख रेशमी उनकी देह पर
छोटे-बड़े, पीले रंग के 
पंख मुड़े हुए, किन्तु भरे उड़ान आकाश में
उनका रूप-रंग मनोहर।
 
तितलियाँ देख-देखमैं खो गयी
बिसर गई अपने आप को
 
फूलों की कलियाँ
कोमल, अति सुन्दर
आतुर होकर तितलियों को
पास बुलाती
राह देखती उनकी
आ जाओ दौड़-दौड़ कर तितली
कहती मन ही मन फूलों की कलियाँ।
 
उड़कर आ पहुँची तितलियाँ
फूलों के पास
इकट्ठा कर शहद पी लिया
मुरझा गयी सारी कलियाँ।
 
फूलोंकी कलियों का रस चखकर
ढूँढा कहीं और ठिकाना।
 
रीत है यही दुनियाँ की
स्वार्थ और पलभर के हैं रिश्ते
देख दुनियां की रीत
हो जाती हूँ मैं चकित।
 
प्रकृति का सार्वभौमिक सत्य है जियो और जीने दो। इन्सान और प्रकृति कविता में वह इसी तथ्य को प्रतिपादित करते हुए कहती हैं
 
मानव जीवन को करे समृद्ध
भय चिंता सभी छोड़कर आओ,
खुद जिएं और औरों को जीने दें।
 
मानव-प्राणी, निसर्ग-सृष्टि 
एक ही सिक्के के दो पहलू
एक जानकर सारी जीवसृष्टि को
प्रकृति के अमूल्य निधि मानव की
चलो, कद्र करें।
 
सावित्रीबाई फुले अपने दाम्पत्य जीवन में, अपनी आजादी में, अपने आनंद में औरअपने सामाजिक काम में ज्योतिबा फुले के प्यार, स्नेह और सहयोग को हमेशा दिल में जगाए रखती थी। पचास साल के अपने दाम्पत्य जीवन में वे ज्योतिबा के साथ हर पल, हर समय उनके साथ कदम से कदम मिलाकर चलती रही तथा ज्योतिबा को अपने मन के भीतर संजोकर रखा। ज्योतिबा और सावित्रीबाई फुले जैसा प्यार, आपसी समझदारी सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणा और समाज के लिए मिसाल है। सामाजिक काम की प्रेरणा के साथ वे अपने काव्य सृजन की प्रेरणा भी ज्योतिबा फुले को ही मानती। ज्योतिबा से मिले ज्ञान के बोध को वे मन की पोटली में बांधकर रखती है-
 
"ऐसा बोध प्राप्त होता है
ज्योतिबा के सम्पर्क में
मन के भीतर सहेजकर रखती हूं,
मैं सावित्री ज्योतिबा की।
 
'संसार का रास्ता' कविता में संसार के रास्ते से अलग चलते हुए वे कहती है-
 
मेरे जीवन में ज्योतिबा स्वांनद समग्रआनंद
जिस तरह होता है शहद
फूलों, कलियों में।
 
ज्योतिबा को सलाम
ह्रदय से करतेहैं
ज्ञान का अमृत हमें वे देते हैं,
और जैसे हम
पुनर्जीवित होत जाते हैं
 
महान ज्योतिबा,
दीन दलित, शूद्र- अतिक्षुद्र
तुम्हें पुकारते हें
 
ज्योतिबा-सावित्री संवाद कविता, सावित्रीबाई फुले ने अपने और ज्योतिबा फुले के बीच के प्रातःकालीन भ्रमण के समय सुबह की प्राकृतिक सुषमा का वर्णन किया है। सावित्रीबाई फुले इस कविता में सुबह की प्राकृतिक सुषमा के मनोहारी दृश्य के वर्णन के बीच सामाजिक मुददों पर बहस छिड जाती है, इसका बेहद खूबसूरत से चित्रमय संवाद दिखाया है। ज्योतिबा सावित्रीबाई से सुबह होने पर, रात के दुखी होने की बात करते है। इस बात का सावित्रीबाई फुले जवाब देते हुए कहती है कि क्या रात यदि यह इच्छा करती है कि प्रकृति सूर्य बिन रहे तो उसकी इच्छा उल्लू के सामान है, जो सूरज को गाली गलौज और श्राप देने की कामना करता है?
 
बातें ज्योतिबा की सुन कहे सावित्री
करे इच्छा रात-रजनी
रहे प्रकृति सूरज बिन
रहे अंधियारे में हमेशा-हमेशा
उल्लुओं की इच्छा होती है ऐसी
करे सूरज को, गाली-गलौच और दे शाप
 
सावित्री का तर्क सम्मत जवाब सुन ज्योतिबा कहते है तुम ठीक कहती हो सावित्री शिक्षा के कारण अंधकार छट गया है और शूद्र महार जाग गये है। उल्लुओं की हमेशा इच्छा होती है कि शूद्र और महार दीन-दलित अज्ञानियों की तरह जीवन जिए। मुर्गे को टोकरी से ढकने पर भी वह बांग देना नही छोड़ता। अतः कोई कितना कोशिश करे, एक दिन शूद्र-महार जनता अपना शिक्षा का अधिकार पाकर ही रहेगी –
 
सच कहती हो तुम, छट गया अंधकार
शूद्रादि महार जाग गए हैं।
 
दीन दलित अज्ञानी रहकर दुख सहे
पशु भांति जीते रहे
यह थी उल्लुओं की इच्छा ।
 
टोकरी से ढका रखने पर भी
मुर्गा देता है बांग
और लोगों को देता है, सुबह होने की खबर।
 
कविता के अन्त में सावित्री घोषणा करती है-
 
शूद्र लोगों के क्षितिज के पर,
ज्योतिबा है सूरज
तेज से पूर्ण, अपूर्व, उदय हुआ है।
 
 
सावित्रीबाई फुले का दूसरा काव्य संग्रह 'बावन्नकशी सुबोधरत्नाकर' ज्योतिबा फुले की याद में लिखा गया है। यह काव्य संग्रह ज्योतिबा फुले की प्रामाणिक जीवनी के रूप में उनके परिनिर्वाण के एक साल बाद 1891 में उनको सादर समर्पण के रूप में प्रकाशित हुआ। बावनकशी या बावन तोले यानी बावन पद हैं, जिसमें प्रत्येक पद पाँच-छह पंक्तियों का है। इन बावन पदों में सावित्रीबाई फुले ने ज्योतिबा के जीवन संघर्ष, जीवन दर्शन, और उनके सामाजिक कार्यों द्वारा उस समय शूद्रों-महारो-स्त्रियों की स्थिति में आए क्रांतिकारी बदलावों का बहुत सच्चाई, प्रेम और सम्मान के साथ वर्णन हुआ है। एक एक पद में सावित्रीबाई फुले ने ज्योतिबा के प्रति अपने ह्रदय के सच्चे उद्गार प्रस्तुत किए है । बावनकशी सुबोधरत्नाकर सावित्रीबाई फुले के पहले काव्य संग्रह काव्यफुले के पूरे उन्तालीस साल के अंतराल के बाद आया था जिसमें कुल मिलाकर बावन पदों को छह भागों में क्रमश: उपोद्घात, सिद्धांत, पेशवाई, आंग्लाई, ज्योतिबा और अंत में उपसंहार शीर्षक से बांटा गया है। बावनकशी सुबोधरत्नाकर में कवयित्री सावित्रीबाई फुले नेअपनी कविताओं के माध्यम सेउस समय के इतिहास, स्थिति, परिस्थिति, और उसमें ज्योतिबा फुले के योगदान को स्पष्ट तौर पर देखा जा सकता है। बावनकशी सुबोधरत्नाकर के आरंभ में ही कवयित्री सावित्री बाई फुले अपना काव्य संग्रह अपने जीवन साथी ज्योतिबा फुले को समर्पित करते हुए कहती है कि अब वह इस दुनिया में ही है पर मेरे चिंतन और मन में बसे हुए है-
 
सहज काव्य रचना करती हूँ
भुजंग प्रयात छंद में
मन के भीतर रचती हूँ पंक्तियाँ
फिर उतारती हूँ कागज़ पर गीत 
पति ज्योतिबा को
वो सारे गीत अर्पण करती हूं
आदर के साथ
अब वे यहां नहीं हैं इस जगत में
किन्तु हमेशा रहते हैं मेरे चिंतन में॥2
 
सावित्री ज्योतिबा फुले के बारे में सोचती हुई कहती है कि ज्योतिबा उनके जीवन साथी तो हैं ही लेकिन वे इससे ज्यादा बढ़कर दलित और शूद्र समाज के अंधकारों को दूर करने वाले क्रांतिसूर्य भी है। वे अपनी कविता लिखने का उद्देश्य बताती है कि वे हमेशा वंचित शोषित समाज के लिए कविता लिखना चाहती है. "प्रणाम करती हूं मैं सभी शूद्रों को मैं सावित्री मनोभावसे, हमेशा सृजन करूं मैं कविताएं उनकी उन्नति के लिए।" कहना न होगा की क्रांतिकारी सामाजिक नेत्री कवयित्री सावित्री बाई फुले के लेखकीय सरोकार बहुत बड़े है। इस समाजिक सरोकार में लिखना भी शामिल है। सावित्रीबाई फुले अपने लेखन से सामजिक कार्य और उस सामाजिक कार्य से शूद्र-दलितों की पीड़ा उजागर करते हुए उनके खिलाफ खड़े होने की प्रेरणा देती है।
 
प्रसिद्ध लेखक एम. जी. माली के अनुसार 'बावनकशी सुबोध रत्नाकर ज्योतिबा फुले की सबसे पहली प्रमाणिक, उपलब्ध जीवनी है, जिसे सावित्रीबाई फुले ने बावन पदों में काव्यात्मक शैली में लिखा है'। दूसरे शब्दों में कहे तो बावनकशी सुबोध रत्नाकर ज्योतिबा फुले पर लिखा गया संक्षिप्त महाकाव्य है जो देखने में छोटा पर अपने उद्देश्य में अत्यन्त विशाल और अति महत्वपूर्ण है। बावनकशी में सावित्री बाई फुले उस समय के धार्मिक पाखंड से पूर्ण समाज और उसके ठेकेदारों चेले चेलियों का वर्णन करते हुए कहती है-
 
परिक्रमा करे चेलियां मेले में शंकराचार्य की
प्रचार करे रूढ़ियों का मूर्खता से
रीति-रिवाज का करो सब अनुशासन से पालन॥9
 
 
सावित्रीबाई फुले के अनुसार मनुस्मृति ही शूद्र समाज की दुर्दशा का कारण है। इस मनुस्मति के कारण ही चार वर्णों का जहरीला निर्माण हुआ है. इसी के कारण समाज में दलित शूद्रों की स्थिति और जीवन भयानक मानसिक और सामाजिक गुलामी में बीता है। यही पुस्तक सारे विनाश की जड़ है।
 
मनुस्मृति की कर रचनामनु ने
किया चातुर्वर्ण का विषैला निर्माण 
उसकी अनाचारी परम्परा हमेशा चुभती रही
स्त्री और सारे शूद्र गुलामी की गुफा में हुए बन्द
पशु की भाँति शूद्र बसते आए दड़बों में॥13
 
 
पेशवा राज में शूद्र और दलितों की स्थिति किसी काल्पनिक नरक की अवधारणा से भी ज्यादा भयंकर थी तथा उस असहनीय यातना घर की तरह थी जिसमें शूद्र और दलितों को एकदम पद दलित की स्थिति पर खड़ा कर दिया। जिसमें उनकी स्थिति पशुओं से भी बदतर हो गई थी।
 
पेशवा ने पाँव पसारे
उन्होंने सत्ता, राजपाट संभाला
और अनाचार, शोषण अत्याचार होता देखकर
शूद्र हो गए भयभीत
थूक करे जमा
गले में बंधे मटके में
और रास्तों पर चलने की पाबंदी
चले धूल भरी पगडंडी पर,
कमर पर बंधे झाड़ू से मिटाते
पैरों के निशान॥17
 
सावित्रीबाई फुले अपने काव्य के माध्यम से पेशवाराज के जुल्मों का वर्णन करते हुए बताती है कि पेशवाराज में शूद्रो अतिशूद्रों के साथ उच्च वर्ग की स्त्रियों के हालात भी इतने बदतर थे कि पेशवा के बुलाने पर उसी की ऊंच जाति कानिर्लज्ज पति अपनी पत्नी को यह कहते हुए कि "चलो हवेली, एक सुनहरा मौका आ खड़ा हुआ है' कहकर रावबाजी पेशवा के यहां छोड़ आया करता था।
 
पेशवा राज के बाद अंग्रेजों के आगमन पर जब शूद्र और दलित वर्ग शिक्षा की ओर थोडा सा अग्रसर हुआ तो भट्ट-ब्राह्मण दलित और शूद्रों का मज़ाक बनाते थे। उनकी इस अभद्रता के खिलाफ बोलते हुए सावित्री कहती है-
 
 
ज्ञानी बनता देख भटलोग बरगलाते
देखो, कैसे हाँके ईसा भेड़-बकरियों को
झूठे बढ़ा-चढ़ाकर॥27
 
बावनकशी में वे ज्योतिबा के जन्म से लेकर पालन-पोषण, शिक्षण और उनके सामाजिक कार्यों का बेहद सरल और रोचक शैली में वर्णन करती है। जब ज्योतिबा केवल नौ ही महीने के थे तब उनकी माँ चल बसी और ज्योतिबा की मौसेरी बहन सगुणाबाई क्षीरसागर ने उनका पालन पोषण किया। ज्योतिबा ने अपनी पढ़ाई के साथ-साथ अपनी बड़ी बहन सगुणाबाई और अपनी जीवन साथी सावित्रीबाई को भी पढ़ाया। वे कहती है-
 
मुझे और आऊ को उन्होंने ही
पढ़ना-लिखना सिखाया
नारी शिक्षा की भव्य घटना की
रखी नींव ज्योतिबा ने॥38
 
*************
 
घर के कुएं से प्यासे अतिशूद्रों के लिए
पानी पिलाने और भरने की
अनोखी हुई शुरूआत
इन्सानों को दिखाया ज्योतिबा ने सदमार्ग
पढ़ाया दलितों को
अपने अधिकारों का पाठ
जोतिबा थे युगचेतना के आविष्कारक॥41
 
ज्योतिबा युग चेतना के अविष्कारक हीं नहीं थे अपितु वे युगदृष्टा भी थे। ज्योतिबा ने एक बच्चे को गोद लिया तथा उसे पढ़ाया लिखाया डॉक्टर बनाया। उसको भी अपने साथ सामाजिक कार्य में जोड़ा। सावित्री बाई फुले ज्योतिबा की तुलना संत तुकोबा से करते हुए कहती है -"जैसे संत तुकोबा वैसे संत ज्योतिबा । क्रांतिसूर्य ज्योतिबा का सबसे बड़ा योगदान उनका शूद्र दलित जनता को लगातार शिक्षा की ओर प्रेरित करते हुए बाह्मणवाद के अस्त्र-शस्त्र के पाखंड से निपटने का रास्ता दिखाना भी है।
 
करते रहे बयान जोतिबा सच्चाई
 कि अंग्रेजी मां का दूध पीकर
बलवान बनो
और पूरे संकल्प से करते रहे प्रयास
लगातार शूद्रों की शिक्षा-प्राप्ति के
शूद्रों के संसार में
 सुख-शांति समाधान के लिए॥46
 
 
* * *
पढ़ा इतिहास
सत्य असत्य ढूंढकर सच्चाई
का बोध ले
 
ज्योतिबा ने दुखी-जन, स्त्रियों, शुद्रों और दलितों की तरक्की, उनकी इंसानी गरिमा को बरकरार रखने, उनके ऊपर हो रहे जुल्मो सितम के खिलाफ खड़े होने, उनको सशक्त बनाने के लिए अनथक कार्य किए। यही कारण था और है कि दलित जनता उन्हें अपना सच्चा हितैषी मानती थी-
 
यद्यपि ज्योतिबा का जन्म हुआ वहां
जिन्हें शूद्र माली के नाम से
पुकारा जाता था
सभी दलित-शोषित उन्हें माली जाति के नहीं
अपना मुक्तिदाता मानते थे
 महान जोतिबा अमर हो गए
प्रणाम करती हूँ ऐसे जोतिबा को॥50॥
 
बावन्नकशी सुबोधरत्नाकर काव्य-संग्रह के अंत में सावित्री अपने लेखन की कसौटी अपनी दलित शूद्र जनता को ही बनाते हुए कहती है कि-
 
मेरी कविता को पढ़-सुनकर
यदि थोड़ा भी ज्ञान हो जाये प्राप्त
मैं समझूंगी मेरा परिश्रम सार्थक हो गया
मुझे बताओ सत्य निडर होकर
 कि कैसी हैं मेरी कविताएं
ज्ञानपरक, यथार्थ, मनभावनया अद्भुत
तुम ही बताओ॥52॥
 
 
वर्ण-व्यवस्था के पूर्वाग्रह से ग्रसित ब्राह्मणवादी जातीय समाज के कर्ता-धर्ताओं ने सच्ची क्रांतिकारी, महान क्रांति सूर्या सावित्रीबाई फुले के इतने कार्यों के बाद भी उनके अमूल्य योगदान का आकलन कभी ठीक से किया ही नही परंतु वह दिन अब दूर नही जब उनके सम्पूर्ण योगदान के पन्नों को एक-एक करके खोल लिया जायेगा। यह हिन्दी में अनुवादित काव्य संग्रह उसी किताब का एक ढंका पन्ना है जिसे हमने खोलकर पाठकों के समाने रख देने की कोशिश की है।
 
(अनिता भारती सुप्रसिद्ध दलित स्त्रीवादी साहित्यकार और सामाजिक कार्यकर्ता है)

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